भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 502, कुल 810 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 502

४९२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण दुर्लभ हैं। तुमलोग मुझे पार्वती और देवताओंसे भी बढ़कर सदा प्रिय हो। मुझे वैष्णवजन अपने तथा अपने भक्तोंसे भी अधिक प्रिय हैं। परंतु मैंने पूर्वकालमें जो प्रतिज्ञा कर रखी है, वह भी व्यर्थ नहीं होनी चाहिये। महाभाग वैष्णवो! सुनो। मैंने कह रखा है कि पार्वतीके व्रतके समय जो लोग किसी अन्य व्रतके निमित्त इस सरोवरसे कमल ले जायेंगे वे शीघ्र ही आसुरी योनिको प्राप्त होंगे, इसमें संशय नहीं है। श्रीकृष्णके भक्तोंका कहीं भी अशुभ नहीं होता है। तुमलोग पहले दानवी योनिमें पड़कर फिर निश्चय ही गोलोकमें पधारोगे। तुम्हारे मनमें श्रीकृष्णके रूपका प्रत्यक्ष दर्शन करनेके लिये उत्कण्ठा है। अतः बच्चो! तुम्हें भारतवर्षके वृन्दावनमें उस रूपका अवश्य दर्शन होगा। श्रीकृष्णको देखकर उन्हींके हाथसे मृत्युको प्राप्त हो तुम वैष्णवशिरोमणि बन जाओगे और दिव्य विमानपर आरूढ़ हो हरिधामको पधारोगे। तुमलोग अभी यहाँ उस वाञ्छनीय रूपको देखनेके लिये उत्सुक हो। अतः वह सब देखो।' ऐसा कहकर भगवान् शिवने उन्हें उस रूपके दर्शन कराये। उस रूपके दर्शन करके उन वैष्णवोंके नेत्रोंमें आँसू भर आये। वे सर्वरूपी श्रीहरिको प्रणाम करके दानवी योनिमें चले गये। इसलिये वे दानवेश्वर हुए। वसुदेव तो पहले ही मुक्त हो चुका था। सुहोत्र बकासुर, सुदर्शन प्रलम्ब और स्वयं सुपार्श्व केशी हुआ था। भगवान् शंकरके वरदानसे श्रीहरिके परम उत्तम रूपके दर्शन करके उन्हींके हाथसे मृत्युको प्राप्त हो वे उनके परम धाममें चले गये। विप्रवर! श्रीहरिका यह अद्भुत चरित्र कहा गया। बक, प्रलम्ब और केशीके उद्धारका यह प्रसङ्ग वाचकों और श्रोताओंको मोक्ष प्रदान करनेवाला है। नारदजीने पूछा- महाभाग! आपके कृपा- प्रसादसे यह सारी अद्भुत बात मैंने सुनी। अब मैं यह सुनना चाहता हूँ कि पार्वतीने कौन-सा व्रत किया था? उस व्रतके आराध्यदेव कौन हैं? उसका फल क्या है और उसमें पालन करनेयोग्य नियम क्या है? भगवन्! उस व्रतके लिये उपयोगी द्रव्य कौन-कौन-से हैं? कितने समयतक वह व्रत किया जाता है और उसकी प्रतिष्ठामें क्या-क्या करना आवश्यक होता है? प्रभो! भलीभाँति विचारकर बताइये। इसे सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल है। श्रीनारायण बोले- मुने! यह 'त्रैमासिक' नामक व्रत है, जो नारीके पतिविषयक सौभाग्यको बढ़ानेवाला है। इस व्रतके आराध्य देवता हैं- राधिकासहित भगवान् श्रीकृष्ण। उत्तरायणके विषुव * योगमें इसका आरम्भ होता है और दक्षिणायन आरम्भ होनेतक इसकी समाप्ति हो जाती है। वैशाखकी संक्रान्तिसे एक दिन पहले संयमपूर्वक रहकर निश्चय ही हविष्यका सेवन करे। फिर वैशाखकी संक्रान्तिके दिन स्नान करके गङ्गातटपर व्रतका संकल्प ले। तदनन्तर व्रती पुरुष कलशपर, मणिमें, शालग्राम-शिलामें अथवा जलमें राधासहित श्रीकृष्णका पूजन करे। पहले पाँच देवताओंकी पूजा करके भक्तिभावसे राधावल्लभ श्रीकृष्णका ध्यान करे। उनके सामवेदोक्त ध्यानका वर्णन करता हूँ, सुनो। भगवान् श्रीकृष्णकी अङ्गकान्ति सजल जलधरके समान श्याम है। वे रेशमी पीताम्बर धारण करते हैं। उनका मुख शरत्कालकी पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान मनोहर है। उसपर मन्द हासकी प्रभा फैल रही है। नेत्र शरद्-ऋतुके प्रफुल्ल कमलोंकी शोभाको तिरस्कृत कर रहे हैं। उनमें सुन्दर अञ्जन लगा हुआ है। वे गोपियोंके मनको बारंबार मोहते रहते हैं। राधा उनकी ओर देख रही हैं। वे राधाके वक्षःस्थलमें विराजमान हैं। ब्रह्मा, अनन्त, शिव और धर्म आदि देवता उनकी स्तुति करते हैं।

  • ज्योतिषके अनुसार वह समय जब कि सूर्य विषुव रेखापर पहुँचता है और दिन-रात दोनों बराबर होते हैं।
ब्रह्मवैवर्त पुराण · पृष्ठ 502, कुल 810 में से · BharatKosha