भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 494, कुल 810 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 494
४८४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

हूँ, तब लोग मुझे कृष्ण (काला-कलूटा) कहते हैं और जब तुम साथ हो जाती हो तो वे ही लोग मुझे श्रीकृष्ण (शोभाशाली श्रीकृष्ण)-की संज्ञा देते हैं। तुम्हीं श्री हो, तुम्हीं सम्पत्ति हो और तुम्हीं आधारस्वरूपिणी हो। तुम सर्वशक्तिस्वरूपा हो और मैं अविनाशी सर्वरूप हूँ। जब मैं तेजःस्वरूप होता हूँ, तब तुम तेजोरूपिणी होती हो। जब मैं शरीररहित होता हूँ, तब तुम भी अशरीरिणी हो जाती हो। सुन्दरि! मैं तुम्हारे संयोगसे ही सदा सर्व-बीजस्वरूप होता हूँ। तुम शक्तिस्वरूपा तथा सम्पूर्ण स्त्रियोंका स्वरूप धारण करनेवाली हो। मेरा अङ्ग और अंश ही तुम्हारा स्वरूप है। तुम मूलप्रकृति ईश्वरी हो। वरानने! शक्ति, बुद्धि और ज्ञानमें तुम मेरे ही तुल्य हो। जो नराधम हम दोनोंमें भेदबुद्धि करता है, उसका कालसूत्र नामक नरकमें तबतक निवास होता है, जबतक जगत्में चन्द्रमा और सूर्य विद्यमान हैं। वह अपने पहले और बादकी सात-सात पीढ़ियोंको नरकमें गिरा देता है। उसका करोड़ों जन्मोंका पुण्य निश्चय ही नष्ट हो जाता है। जो नराधम अज्ञानवश हम दोनोंकी निन्दा करते हैं, वे जबतक चन्द्रमा और सूर्यकी सत्ता है, तबतक घोर नरकमें पकाये जाते हैं।

'रा' शब्दका उच्चारण करनेवाले मनुष्यको मैं भयभीत-सा होकर उत्तम भक्ति प्रदान करता हूँ और 'धा' शब्दका उच्चारण करनेवालेके पीछे-पीछे इस लोभसे डोलता फिरता हूँ कि पुनः 'राधा' शब्दका श्रवण हो जाय। जो जीवनपर्यन्त सोलह उपचार अर्पण करके मेरी सेवा करते हैं, उनपर मेरी जो प्रीति होती है, वही प्रीति 'राधा' शब्दके उच्चारणसे होती है। बल्कि उससे भी अधिक प्रीति 'राधा' नामके उच्चारणसे होती है। राधे! मुझे तुम उतनी प्रिया नहीं हो, जितना तुम्हारा नाम लेनेवाला प्रिय है। 'राधा' नामका उच्चारण करनेवाला पुरुष मुझे 'राधा' से भी अधिक प्रिय है। ब्रह्मा, अनन्त, शिव, धर्म, नर-नारायण ऋषि, कपिल, गणेश और कार्तिकेय भी मेरे प्रिय हैं। लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा, सावित्री, प्रकृति—ये देवियाँ तथा देवता भी मुझे प्रिय हैं; तथापि वे राधा नामका उच्चारण करनेवाले प्राणियोंके समान प्रिय नहीं हैं। उपर्युक्त सब देवता मेरे लिये प्राणके समान हैं; परंतु सती राधे! तुम तो मेरे लिये प्राणोंसे भी बढ़कर हो। वे सब लोग भिन्न-भिन्न स्थानोंमें स्थित हैं; किंतु तुम तो मेरे वक्षःस्थलमें विराजमान हो। जो मेरी चतुर्भुज मूर्ति अपनी प्रियाको वक्षःस्थलमें धारण करती है, वही मैं श्रीकृष्णस्वरूप होकर सदा स्वयं तुम्हारा भार वहन करता हूँ।

यों कहकर श्रीकृष्ण उस मनोरम शय्यापर विराजमान हुए, तब राधिका भक्तिभावसे मस्तक झुकाकर अपने प्राणनाथसे बोलीं।

राधिकाने कहा—'प्रभो! मुझे गोलोककी सारी बातें याद हैं। मैं सब जानती हूँ। मैं उन बातोंको भूल कैसे सकती हूँ? तुम जो मुझे सर्वरूपिणी बता रहे हो, वह सब तुम्हारे चरण-कमलोंकी कृपासे ही सम्भव है। ईश्वरको कुछ लोग अप्रिय होते हैं और कहीं कुछ लोग प्रिय भी होते हैं। जैसे जो मेरा स्मरण नहीं करते हैं, उसी तरह उनपर तुम्हारी कृपा भी नहीं होती है। तुम तृणको पर्वत और पर्वतको तृण बनानेमें समर्थ हो; तथापि योग्य-अयोग्यमें तथा सम्पत्ति और विपत्तिमें भी तुम्हारी समान कृपा होती है। मैं खड़ी हूँ और तुम सोये हो। इस समय बातचीतमें जो समय निकल गया, वह एक-एक क्षण मेरे लिये एक-एक युगके समान है। मैं उसकी गणना करनेमें असमर्थ हूँ। तुम मेरे वक्षःस्थल और मस्तकपर अपना चरण-कमल रख दो। तुम्हारे विरहकी आगसे मेरा हृदय शीघ्र ही दग्ध होना चाहता है। सामने तुम्हारे चरण-कमलपर जब मेरी दृष्टि पड़ी तो वह वहीं रम