ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें•• श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४८५
गयी। फिर मैं क्लेश उठाकर भी उसे दूसरे अङ्गोंको देखनेके लिये वहाँसे अन्यत्र न ले जा सकी; तथापि धीरे-धीरे प्रत्येक अङ्गका दर्शन करके ही मैंने तुम्हारे शान्त मुखारविन्दपर दृष्टि डाली है। इस मुखारविन्दको देखकर अब मेरी दृष्टि अन्यत्र जानेमें असमर्थ है।
राधिकाका यह वचन सुनकर पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण हँसने लगे। फिर वे श्रुतियों और स्मृतियोंके मतानुसार तथ्य एवं हितकर वचन बोले।
श्रीकृष्णने कहा— भद्रे! मैंने पूर्वकालमें वहाँ गोलोकमें जो निश्चय किया था, उसका खण्डन नहीं होना चाहिये। प्रिये! तुम क्षणभर ठहरो। मैं तुम्हारा मङ्गल करूँगा। तुम्हारे मनोरथकी पूर्तिका समय स्वयं आ पहुँचा है। राधे! पहले मैंने जिसके लिये जो कुछ लिख दिया है और जिस समय उस मनोरथकी प्राप्तिका निश्चय कर दिया है; उस पूर्व-निश्चयका खण्डन मैं स्वयं ही नहीं कर सकता। फिर विधाताकी क्या विसात है, जो उसे मिटा सके? मैं विधाताका भी विधाता हूँ। मैंने जिनके लिये जो कुछ विधान कर दिया है, उसका ब्रह्मा आदि देवता भी कदापि खण्डन नहीं कर सकते।
इसी बीचमें ब्रह्मा श्रीहरिके सामने आये। उनके हाथोंमें माला और कमण्डलु शोभा पा रहे थे। चारों मुखोंपर मन्द मुस्कान खेल रही थी। निकट जाकर उन्होंने श्रीकृष्णको नमस्कार किया और आगमके अनुसार उनकी स्तुति की। उस समय उनके नेत्रोंसे आँसू झर रहे थे। सम्पूर्ण अङ्गोंमें रोमाञ्च हो आया था और भक्तिभावसे उनका मस्तक झुका हुआ था। स्तुति और नमस्कार करके जगद्धाता ब्रह्मा श्रीहरिके और निकट गये। उन्होंने अपने प्रभुको भक्तिभावसे पुनः प्रणाम किया। फिर वे श्रीराधिकाके समीप गये और माताके चरण-कमलमें मस्तक रखकर उन्होंने भक्तिभावसे नमस्कार किया। शीघ्रतापूर्वक माता राधिकाके चरणारविन्दोंको अपने जटाजालसे वेष्टित करके ब्रह्माजीने कमण्डलुके जलसे प्रसन्नतापूर्वक उनका प्रक्षालन किया। फिर दोनों हाथ जोड़कर वे आगमके अनुसार श्रीराधाकी स्तुति करने लगे।
ब्रह्माजी बोले— हे माता! भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे मुझे तुम्हारे चरणकमलोंके दर्शनका सौभाग्य प्राप्त हुआ है। ये चरण सर्वत्र और विशेषतः भारतवर्षमें सभीके लिये परम दुर्लभ हैं। मैंने पूर्वकालमें पुष्करतीर्थमें सूर्यके प्रकाशमें बैठकर परमात्मा श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये साठ हजार वर्षोंतक तपस्या की। तब वरदाता श्रीहरि मुझे वर देनेके लिये स्वयं पधारे। उनके 'वर माँगो' ऐसा कहनेपर मैंने प्रसन्नतापूर्वक अभीष्ट वर माँगते हुए कहा—'हे गुणातीत परमेश्वर! जो सबके लिये परम दुर्लभ है, उन राधिकाके चरण-कमलका मुझे इसी समय शीघ्र दर्शन कराइये।' मेरी यह बात सुनकर ये श्रीहरि मुझ तपस्वीसे बोले—'वत्स! इस समय क्षमा करो। उपयुक्त समय आनेपर मैं तुम्हें श्रीराधाके चरणारविन्दोंके दर्शन कराऊँगा।' ईश्वरकी आज्ञा निष्फल नहीं होती; इसीलिये मुझे तुम्हारे चरणकमलोंके दर्शन प्राप्त हुए हैं। माता! तुम्हारे ये चरण गोलोकमें तथा इस समय भारतमें भी सबकी मनोवाञ्छाके विषय हैं। सब देवियाँ प्रकृतिकी अंशभूता हैं; अतः वे निश्चय ही जन्य और प्राकृतिक हैं। तुम श्रीकृष्णके आधे अङ्गसे प्रकट हुई हो; अतः सभी दृष्टियोंसे श्रीकृष्णके समान हो। तुम स्वयं श्रीकृष्ण हो और ये श्रीकृष्ण राधा हैं अथवा तुम राधा हो और ये स्वयं श्रीकृष्ण हैं। इस बातका किसीने निरूपण किया हो, ऐसा मैंने वेदोंमें नहीं देखा है। अम्बिके! जैसे गोलोक ब्रह्माण्डसे बाहर और ऊपर है, उसी तरह वैकुण्ठ भी है। माँ! जैसे वैकुण्ठ और गोलोक अजन्य हैं; उसी प्रकार तुम भी अजन्मा हो। जैसे समस्त ब्रह्माण्डमें सभी