ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 500, कुल 810 में से
संदर्भ में पढ़ें४९० || संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
हाथको दाँतसे पकड़ लिया और क्रोधपूर्वक चबाना आरम्भ किया। परंतु श्रीहरिके अङ्ग वज्रके समान कठोर थे। उनके अङ्गका चर्वण करते ही दैत्यके सारे दाँत टूट गये। श्रीकृष्णके तेजसे दग्ध होकर उसने भूतलपर प्राणोंका परित्याग कर दिया। स्वर्गमें दुन्दुभियाँ बजने लगीं और वहाँ फूलोंकी वर्षा आरम्भ हो गयी। इसी बीचमें दिव्यरूपधारी पार्षद विमानपर बैठे हुए वहाँ आ पहुँचे। उन सबके दो भुजाएँ थीं। वे पीताम्बरधारी, किरीट और कुण्डलसे अलंकृत तथा वनमालासे विभूषित थे। उन्होंने विनोदके लिये हाथमें मुरली ले रखी थी। उनके पैरोंमें मञ्जीरकी मधुर ध्वनि हो रही थी। उन पार्षदोंके सभी अङ्ग चन्दनसे चर्चित थे। वे गोपवेष धारण किये बड़े सुन्दर दिखायी देते थे। उनके प्रसन्नमुखपर मन्द हास्यकी छटा छा रही थी। वे श्रीकृष्णभक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये कातर जान पड़ते थे। रत्नोंके सार-तत्त्वसे निर्मित दीप्तिशाली दिव्य रथपर आरूढ़ हो वे भाण्डीरवनमें उस स्थानपर आये, जहाँ श्रीहरि विराजमान थे। उसी समय दिव्य वस्त्र पहने तथा रत्नमय अलंकारोंसे विभूषित हुए तीन पुरुष आये, जो श्रीहरिको प्रणाम करके उनकी स्तुति करते हुए उसी विमानसे उत्तम गोलोकको चले गये। वे तीनों पहलेके वैष्णव पुरुष थे, जो देह त्यागकर दानवी योनिको प्राप्त हुए थे। वे ही इस समय श्रीकृष्णके हाथों मारे जाकर उनके पार्षद हो गये।
नारदजीने पूछा— महाभाग! वे दिव्य वैष्णव पुरुष कौन थे, जो दैत्यरूप हो गये थे? इस बातको बताइये। यह कैसी परम अद्भुत बात सुननेको मिली है?
भगवान् नारायण बोले— ब्रह्मन्! सुनो। मैं इसका प्राचीन इतिहास बता रहा हूँ। मैंने पुष्करतीर्थमें सूर्यग्रहणके अवसरपर साक्षात् महेश्वरके मुखसे इस विषयको सुना था। श्रीहरिके गुण-कीर्तनके प्रसङ्गमें भगवान् शंकरने यह कथा कही थी। गन्धमादन पर्वतपर गन्धर्वराज गन्धवाह रहा करते थे। वे श्रीहरिकी सेवामें तत्पर रहनेवाले महान् तपस्वी और श्रेष्ठ संत थे। मुने! उनके चार पुत्र हुए, जो गन्धर्वोंमें श्रेष्ठ समझे जाते थे। वे सोते और जागते समय दिन-रात श्रीकृष्णके चरणकमलोंका ही चिन्तन करते रहते थे। वे सभी दुर्वासाके शिष्य थे और श्रीकृष्णकी आराधनामें लगे रहते थे। प्रतिदिन कमल चढ़ाकर श्रीहरिकी पूजा करनेके पश्चात् ही जल पीते थे। उन चारोंके नाम इस प्रकार हैं—वसुदेव, सुहोत्र, सुदर्शन और सुपार्श्व। वे चारों श्रेष्ठ वैष्णव थे और पुष्करमें तपस्या करते थे। चिरकालतक तपस्या करनेके पश्चात् उन्होंने मन्त्रको सिद्ध कर लिया था। उन चारोंमें जो ज्येष्ठ वसुदेव था, वह दुर्वासासे योग्य शिक्षा पाकर योगियोंमें श्रेष्ठ और सिद्ध हो गया। उसने विवाह नहीं किया। वह ब्रह्मतेजसे प्रज्वलित हो तत्काल देह त्यागकर श्रीकृष्णका पार्षद हो गया। एक दिन वे तीनों भाई चित्रसरोवरके तटपर गये। वे सूर्योदयकालमें श्रीहरिकी पूजाके लिये कमल लेना चाहते थे। मुने! कमलोंका संग्रह