भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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४८६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

जीवधारी श्रीकृष्णके ही अंशांश हैं; उसी प्रकार उन सबमें तुम्हीं शक्तिरूपिणी होकर विराजमान हो। समस्त पुरुष श्रीकृष्णके अंश हैं और सारी स्त्रियाँ तुम्हारी अंशभूता हैं। परमात्मा श्रीकृष्णकी तुम देहरूपा हो; अतः तुम्हीं इनकी आधारभूता हो। माँ! इनके प्राणोंसे तुम प्राणवती हो और तुम्हारे प्राणोंसे ये परमेश्वर श्रीहरि प्राणवान् हैं। अहो! क्या किसी शिल्पीने किसी हेतुसे इनका निर्माण किया है? कदापि नहीं। अम्बिके! ये श्रीकृष्ण नित्य हैं और तुम भी नित्या हो। तुम इनकी अंशस्वरूपा हो या ये ही तुम्हारे अंश हैं; इसका निरूपण किसने किया है? मैं जगत्स्रष्टा ब्रह्मा स्वयं वेदोंका प्राकट्य करनेवाला हूँ। उस वेदको गुरुके मुखसे पढ़कर लोग विद्वान् हो जाते हैं; परंतु वेद अथवा पण्डित तुम्हारे गुणों या स्तोत्रोंका शतांश भी वर्णन करनेमें असमर्थ हैं। फिर दूसरा कौन तुम्हारी स्तुति कर सकता है? स्तोत्रोंका जनक है ज्ञान और सदा ज्ञानकी जननी है बुद्धि। माँ राधे! उस बुद्धिकी भी जननी तुम हो। फिर कौन तुम्हारी स्तुति करनेमें समर्थ होगा? जिस वस्तुका सबको प्रत्यक्ष दर्शन हुआ है; उसका वर्णन करनेमें तो कोई भी विद्वान् समर्थ हो सकता है। परंतु जो वस्तु कभी देखने और सुननेमें भी नहीं आयी, उसका निर्वचन (निरूपण) कौन कर सकता है? मैं, महेश्वर और अनन्त कोई भी तुम्हारी स्तुति करनेकी क्षमता नहीं रखते। सरस्वती और वेद भी अपनेको असमर्थ पाते हैं। परमेश्वरि! फिर कौन तुम्हारी स्तुति कर सकता है? मैंने आगमोंका अनुसरण करके तुम्हारे विषयमें जैसा कुछ कहा है, उसके लिये तुम मेरी निन्दा न करना। जो ईश्वरोंके भी ईश्वर परमात्मा हैं, उनकी योग्य और अयोग्यपर भी समान कृपा होती है। जो पालनके योग्य संतान है, उसका क्षण-क्षणमें गुण-दोष प्रकट होता रहता है; परंतु माता और पिता उसके सारे दोषोंको स्नेहपूर्वक क्षमा करते हैं।

यों कहकर जगत्स्रष्टा ब्रह्मा उन दोनोंके सर्ववन्द्य एवं सर्ववाञ्छित चरणकमलोंको प्रणाम करके उनके सामने खड़े हो गये। जो मनुष्य ब्रह्माजीके द्वारा किये गये इस स्तोत्रका तीनों संध्याओंके समय पाठ करता है, वह निश्चय ही राधा-माधवके चरणोंकी भक्ति एवं दास्य प्राप्त कर लेता है। अपने कर्मोंका मूलोच्छेद करके सुदुर्जय मृत्युको भी जीतकर समस्त लोकोंको लाँघता हुआ वह उत्तम गोलोकधाममें चला जाता है।

**भगवान् नारायण कहते हैं—**ब्रह्माजीकी स्तुति सुनकर श्रीराधाने उनसे कहा—‘विधातः! तुम्हारे मनमें जो अभीष्ट हो, वह वर माँग लो।’ राधिकाकी बात सुनकर जगत्स्रष्टा ब्रह्माने उनसे कहा—‘माँ! तुम दोनोंके चरणकमलोंकी भक्ति ही मेरा अभीष्ट वर है, उसे ही मुझे दे दो।’ विधाताके इतना कहते ही श्रीराधाने तत्काल ‘बहुत अच्छा’ कहकर उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। तब लोकनाथ ब्रह्माने पुनः भक्ति-भावसे श्रीराधाको प्रणाम किया। उस समय उन्होंने श्रीराधा और श्रीकृष्णके बीचमें अग्निकी स्थापना करके उसे प्रज्वलित किया। फिर श्रीहरिके स्मरणपूर्वक विधाताने विधिसे उस अग्निमें आहुति डाली। इसके बाद श्रीकृष्ण पुष्पशय्यासे उठकर अग्निके समीप बैठे। फिर ब्रह्माजीकी बतायी हुई विधिसे उन्होंने स्वयं हवन किया। तत्पश्चात् श्रीकृष्ण और राधाको प्रणाम करके ब्रह्माजीने स्वयं पिताके कर्तव्यका पालन करते हुए उन दोनोंसे कौतुक (वैवाहिक मङ्गल-कृत्य) कराये और सात बार अग्निदेवकी परिक्रमा करवायी। इसके बाद राधासे अग्निकी परिक्रमा करवाकर श्रीकृष्णको प्रणाम कराके राधाको उनके पास बैठाया। फिर श्रीकृष्णसे राधाका हाथ ग्रहण कराया और माधवसे सात वैदिक मन्त्र पढ़वाये। तत्पश्चात् वेदज्ञ विधाताने श्रीहरिके वक्षःस्थलपर