ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ४८९
मधुवनमें गये। उस वनमें एक बलवान् और भयंकर दैत्य था, जिसकी आकृति और मुख बड़े विकराल थे। उसका रंग सफेद था। वह पर्वताकार दैत्य बगुलेके आकारमें दिखायी देता था। उसने देखा, गोष्ठमें गौओंका समुदाय है और ग्वालबालोंके साथ केशव और बलराम भी विद्यमान हैं। फिर तो जैसे अगस्त्यने वातापिको उदरस्थ कर लिया था, उसी प्रकार वह दैत्य वहाँ सबको लीलापूर्वक लील गया। श्रीहरि बकासुरके ग्रास बन गये हैं, यह देख सब देवता भयसे काँप उठे। वे संत्रस्त हो हाहाकार करने लगे और हाथोंमें शस्त्र लेकर दौड़े। इन्द्रने दधीचिमुनिकी हड्डियोंका बना हुआ वज्र चलाया; किंतु उसके प्रहारसे बकासुर मर न सका। केवल उसकी एक पाँख जल गयी। चन्द्रमाने हिमपात किया; किंतु उससे उस दानवको केवल सर्दीके कष्टका अनुभव हुआ। सूर्यपुत्र यमने उसपर यमदण्ड मारा; उससे वह कुण्ठित हो गया—हिल-डुल न सका। वायुने वायव्यास्त्र चलाया, उससे वह एक स्थानसे उठकर दूसरे स्थानपर चला गया। वरुणने शिलाओंकी वर्षा की; उससे उसको बहुत पीड़ा हुई। अग्निदेवने आग्नेयास्त्र चलाकर उसकी सभी पाँखें जला दीं। कुबेरके अर्धचन्द्रसे उसके पैर कट गये। ईशानके शूलसे वह असुर मूर्च्छित हो गया। यह देख ऋषि और मुनि भयभीत हो श्रीकृष्णको आशीर्वाद देने लगे। इसी बीचमें श्रीकृष्ण ब्रह्मतेजसे प्रज्वलित हो उठे। उन परमेश्वरने बाहर और भीतरसे दैत्यके सारे अङ्गोंमें दाह उत्पन्न कर दिया। तब उन सबका वमन करके उस दानवने प्राण त्याग दिये।
इस प्रकार बकासुरका वध करके बलवान् श्रीकृष्ण ग्वालबालों और गौओंके साथ अत्यन्त मनोहर केलि-कदम्ब-काननमें जा पहुँचे। इसी समय वहाँ वृषरूपधारी प्रलम्ब नामक असुर आ पहुँचा, जो बड़ा बलवान्, महान् धूर्त तथा पर्वतके समान विशालकाय था। उसने दोनों सींगोंसे श्रीहरिको उठाकर वहाँ घुमाना आरम्भ किया। यह देख सब ग्वालबाल इधर-उधर भागने और रोने लगे। परंतु बलवान् बलराम जोर-जोरसे हँसने लगे; क्योंकि वे जानते थे कि मेरा भाई साक्षात् परमेश्वर है। उन्होंने बालकोंको समझाया और कहा—'भय किस बातका है?' इधर मधुसूदनने स्वयं उसके दोनों सींग पकड़ लिये और उसे आकाशमें घुमाकर भूतलपर दे मारा। दैत्यराज प्रलम्ब पृथ्वीपर गिरकर अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठा। यह देख सब गोपबालक हँसने, नाचने और खुशीसे गीत गाने लगे। प्रलम्बासुरका वध करके बलरामसहित परमेश्वर श्रीकृष्ण शीघ्र ही गोचारणके कार्यमें जुट गये। वे गौएँ चराते हुए भाण्डीरवनके पास जा पहुँचे।
उस समय माधवको जाते देख बलवान् दैत्यराज केशीने अपनी टापसे धरतीको खोदते हुए शीघ्र ही इन्हें घेर लिया। उसने श्रीहरिको मस्तकपर चढ़ाकर संतुष्ट हो आकाशमें सौ योजनतक उन्हें उछाल-उछालकर घुमाया और अन्तमें पृथ्वीपर गिर पड़ा। उस पापीने श्रीहरिके