भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 503, कुल 810 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 503

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४९३

इस प्रकार श्रीकृष्णका ध्यान करके व्रती पुरुष उस ध्यानके द्वारा ही उनका सानन्द आवाहन करे। इसके बाद वह राधाका ध्यान करे। वह ध्यान यजुर्वेदकी माध्यन्दिनशाखामें वर्णित है। राधा रासेश्वरी हैं, रमणीया हैं और रासोल्लास-रसके लिये उत्सुक रहती हैं। रासमण्डलके मध्यभागमें उनका स्थान है। वे रासकी अधिष्ठात्री देवी हैं। रासेश्वरके वक्षःस्थलमें वास करती हैं। रासकी रसिका हैं। रसिकशेखर श्यामसुन्दरकी प्रिया हैं। रसिकाओंमें श्रेष्ठ हैं। सुरम्य रमारूपिणी हैं। प्रियतमके साथ रमणके लिये उत्सुक रहती हैं। उनके नेत्र शरत्कालके प्रफुल्ल कमलोंकी शोभाको तिरस्कृत करते हैं। वे बाँकी भौंहोंसे सुशोभित होती हैं। उनके नेत्रोंमें सुरमा शोभा पा रहा है। शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति सुन्दर मुखपर मन्द मुस्कानकी प्रभाके कारण उनकी मनोहरता बहुत बढ़ गयी है। मनोहर चम्पाके समान उनकी अङ्गकान्ति सुनहरी दिखायी देती है। चन्दन, कस्तूरीकी बेंदी तथा सिन्दूर-बिन्दुसे उनका शृङ्गार किया गया है। कपोलोंपर मनोहर पत्रावलीकी रचना शोभा देती है। अग्निशुद्ध दिव्य वस्त्रसे उनकी उज्ज्वलता बढ़ गयी है। उत्तम रत्नोंद्वारा निर्मित कुण्डलोंकी कान्तिसे उनके सुन्दर कपोल प्रकाशित हो रहे हैं। रत्नेन्द्रसाररचित हारसे वक्षःस्थल उद्भासित हो रहा है। रत्ननिर्मित कङ्कण, केयूर तथा किङ्किणी रत्नसे उनके अङ्गोंकी अपूर्व शोभा हो रही है। उत्तम रत्नोंके सारतत्त्वसे रचित मञ्जीरोंकी झनकारसे उनके दोनों चरण सुशोभित होते हैं। ब्रह्मा आदिके भी सेवनीय श्रीकृष्ण स्वयं ही उनकी सेवा करते हैं। सर्वेश्वरके द्वारा उनकी स्तुति की जाती है तथा वे सबकी कारणस्वरूपा हैं। ऐसी श्रीराधाका मैं भजन करता हूँ। इस प्रकार ध्यान करके श्रीकृष्णके साथ उनका पूजन करे*।

प्रतिदिन भक्तिभावसे सोलह उपचार चढ़ाकर पूजा करे। व्रती पुरुष प्रत्येक उपचारको पृथक्-पृथक् करके सबको बारी-बारीसे प्रसन्नतापूर्वक अर्पित करे। मुने! नित्यप्रति एक सौ आठ दिव्य सहस्रदल कमल लेकर उनकी एक सौ आठ आहुतियाँ दे। भक्तिभावसे 'कृष्णाय स्वाहा' इस मन्त्रका उच्चारण करके यत्नपूर्वक वे आहुतियाँ देनी चाहिये। आम और केलेके कच्चे या पके फलको लेकर उसकी एक सौ आठ आहुतियाँ भक्तिभावसे दे। फल अखण्ड होने चाहिये। मुने! प्रतिदिन सौ ब्राह्मणोंको भक्तिपूर्वक भोजन करावे। व्रतीको नित्य एक सौ आठ आहुतियोंका हवन करना चाहिये। वे आहुतियाँ भक्तिपूर्वक राधिका सहित श्रीकृष्णको देनी चाहिये। नारद! घृतमिश्रित तिलसे भी हवन करे। नित्य बाजे बजावे और श्रीहरिका कीर्तन करावे।

तीन मासतक इस नियमका पालन करके उसके बाद व्रतकी प्रतिष्ठा करे। नारद! प्रतिष्ठाके


* ध्यायेत् तदा राधिकाञ्च ध्यानं माध्यन्दिनेरितम्। राधां रासेश्वरीं रम्यां रासोल्लासरसोत्सुकाम्॥
रासमण्डलमध्यस्थां रासाधिष्ठातृदेवताम्। रासेशवक्षःस्थलस्थां रसिकां रसिकप्रियाम्॥
रसिकप्रवरां रम्यां रमां च रमणोत्सुकाम्। शरद्वाजीवराजीनां प्रभामोचनलोचनाम्॥
वक्रभ्रूभङ्गसंयुक्तामञ्जनेनैव रञ्जिताम्। शरत्पार्वणचन्द्रास्यामीषद्धास्यमनोहराम् ॥
चारुचम्पकवर्णाभां चन्दनेन विभूषिताम्। कस्तूरीबिन्दुना सार्द्धं सिन्दूरबिन्दुना युताम्॥
चारुपत्रावलीयुक्तां वह्निशुद्धांशुकोज्ज्वलाम्। सद्रत्नकुण्डलाभ्यां च सुकपोलस्थ्लोज्ज्वलाम्॥
रत्नेन्द्रसारहारेण वक्षःस्थलविराजिताम्। रत्नकङ्कणकेयूरकिङ्किणीरत्नरञ्जिताम् ॥
सद्रत्नसाररचिताक्वणन्मञ्जीररञ्जिताम् । ब्रह्मादिभिश्च सेव्येन श्रीकृष्णेनैव सेविताम्॥
सर्वेशेन स्तूयमानां सर्वबीजां भजाम्यहम्। इति ध्यात्वा च कृष्णेन सहितां तां च पूजयेत्॥
(१६।८५–९३)