ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण श्रीकृष्ण क्षुधासे पीड़ित हो रहे हैं। नन्दने जैसे भयभीत अच्युतको दिया था, उसी रूपमें वे इस समय दिखायी दिये। राधा व्यथित-हृदयसे लंबी साँस खींचकर इधर-उधर उस नव-तरुण श्रीकृष्णको देखने और ढूँढ़ने लगीं। वे शोकसे पीड़ित और विरहसे व्याकुल हो उठीं। उन्होंने कातरभावसे श्रीकृष्णके उद्देश्यसे यह दीनतापूर्ण बात कही- 'मायेश्वर! आप अपनी इस दासीके प्रति ऐसी माया क्यों करते हैं?' इतना कहकर राधा पृथ्वीपर गिर पड़ीं और रोने लगीं। उधर बालकृष्ण भी वहीं रो रहे थे। इसी समय आकाशवाणी हुई- 'राधे! तुम क्यों रोती हो? श्रीकृष्णके चरणकमलका चिन्तन करो। जबतक रासमण्डलकी आयोजना नहीं होती, तबतक प्रतिदिन रातमें तुम यहाँ आओगी। अपने घरमें अपनी छाया छोड़कर स्वयं यहाँ उपस्थित हो तुम श्रीहरिके साथ नित्य मनोवाञ्छित क्रीड़ा करोगी। अतः रोओ मत। शोक छोड़ो और अपने इन बालरूपधारी प्राणेश्वर मायापतिको गोदमें लेकर घरको जाओ।' जब आकाशवाणीने सुन्दरी राधाको इस प्रकार आश्वासन दिया, तब उसकी बात सुनकर राधाने बालकको गोदमें उठा लिया और पूर्वोक्त पुष्पोद्यान, वन तथा उत्तम रत्नमण्डपकी ओर पुनः दृष्टिपात किया। इसके बाद राधा वृन्दावनसे तुरंत नन्द-मन्दिरकी ओर चल दीं। नारद ! वे देवी मनके समान तीव्र गतिसे चलनेवाली थीं। अतः आधे निमेषमें वहाँ जा पहुँचीं। उनकी वाणी स्निग्ध एवं मधुर थी। आँखें लाल हो गयी थीं। वे यशोदाजीकी गोदमें उस बालकको देनेके लिये उद्यत हो इस प्रकार बोलीं- 'मैया ! व्रजमें आपके स्वामीने मुझे यह बालक घर पहुँचानेके लिये दिया था। भूखसे आतुर होकर रोते हुए इस स्थूलकाय शिशुको लेकर मैं रास्तेभर यातना भोग रही हूँ। मेरा भीगा हुआ वस्त्र इस बच्चेके शरीरमें सट गया है। आकाश बादलोंसे घिरा हुआ है। अत्यन्त दुर्दिन हो रहा है, मार्गमें फिसलन हो रही है। कीच-काच बढ़ गयी है। यशोदाजी ! अब मैं इस बालकका बोझ ढोनेमें असमर्थ हो गयी हूँ। भद्रे ! इसे गोदमें ले लो और स्तन देकर शान्त करो। मैंने बड़ी देरसे घर छोड़ रखा है; अतः जाती हूँ। सती यशोदे ! तुम सुखी रहो।' ऐसा कह बालक देकर राधा अपने घरको चली गयीं। यशोदाने बालकको घरमें ले जाकर चूमा और स्तन पिलाया। राधा अपने घरमें रहकर बाह्यरूपसे गृहकर्ममें तत्पर दिखायी देती थीं; परंतु प्रतिदिन रातमें वहाँ वृन्दावनमें जाकर श्रीहरिके साथ क्रीड़ा करती थीं। वत्स नारद ! इस प्रकार मैंने तुमसे शुभद, सुखद तथा मोक्षदायक पुण्यमय श्रीकृष्णचरित्र कहा। अब अन्य लीलाओंका वर्णन करता हूँ, सुनो। (अध्याय १५) वनमें श्रीकृष्णद्वारा बकासुर, प्रलम्बासुर और केशीका वध, उन सबका गोलोकधाममें गमन, उनके पूर्वजीवनका परिचय, पार्वतीके त्रैमासिक व्रतका सविधि वर्णन तथा नन्दकी आज्ञाके अनुसार समस्त व्रजवासियोंका वृन्दावनमें गमन भगवान् नारायण कहते हैं- मुने ! एक समयकी बात है। माधव - श्रीकृष्ण अन्यान्य बालकों और हलधरके साथ खा-पीकर खेलनेके लिये श्रीवनमें गये। वहाँ मधुसूदनने नाना प्रकारकी बालोचित क्रीड़ाएँ कीं। वह क्रीड़ा समाप्त करके गोपबालकोंके साथ उन्होंने गोधनको आगे बढ़ाया। वहाँ वनमें स्वादिष्ट जल पीकर वे महाबली श्रीकृष्ण उस स्थानसे गोधनसहित