भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 497

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४८७ राधिकाका हाथ रखवाकर राधाके पृष्ठदेशमें श्रीकृष्णका हाथ रखवाया और राधासे तीन वैदिक मन्त्रोंका पाठ करवाया। तदनन्तर ब्रह्माने पारिजातके पुष्पोंकी आजानुलम्बिनी माला श्रीराधाके हाथसे श्रीकृष्णके गलेमें डलवायी। तत्पश्चात् कमलजन्मा विधाताने पुनः श्रीराधा और श्रीकृष्णको प्रणाम करके श्रीहरिके हाथसे श्रीराधाके कण्ठमें मनोहर माला डलवायी। फिर श्रीकृष्णको बैठाया और उनके वामपार्श्वमें मन्द-मन्द मुस्कराती हुई श्रीकृष्णहृदया राधाको भी बैठाया। इसके बाद उन दोनोंसे हाथ जुड़वाकर पाँच वैदिक मन्त्र पढ़वाये। तत्पश्चात् विधाताने पुनः श्रीकृष्णको प्रणाम करके, जैसे पिता अपनी पुत्रीका दान करता है, उसी प्रकार राधिकाको उनके हाथमें सौंप दिया और भक्ति- भावसे वे श्रीकृष्णके सामने खड़े हो गये। इसी बीचमें आनन्दित और पुलकित हुए देवगण दुन्दुभि, आनक और मुरज आदि बाजे बजाने लगे। विवाहमण्डपके पास पारिजातके फूलोंकी वर्षा होने लगी। श्रेष्ठ गन्धर्वोंने गीत गाये और झुंड-की-झुंड अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। ब्रह्माजीने श्रीहरिकी स्तुति की और मुस्कराते हुए उनसे कहा—'आप दोनोंके चरणकमलोंमें मेरी भक्ति बढ़े, यही मुझे दक्षिणा दीजिये।' ब्रह्माजीकी बात सुनकर स्वयं श्रीहरिने उनसे कहा—ब्रह्मन् ! मेरे चरणकमलोंमें तुम्हारी सुदृढ़ भक्ति हो। अब तुम अपने स्थानको जाओ। तुम्हारा कल्याण होगा, इसमें संशय नहीं है। वत्स! मैंने जो कार्य तुम्हारे जिम्मे लगाया है, उसका मेरी आज्ञाके अनुसार पालन करो। मुने! श्रीकृष्णका यह आदेश सुनकर जगत्- विधाता ब्रह्मा श्रीराधा-कृष्णको प्रणाम करके प्रसन्नतापूर्वक अपने लोकको चले गये। ब्रह्माजीके चले जानेपर मुस्कराती हुई देवी राधिकाने बाँकी चितवनसे श्रीहरिके मुँहकी ओर देखा और लज्जासे अपना मुँह ढँक लिया। उस समय उनका सर्वाङ्ग पुलकित हो उठा था। वे प्रेमवेदनाका अनुभव कर रही थीं। श्रीहरिको भक्तिभावसे प्रणाम करके श्रीराधा उनकी शय्यापर गयीं। वहाँ चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और केसरका अङ्गराग रखा हुआ था। श्रीराधाने श्रीकृष्णके ललाटमें तिलक करके उनके वक्षःस्थलमें चन्दन लगाया। फिर सुधा और मधुसे भरा हुआ मनोहर रत्नपात्र भक्तिपूर्वक श्रीहरिके हाथमें दिया। जगदीश्वर श्रीकृष्णने उस सुधाका पान किया। इसके बाद श्रीराधाने कर्पूर आदिसे सुवासित सुरम्य ताम्बूल श्रीकृष्णको दिया। श्रीहरिने उसे सादर भोग लगाया। फिर श्रीहरिके दिये हुए सुधारसका मुस्कराती हुई श्रीराधाने आस्वादन किया। साथ ही उनके दिये हुए ताम्बूलको भी श्रीहरिके सामने ही खाया। श्रीकृष्णने प्रसन्नतापूर्वक अपना चबाया हुआ पान श्रीराधाको दिया। राधाने बड़ी भक्तिसे उसे खाया और उनके मुखारविन्दमकरन्दका पान किया। इसके बाद मधुसूदनने भी श्रीराधासे उनका चबाया हुआ पान माँगा, परंतु राधाने नहीं दिया। वे हँसने लगीं और बोलीं- 'क्षमा कीजिये।' माधवने राधाके हाथसे रत्नमय दर्पण ले लिया और राधिकाने भी माधवके हाथसे बलपूर्वक उनकी मुरली छीन ली। राधाने माधवका और माधवने राधाका मन मोह लिया। प्रेम- मिलनके पश्चात् राधाने प्रसन्नतापूर्वक परमात्मा श्रीकृष्णको उनकी मुरली लौटा दी। श्रीकृष्णने भी राधाको उनका दर्पण और उज्ज्वल क्रीड़ा- कमल दे दिया। उनके केशोंकी सुन्दर वेणी बाँध दी और भालदेशमें सिन्दूरका तिलक लगाया। विचित्र पत्र-रचनासे युक्त सुन्दर वेष सँवारा। उन्होंने जैसी वेष-रचना की, उसे विश्वकर्मा भी नहीं जानते हैं; फिर सखियोंकी तो बात ही क्या है? जब राधा श्रीकृष्णकी वेष-रचना करनेको उद्यत हुईं, तब वे किशोरावस्थाका रूप त्यागकर पुनः शिशुरूप हो गये। राधाने देखा, बालरूप