भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 501

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४९१ करके जाते हुए उन वैष्णवोंको जब भगवान् शंकरके सेवकोंने देखा, तब वे सब उन्हें बाँधकर अपने साथ ले गये। शंकरके सेवक शरीरसे बलिष्ठ थे; अतः उन दुर्बल वैष्णवोंको पकड़कर उन्हें शंकरजीके पास ले गये। भगवान् शंकरको देखकर उन सब वैष्णवोंने भूतलपर माथा टेक उन्हें प्रणाम किया। शिवजी उन्हें उत्तम आशीर्वाद दे शीघ्र ही उनसे वार्तालापके लिये उद्यत हुए। उस समय उनके प्रसन्नमुखपर मुस्कराहट खेल रही थी और वे उन भक्तजनोंपर अनुग्रह करनेके लिये कातर हो चुके थे। भगवान् शिवने पूछा- पार्वतीके सरोवरमें प्रवेश करके कमल लेनेवाले तुमलोग कौन हो ? पार्वतीके व्रतकी पूर्तिके लिये एक लाख यक्ष उस सरोवरकी रक्षा करते हैं। पार्वती पतिविषयक सौभाग्यकी वृद्धिके लिये जब त्रैमासिक व्रत आरम्भ करती हैं, तब वे लगातार तीन महीनेतक श्रीहरिको भक्तिभावसे प्रतिदिन एक सहस्र कमल चढ़ाती हैं। भगवान् शिवका यह वचन सुनकर वे तीनों वैष्णव भयभीत हो भक्तिसे मस्तक झुका हाथ जोड़कर बोले। गन्धर्वोंने कहा - प्रभो! हमलोग गन्धर्वराज गन्धवाहके पुत्र गन्धर्वोंमें श्रेष्ठ हैं। महेश्वर ! हम लोग प्रतिदिन श्रीहरिको कमल चढ़ाकर ही जल पीते हैं। हे नाथ! हम यह नहीं जानते थे कि पार्वतीके द्वारा इस सरोवरकी रक्षा की जाती है। आप यह सारे कमल ले लीजिये और अपने व्रतको सफल बनाइये। महादेव ! हम आज कमल नहीं चढ़ायेंगे और जल भी नहीं पीयेंगे। हमने आपको ही वे कमल अर्पित कर दिये। जिनके चरण-कमलका प्रतिदिन चिन्तन करके हम कमलसे पूजा करते हैं, आज साक्षात् उन्हींको कमल अर्पण करके हम सब-के-सब पवित्र हो गये। प्रभो! ब्रह्म एक ही है, दूसरा नहीं है। उनके कहाँ देह और कहाँ रूप ? भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही भगवान् शरीर धारण करते हैं। रूप-भेद मायासे ही प्रतीत होता है। प्रभो ! आप ये कमल ले लीजिये; क्योंकि आप ही हमारे प्रभु हैं। अच्युत ! हमारा हृदय जिसके ध्यानसे परिपूर्ण है; आप अपने उसी रूपका हमें दर्शन कराइये। जिसकी दो भुजाएँ हैं; कमनीय किशोर अवस्था है; श्यामसुन्दर रूप है; हाथमें विनोदकी साधनभूता मुरली है; जो पीताम्बरधारी है; जिसके एक मुख और दो नेत्र हैं, वे चन्दन और अगुरुसे चर्चित हैं; जिसके प्रसन्नमुखपर मन्द मुस्कानकी प्रभा फैल रही है; जो रत्नमय अलंकारोंसे विभूषित है। जिसका वक्षःस्थल मणिराज कौस्तुभकी कान्तिसे अत्यन्त उज्ज्वल दिखायी देता है; जिसकी चूड़ामें मोरका पंख लगा है; जो मालतीकी मालासे विभूषित है; पारिजातके फूलोंके हारोंसे अलंकृत है; करोड़ों कन्दर्पोंके लावण्यका मनोहर लीलाधाम है; समूह-की-समूह गोपियाँ मन्द मुस्कान और बाँकी चितवनसे जिसकी ओर देखा करती हैं; जो नूतन यौवनसे सम्पन्न तथा राधाके वक्षःस्थलपर विराजमान है; ब्रह्मा आदि जिसकी स्तुति करते हैं; जो सबके लिये वन्दनीय, चिन्तनीय और वाञ्छनीय है और जो स्वात्माराम, पूर्णकाम तथा भक्तोंपर अनुग्रहके लिये कातर रहनेवाला है, आपके उसी रूपका हम दर्शन करना चाहते हैं। ऐसा कहकर वे श्रेष्ठ गन्धर्व भगवान् शंकरके सामने खड़े हो गये। श्रीकृष्णके रूपका वर्णन सुनकर भगवान् शंकरके श्रीअङ्गोंमें रोमाञ्च हो आया। उनके नेत्रोंमें आँसू भर आये। वे गन्धर्वोंकी उक्त बातें सुनकर उनसे इस प्रकार बोले - 'मैंने यह जान लिया था कि तुमलोग श्रेष्ठ वैष्णव हो और अपने चरणकमलोंकी धूलसे पृथ्वीको पवित्र करनेके लिये भ्रमण कर रहे हो। मैं श्रीकृष्णभक्तके दर्शनकी सदा ही इच्छा करता रहता हूँ; क्योंकि साधु-संत तीनों लोकोंमें