भारतकोश
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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

७१- श्रीकृष्ण, बलदेव और अन्य गोप-गोपियोंका गोकुल छोड़कर वृन्दावनके लिये प्रस्थान

४८८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण श्रीकृष्ण क्षुधासे पीड़ित हो रहे हैं। नन्दने जैसे भयभीत अच्युतको दिया था, उसी रूपमें वे इस समय दिखायी दिये। राधा व्यथित-हृदयसे लंबी साँस खींचकर इधर-उधर उस नव-तरुण श्रीकृष्णको देखने और ढूँढ़ने लगीं। वे शोकसे पीड़ित और विरहसे व्याकुल हो उठीं। उन्होंने कातरभावसे श्रीकृष्णके उद्देश्यसे यह दीनतापूर्ण बात कही- 'मायेश्वर! आप अपनी इस दासीके प्रति ऐसी माया क्यों करते हैं?' इतना कहकर राधा पृथ्वीपर गिर पड़ीं और रोने लगीं। उधर बालकृष्ण भी वहीं रो रहे थे। इसी समय आकाशवाणी हुई- 'राधे! तुम क्यों रोती हो? श्रीकृष्णके चरणकमलका चिन्तन करो। जबतक रासमण्डलकी आयोजना नहीं होती, तबतक प्रतिदिन रातमें तुम यहाँ आओगी। अपने घरमें अपनी छाया छोड़कर स्वयं यहाँ उपस्थित हो तुम श्रीहरिके साथ नित्य मनोवाञ्छित क्रीड़ा करोगी। अतः रोओ मत। शोक छोड़ो और अपने इन बालरूपधारी प्राणेश्वर मायापतिको गोदमें लेकर घरको जाओ।' जब आकाशवाणीने सुन्दरी राधाको इस प्रकार आश्वासन दिया, तब उसकी बात सुनकर राधाने बालकको गोदमें उठा लिया और पूर्वोक्त पुष्पोद्यान, वन तथा उत्तम रत्नमण्डपकी ओर पुनः दृष्टिपात किया। इसके बाद राधा वृन्दावनसे तुरंत नन्द-मन्दिरकी ओर चल दीं। नारद ! वे देवी मनके समान तीव्र गतिसे चलनेवाली थीं। अतः आधे निमेषमें वहाँ जा पहुँचीं। उनकी वाणी स्निग्ध एवं मधुर थी। आँखें लाल हो गयी थीं। वे यशोदाजीकी गोदमें उस बालकको देनेके लिये उद्यत हो इस प्रकार बोलीं- 'मैया ! व्रजमें आपके स्वामीने मुझे यह बालक घर पहुँचानेके लिये दिया था। भूखसे आतुर होकर रोते हुए इस स्थूलकाय शिशुको लेकर मैं रास्तेभर यातना भोग रही हूँ। मेरा भीगा हुआ वस्त्र इस बच्चेके शरीरमें सट गया है। आकाश बादलोंसे घिरा हुआ है। अत्यन्त दुर्दिन हो रहा है, मार्गमें फिसलन हो रही है। कीच-काच बढ़ गयी है। यशोदाजी ! अब मैं इस बालकका बोझ ढोनेमें असमर्थ हो गयी हूँ। भद्रे ! इसे गोदमें ले लो और स्तन देकर शान्त करो। मैंने बड़ी देरसे घर छोड़ रखा है; अतः जाती हूँ। सती यशोदे ! तुम सुखी रहो।' ऐसा कह बालक देकर राधा अपने घरको चली गयीं। यशोदाने बालकको घरमें ले जाकर चूमा और स्तन पिलाया। राधा अपने घरमें रहकर बाह्यरूपसे गृहकर्ममें तत्पर दिखायी देती थीं; परंतु प्रतिदिन रातमें वहाँ वृन्दावनमें जाकर श्रीहरिके साथ क्रीड़ा करती थीं। वत्स नारद ! इस प्रकार मैंने तुमसे शुभद, सुखद तथा मोक्षदायक पुण्यमय श्रीकृष्णचरित्र कहा। अब अन्य लीलाओंका वर्णन करता हूँ, सुनो। (अध्याय १५) वनमें श्रीकृष्णद्वारा बकासुर, प्रलम्बासुर और केशीका वध, उन सबका गोलोकधाममें गमन, उनके पूर्वजीवनका परिचय, पार्वतीके त्रैमासिक व्रतका सविधि वर्णन तथा नन्दकी आज्ञाके अनुसार समस्त व्रजवासियोंका वृन्दावनमें गमन भगवान् नारायण कहते हैं- मुने ! एक समयकी बात है। माधव - श्रीकृष्ण अन्यान्य बालकों और हलधरके साथ खा-पीकर खेलनेके लिये श्रीवनमें गये। वहाँ मधुसूदनने नाना प्रकारकी बालोचित क्रीड़ाएँ कीं। वह क्रीड़ा समाप्त करके गोपबालकोंके साथ उन्होंने गोधनको आगे बढ़ाया। वहाँ वनमें स्वादिष्ट जल पीकर वे महाबली श्रीकृष्ण उस स्थानसे गोधनसहित

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४८९

मधुवनमें गये। उस वनमें एक बलवान् और भयंकर दैत्य था, जिसकी आकृति और मुख बड़े विकराल थे। उसका रंग सफेद था। वह पर्वताकार दैत्य बगुलेके आकारमें दिखायी देता था। उसने देखा, गोष्ठमें गौओंका समुदाय है और ग्वालबालोंके साथ केशव और बलराम भी विद्यमान हैं। फिर तो जैसे अगस्त्यने वातापिको उदरस्थ कर लिया था, उसी प्रकार वह दैत्य वहाँ सबको लीलापूर्वक लील गया। श्रीहरि बकासुरके ग्रास बन गये हैं, यह देख सब देवता भयसे काँप उठे। वे संत्रस्त हो हाहाकार करने लगे और हाथोंमें शस्त्र लेकर दौड़े। इन्द्रने दधीचिमुनिकी हड्डियोंका बना हुआ वज्र चलाया; किंतु उसके प्रहारसे बकासुर मर न सका। केवल उसकी एक पाँख जल गयी। चन्द्रमाने हिमपात किया; किंतु उससे उस दानवको केवल सर्दीके कष्टका अनुभव हुआ। सूर्यपुत्र यमने उसपर यमदण्ड मारा; उससे वह कुण्ठित हो गया—हिल-डुल न सका। वायुने वायव्यास्त्र चलाया, उससे वह एक स्थानसे उठकर दूसरे स्थानपर चला गया। वरुणने शिलाओंकी वर्षा की; उससे उसको बहुत पीड़ा हुई। अग्निदेवने आग्नेयास्त्र चलाकर उसकी सभी पाँखें जला दीं। कुबेरके अर्धचन्द्रसे उसके पैर कट गये। ईशानके शूलसे वह असुर मूर्च्छित हो गया। यह देख ऋषि और मुनि भयभीत हो श्रीकृष्णको आशीर्वाद देने लगे। इसी बीचमें श्रीकृष्ण ब्रह्मतेजसे प्रज्वलित हो उठे। उन परमेश्वरने बाहर और भीतरसे दैत्यके सारे अङ्गोंमें दाह उत्पन्न कर दिया। तब उन सबका वमन करके उस दानवने प्राण त्याग दिये।

इस प्रकार बकासुरका वध करके बलवान् श्रीकृष्ण ग्वालबालों और गौओंके साथ अत्यन्त मनोहर केलि-कदम्ब-काननमें जा पहुँचे। इसी समय वहाँ वृषरूपधारी प्रलम्ब नामक असुर आ पहुँचा, जो बड़ा बलवान्, महान् धूर्त तथा पर्वतके समान विशालकाय था। उसने दोनों सींगोंसे श्रीहरिको उठाकर वहाँ घुमाना आरम्भ किया। यह देख सब ग्वालबाल इधर-उधर भागने और रोने लगे। परंतु बलवान् बलराम जोर-जोरसे हँसने लगे; क्योंकि वे जानते थे कि मेरा भाई साक्षात् परमेश्वर है। उन्होंने बालकोंको समझाया और कहा—'भय किस बातका है?' इधर मधुसूदनने स्वयं उसके दोनों सींग पकड़ लिये और उसे आकाशमें घुमाकर भूतलपर दे मारा। दैत्यराज प्रलम्ब पृथ्वीपर गिरकर अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठा। यह देख सब गोपबालक हँसने, नाचने और खुशीसे गीत गाने लगे। प्रलम्बासुरका वध करके बलरामसहित परमेश्वर श्रीकृष्ण शीघ्र ही गोचारणके कार्यमें जुट गये। वे गौएँ चराते हुए भाण्डीरवनके पास जा पहुँचे।

उस समय माधवको जाते देख बलवान् दैत्यराज केशीने अपनी टापसे धरतीको खोदते हुए शीघ्र ही इन्हें घेर लिया। उसने श्रीहरिको मस्तकपर चढ़ाकर संतुष्ट हो आकाशमें सौ योजनतक उन्हें उछाल-उछालकर घुमाया और अन्तमें पृथ्वीपर गिर पड़ा। उस पापीने श्रीहरिके

४९० || संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

हाथको दाँतसे पकड़ लिया और क्रोधपूर्वक चबाना आरम्भ किया। परंतु श्रीहरिके अङ्ग वज्रके समान कठोर थे। उनके अङ्गका चर्वण करते ही दैत्यके सारे दाँत टूट गये। श्रीकृष्णके तेजसे दग्ध होकर उसने भूतलपर प्राणोंका परित्याग कर दिया। स्वर्गमें दुन्दुभियाँ बजने लगीं और वहाँ फूलोंकी वर्षा आरम्भ हो गयी। इसी बीचमें दिव्यरूपधारी पार्षद विमानपर बैठे हुए वहाँ आ पहुँचे। उन सबके दो भुजाएँ थीं। वे पीताम्बरधारी, किरीट और कुण्डलसे अलंकृत तथा वनमालासे विभूषित थे। उन्होंने विनोदके लिये हाथमें मुरली ले रखी थी। उनके पैरोंमें मञ्जीरकी मधुर ध्वनि हो रही थी। उन पार्षदोंके सभी अङ्ग चन्दनसे चर्चित थे। वे गोपवेष धारण किये बड़े सुन्दर दिखायी देते थे। उनके प्रसन्नमुखपर मन्द हास्यकी छटा छा रही थी। वे श्रीकृष्णभक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये कातर जान पड़ते थे। रत्नोंके सार-तत्त्वसे निर्मित दीप्तिशाली दिव्य रथपर आरूढ़ हो वे भाण्डीरवनमें उस स्थानपर आये, जहाँ श्रीहरि विराजमान थे। उसी समय दिव्य वस्त्र पहने तथा रत्नमय अलंकारोंसे विभूषित हुए तीन पुरुष आये, जो श्रीहरिको प्रणाम करके उनकी स्तुति करते हुए उसी विमानसे उत्तम गोलोकको चले गये। वे तीनों पहलेके वैष्णव पुरुष थे, जो देह त्यागकर दानवी योनिको प्राप्त हुए थे। वे ही इस समय श्रीकृष्णके हाथों मारे जाकर उनके पार्षद हो गये।

नारदजीने पूछा— महाभाग! वे दिव्य वैष्णव पुरुष कौन थे, जो दैत्यरूप हो गये थे? इस बातको बताइये। यह कैसी परम अद्भुत बात सुननेको मिली है?

भगवान् नारायण बोले— ब्रह्मन्! सुनो। मैं इसका प्राचीन इतिहास बता रहा हूँ। मैंने पुष्करतीर्थमें सूर्यग्रहणके अवसरपर साक्षात् महेश्वरके मुखसे इस विषयको सुना था। श्रीहरिके गुण-कीर्तनके प्रसङ्गमें भगवान् शंकरने यह कथा कही थी। गन्धमादन पर्वतपर गन्धर्वराज गन्धवाह रहा करते थे। वे श्रीहरिकी सेवामें तत्पर रहनेवाले महान् तपस्वी और श्रेष्ठ संत थे। मुने! उनके चार पुत्र हुए, जो गन्धर्वोंमें श्रेष्ठ समझे जाते थे। वे सोते और जागते समय दिन-रात श्रीकृष्णके चरणकमलोंका ही चिन्तन करते रहते थे। वे सभी दुर्वासाके शिष्य थे और श्रीकृष्णकी आराधनामें लगे रहते थे। प्रतिदिन कमल चढ़ाकर श्रीहरिकी पूजा करनेके पश्चात् ही जल पीते थे। उन चारोंके नाम इस प्रकार हैं—वसुदेव, सुहोत्र, सुदर्शन और सुपार्श्व। वे चारों श्रेष्ठ वैष्णव थे और पुष्करमें तपस्या करते थे। चिरकालतक तपस्या करनेके पश्चात् उन्होंने मन्त्रको सिद्ध कर लिया था। उन चारोंमें जो ज्येष्ठ वसुदेव था, वह दुर्वासासे योग्य शिक्षा पाकर योगियोंमें श्रेष्ठ और सिद्ध हो गया। उसने विवाह नहीं किया। वह ब्रह्मतेजसे प्रज्वलित हो तत्काल देह त्यागकर श्रीकृष्णका पार्षद हो गया। एक दिन वे तीनों भाई चित्रसरोवरके तटपर गये। वे सूर्योदयकालमें श्रीहरिकी पूजाके लिये कमल लेना चाहते थे। मुने! कमलोंका संग्रह

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४९१ करके जाते हुए उन वैष्णवोंको जब भगवान् शंकरके सेवकोंने देखा, तब वे सब उन्हें बाँधकर अपने साथ ले गये। शंकरके सेवक शरीरसे बलिष्ठ थे; अतः उन दुर्बल वैष्णवोंको पकड़कर उन्हें शंकरजीके पास ले गये। भगवान् शंकरको देखकर उन सब वैष्णवोंने भूतलपर माथा टेक उन्हें प्रणाम किया। शिवजी उन्हें उत्तम आशीर्वाद दे शीघ्र ही उनसे वार्तालापके लिये उद्यत हुए। उस समय उनके प्रसन्नमुखपर मुस्कराहट खेल रही थी और वे उन भक्तजनोंपर अनुग्रह करनेके लिये कातर हो चुके थे। भगवान् शिवने पूछा- पार्वतीके सरोवरमें प्रवेश करके कमल लेनेवाले तुमलोग कौन हो ? पार्वतीके व्रतकी पूर्तिके लिये एक लाख यक्ष उस सरोवरकी रक्षा करते हैं। पार्वती पतिविषयक सौभाग्यकी वृद्धिके लिये जब त्रैमासिक व्रत आरम्भ करती हैं, तब वे लगातार तीन महीनेतक श्रीहरिको भक्तिभावसे प्रतिदिन एक सहस्र कमल चढ़ाती हैं। भगवान् शिवका यह वचन सुनकर वे तीनों वैष्णव भयभीत हो भक्तिसे मस्तक झुका हाथ जोड़कर बोले। गन्धर्वोंने कहा - प्रभो! हमलोग गन्धर्वराज गन्धवाहके पुत्र गन्धर्वोंमें श्रेष्ठ हैं। महेश्वर ! हम लोग प्रतिदिन श्रीहरिको कमल चढ़ाकर ही जल पीते हैं। हे नाथ! हम यह नहीं जानते थे कि पार्वतीके द्वारा इस सरोवरकी रक्षा की जाती है। आप यह सारे कमल ले लीजिये और अपने व्रतको सफल बनाइये। महादेव ! हम आज कमल नहीं चढ़ायेंगे और जल भी नहीं पीयेंगे। हमने आपको ही वे कमल अर्पित कर दिये। जिनके चरण-कमलका प्रतिदिन चिन्तन करके हम कमलसे पूजा करते हैं, आज साक्षात् उन्हींको कमल अर्पण करके हम सब-के-सब पवित्र हो गये। प्रभो! ब्रह्म एक ही है, दूसरा नहीं है। उनके कहाँ देह और कहाँ रूप ? भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही भगवान् शरीर धारण करते हैं। रूप-भेद मायासे ही प्रतीत होता है। प्रभो ! आप ये कमल ले लीजिये; क्योंकि आप ही हमारे प्रभु हैं। अच्युत ! हमारा हृदय जिसके ध्यानसे परिपूर्ण है; आप अपने उसी रूपका हमें दर्शन कराइये। जिसकी दो भुजाएँ हैं; कमनीय किशोर अवस्था है; श्यामसुन्दर रूप है; हाथमें विनोदकी साधनभूता मुरली है; जो पीताम्बरधारी है; जिसके एक मुख और दो नेत्र हैं, वे चन्दन और अगुरुसे चर्चित हैं; जिसके प्रसन्नमुखपर मन्द मुस्कानकी प्रभा फैल रही है; जो रत्नमय अलंकारोंसे विभूषित है। जिसका वक्षःस्थल मणिराज कौस्तुभकी कान्तिसे अत्यन्त उज्ज्वल दिखायी देता है; जिसकी चूड़ामें मोरका पंख लगा है; जो मालतीकी मालासे विभूषित है; पारिजातके फूलोंके हारोंसे अलंकृत है; करोड़ों कन्दर्पोंके लावण्यका मनोहर लीलाधाम है; समूह-की-समूह गोपियाँ मन्द मुस्कान और बाँकी चितवनसे जिसकी ओर देखा करती हैं; जो नूतन यौवनसे सम्पन्न तथा राधाके वक्षःस्थलपर विराजमान है; ब्रह्मा आदि जिसकी स्तुति करते हैं; जो सबके लिये वन्दनीय, चिन्तनीय और वाञ्छनीय है और जो स्वात्माराम, पूर्णकाम तथा भक्तोंपर अनुग्रहके लिये कातर रहनेवाला है, आपके उसी रूपका हम दर्शन करना चाहते हैं। ऐसा कहकर वे श्रेष्ठ गन्धर्व भगवान् शंकरके सामने खड़े हो गये। श्रीकृष्णके रूपका वर्णन सुनकर भगवान् शंकरके श्रीअङ्गोंमें रोमाञ्च हो आया। उनके नेत्रोंमें आँसू भर आये। वे गन्धर्वोंकी उक्त बातें सुनकर उनसे इस प्रकार बोले - 'मैंने यह जान लिया था कि तुमलोग श्रेष्ठ वैष्णव हो और अपने चरणकमलोंकी धूलसे पृथ्वीको पवित्र करनेके लिये भ्रमण कर रहे हो। मैं श्रीकृष्णभक्तके दर्शनकी सदा ही इच्छा करता रहता हूँ; क्योंकि साधु-संत तीनों लोकोंमें

४९२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण दुर्लभ हैं। तुमलोग मुझे पार्वती और देवताओंसे भी बढ़कर सदा प्रिय हो। मुझे वैष्णवजन अपने तथा अपने भक्तोंसे भी अधिक प्रिय हैं। परंतु मैंने पूर्वकालमें जो प्रतिज्ञा कर रखी है, वह भी व्यर्थ नहीं होनी चाहिये। महाभाग वैष्णवो! सुनो। मैंने कह रखा है कि पार्वतीके व्रतके समय जो लोग किसी अन्य व्रतके निमित्त इस सरोवरसे कमल ले जायेंगे वे शीघ्र ही आसुरी योनिको प्राप्त होंगे, इसमें संशय नहीं है। श्रीकृष्णके भक्तोंका कहीं भी अशुभ नहीं होता है। तुमलोग पहले दानवी योनिमें पड़कर फिर निश्चय ही गोलोकमें पधारोगे। तुम्हारे मनमें श्रीकृष्णके रूपका प्रत्यक्ष दर्शन करनेके लिये उत्कण्ठा है। अतः बच्चो! तुम्हें भारतवर्षके वृन्दावनमें उस रूपका अवश्य दर्शन होगा। श्रीकृष्णको देखकर उन्हींके हाथसे मृत्युको प्राप्त हो तुम वैष्णवशिरोमणि बन जाओगे और दिव्य विमानपर आरूढ़ हो हरिधामको पधारोगे। तुमलोग अभी यहाँ उस वाञ्छनीय रूपको देखनेके लिये उत्सुक हो। अतः वह सब देखो।' ऐसा कहकर भगवान् शिवने उन्हें उस रूपके दर्शन कराये। उस रूपके दर्शन करके उन वैष्णवोंके नेत्रोंमें आँसू भर आये। वे सर्वरूपी श्रीहरिको प्रणाम करके दानवी योनिमें चले गये। इसलिये वे दानवेश्वर हुए। वसुदेव तो पहले ही मुक्त हो चुका था। सुहोत्र बकासुर, सुदर्शन प्रलम्ब और स्वयं सुपार्श्व केशी हुआ था। भगवान् शंकरके वरदानसे श्रीहरिके परम उत्तम रूपके दर्शन करके उन्हींके हाथसे मृत्युको प्राप्त हो वे उनके परम धाममें चले गये। विप्रवर! श्रीहरिका यह अद्भुत चरित्र कहा गया। बक, प्रलम्ब और केशीके उद्धारका यह प्रसङ्ग वाचकों और श्रोताओंको मोक्ष प्रदान करनेवाला है। नारदजीने पूछा- महाभाग! आपके कृपा- प्रसादसे यह सारी अद्भुत बात मैंने सुनी। अब मैं यह सुनना चाहता हूँ कि पार्वतीने कौन-सा व्रत किया था? उस व्रतके आराध्यदेव कौन हैं? उसका फल क्या है और उसमें पालन करनेयोग्य नियम क्या है? भगवन्! उस व्रतके लिये उपयोगी द्रव्य कौन-कौन-से हैं? कितने समयतक वह व्रत किया जाता है और उसकी प्रतिष्ठामें क्या-क्या करना आवश्यक होता है? प्रभो! भलीभाँति विचारकर बताइये। इसे सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल है। श्रीनारायण बोले- मुने! यह 'त्रैमासिक' नामक व्रत है, जो नारीके पतिविषयक सौभाग्यको बढ़ानेवाला है। इस व्रतके आराध्य देवता हैं- राधिकासहित भगवान् श्रीकृष्ण। उत्तरायणके विषुव * योगमें इसका आरम्भ होता है और दक्षिणायन आरम्भ होनेतक इसकी समाप्ति हो जाती है। वैशाखकी संक्रान्तिसे एक दिन पहले संयमपूर्वक रहकर निश्चय ही हविष्यका सेवन करे। फिर वैशाखकी संक्रान्तिके दिन स्नान करके गङ्गातटपर व्रतका संकल्प ले। तदनन्तर व्रती पुरुष कलशपर, मणिमें, शालग्राम-शिलामें अथवा जलमें राधासहित श्रीकृष्णका पूजन करे। पहले पाँच देवताओंकी पूजा करके भक्तिभावसे राधावल्लभ श्रीकृष्णका ध्यान करे। उनके सामवेदोक्त ध्यानका वर्णन करता हूँ, सुनो। भगवान् श्रीकृष्णकी अङ्गकान्ति सजल जलधरके समान श्याम है। वे रेशमी पीताम्बर धारण करते हैं। उनका मुख शरत्कालकी पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान मनोहर है। उसपर मन्द हासकी प्रभा फैल रही है। नेत्र शरद्-ऋतुके प्रफुल्ल कमलोंकी शोभाको तिरस्कृत कर रहे हैं। उनमें सुन्दर अञ्जन लगा हुआ है। वे गोपियोंके मनको बारंबार मोहते रहते हैं। राधा उनकी ओर देख रही हैं। वे राधाके वक्षःस्थलमें विराजमान हैं। ब्रह्मा, अनन्त, शिव और धर्म आदि देवता उनकी स्तुति करते हैं।

  • ज्योतिषके अनुसार वह समय जब कि सूर्य विषुव रेखापर पहुँचता है और दिन-रात दोनों बराबर होते हैं।

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४९३

इस प्रकार श्रीकृष्णका ध्यान करके व्रती पुरुष उस ध्यानके द्वारा ही उनका सानन्द आवाहन करे। इसके बाद वह राधाका ध्यान करे। वह ध्यान यजुर्वेदकी माध्यन्दिनशाखामें वर्णित है। राधा रासेश्वरी हैं, रमणीया हैं और रासोल्लास-रसके लिये उत्सुक रहती हैं। रासमण्डलके मध्यभागमें उनका स्थान है। वे रासकी अधिष्ठात्री देवी हैं। रासेश्वरके वक्षःस्थलमें वास करती हैं। रासकी रसिका हैं। रसिकशेखर श्यामसुन्दरकी प्रिया हैं। रसिकाओंमें श्रेष्ठ हैं। सुरम्य रमारूपिणी हैं। प्रियतमके साथ रमणके लिये उत्सुक रहती हैं। उनके नेत्र शरत्कालके प्रफुल्ल कमलोंकी शोभाको तिरस्कृत करते हैं। वे बाँकी भौंहोंसे सुशोभित होती हैं। उनके नेत्रोंमें सुरमा शोभा पा रहा है। शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति सुन्दर मुखपर मन्द मुस्कानकी प्रभाके कारण उनकी मनोहरता बहुत बढ़ गयी है। मनोहर चम्पाके समान उनकी अङ्गकान्ति सुनहरी दिखायी देती है। चन्दन, कस्तूरीकी बेंदी तथा सिन्दूर-बिन्दुसे उनका शृङ्गार किया गया है। कपोलोंपर मनोहर पत्रावलीकी रचना शोभा देती है। अग्निशुद्ध दिव्य वस्त्रसे उनकी उज्ज्वलता बढ़ गयी है। उत्तम रत्नोंद्वारा निर्मित कुण्डलोंकी कान्तिसे उनके सुन्दर कपोल प्रकाशित हो रहे हैं। रत्नेन्द्रसाररचित हारसे वक्षःस्थल उद्भासित हो रहा है। रत्ननिर्मित कङ्कण, केयूर तथा किङ्किणी रत्नसे उनके अङ्गोंकी अपूर्व शोभा हो रही है। उत्तम रत्नोंके सारतत्त्वसे रचित मञ्जीरोंकी झनकारसे उनके दोनों चरण सुशोभित होते हैं। ब्रह्मा आदिके भी सेवनीय श्रीकृष्ण स्वयं ही उनकी सेवा करते हैं। सर्वेश्वरके द्वारा उनकी स्तुति की जाती है तथा वे सबकी कारणस्वरूपा हैं। ऐसी श्रीराधाका मैं भजन करता हूँ। इस प्रकार ध्यान करके श्रीकृष्णके साथ उनका पूजन करे*।

प्रतिदिन भक्तिभावसे सोलह उपचार चढ़ाकर पूजा करे। व्रती पुरुष प्रत्येक उपचारको पृथक्-पृथक् करके सबको बारी-बारीसे प्रसन्नतापूर्वक अर्पित करे। मुने! नित्यप्रति एक सौ आठ दिव्य सहस्रदल कमल लेकर उनकी एक सौ आठ आहुतियाँ दे। भक्तिभावसे 'कृष्णाय स्वाहा' इस मन्त्रका उच्चारण करके यत्नपूर्वक वे आहुतियाँ देनी चाहिये। आम और केलेके कच्चे या पके फलको लेकर उसकी एक सौ आठ आहुतियाँ भक्तिभावसे दे। फल अखण्ड होने चाहिये। मुने! प्रतिदिन सौ ब्राह्मणोंको भक्तिपूर्वक भोजन करावे। व्रतीको नित्य एक सौ आठ आहुतियोंका हवन करना चाहिये। वे आहुतियाँ भक्तिपूर्वक राधिका सहित श्रीकृष्णको देनी चाहिये। नारद! घृतमिश्रित तिलसे भी हवन करे। नित्य बाजे बजावे और श्रीहरिका कीर्तन करावे।

तीन मासतक इस नियमका पालन करके उसके बाद व्रतकी प्रतिष्ठा करे। नारद! प्रतिष्ठाके


* ध्यायेत् तदा राधिकाञ्च ध्यानं माध्यन्दिनेरितम्। राधां रासेश्वरीं रम्यां रासोल्लासरसोत्सुकाम्॥
रासमण्डलमध्यस्थां रासाधिष्ठातृदेवताम्। रासेशवक्षःस्थलस्थां रसिकां रसिकप्रियाम्॥
रसिकप्रवरां रम्यां रमां च रमणोत्सुकाम्। शरद्वाजीवराजीनां प्रभामोचनलोचनाम्॥
वक्रभ्रूभङ्गसंयुक्तामञ्जनेनैव रञ्जिताम्। शरत्पार्वणचन्द्रास्यामीषद्धास्यमनोहराम् ॥
चारुचम्पकवर्णाभां चन्दनेन विभूषिताम्। कस्तूरीबिन्दुना सार्द्धं सिन्दूरबिन्दुना युताम्॥
चारुपत्रावलीयुक्तां वह्निशुद्धांशुकोज्ज्वलाम्। सद्रत्नकुण्डलाभ्यां च सुकपोलस्थ्लोज्ज्वलाम्॥
रत्नेन्द्रसारहारेण वक्षःस्थलविराजिताम्। रत्नकङ्कणकेयूरकिङ्किणीरत्नरञ्जिताम् ॥
सद्रत्नसाररचिताक्वणन्मञ्जीररञ्जिताम् । ब्रह्मादिभिश्च सेव्येन श्रीकृष्णेनैव सेविताम्॥
सर्वेशेन स्तूयमानां सर्वबीजां भजाम्यहम्। इति ध्यात्वा च कृष्णेन सहितां तां च पूजयेत्॥
(१६।८५–९३)

४९४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण दिन जो विधान आवश्यक है, उसे सुनो। विप्रवर ! नब्बे हजार अक्षत कमलकी आहुति दे और यत्नपूर्वक नौ हजार ब्राह्मणोंको उत्तम, स्वादिष्ट एवं मीठे अन्न भोजन करावे। नौ हजार सात सौ बीस फल तथा नाना प्रकारके मनोहर द्रव्यका नैवेद्य अर्पण करे। इसके बाद संस्कारयुक्त अग्निकी स्थापना करके विद्वान् पुरुष होम करे। घृतयुक्त तिलकी नब्बे हजार आहुतियाँ देकर ब्राह्मणोंको भक्तिभावसे वस्त्र, भोजन, यज्ञोपवीत और फलसहित अन्न और तिलके लड्डू दे। उन लड्डुओंको गन्ध-पुष्पसे अर्चित करके देना चाहिये। साथ ही शीतल जलसे भरे हुए नब्बे कलशोंका भी दान करना चाहिये। इस प्रकार व्रत करके ब्राह्मणको दक्षिणा देनी चाहिये। दक्षिणाका परिमाण वही है, जो वेदोंमें बताया गया है। एक हजार बैल हों और उनके सींगोंमें सोना मढ़ा गया हो। ब्रह्मन् ! इस प्रकार 'त्रैमासिक' व्रत बताया गया। इस व्रतका अनुष्ठान कर लिया जाय तो यह विशिष्ट संतति देनेवाला और पतिसौभाग्यकी वृद्धि करनेवाला होता है। इस व्रतके प्रभावसे सौ जन्मोंतक नारीका अखण्ड सौभाग्य बना रहता है और निश्चय ही वह सौ जन्मोंतक सत्पुत्रकी जननी होती है। उसका कभी पति और पुत्रसे वियोग नहीं होता। पुत्र दासकी भाँति उसकी आज्ञाका पालक होता है तथा पति भी उसकी बातको माननेवाला होता है। वह सती नारी प्रतिक्षण श्रीराधा-कृष्णकी भक्तिसे सम्पन्न होती है। व्रतके प्रभावसे उसको ज्ञान तथा श्रीहरिकी स्मृति प्राप्त होती है। इस सामवेदोक्त व्रतका पूर्वकालमें हम दोनोंने भी पालन किया था। ब्रह्मन् ! दूसरी स्त्रियोंद्वारा उस व्रतका अनुष्ठान होता देख पार्वतीदेवीने प्रसन्नतापूर्वक दोनों हाथ जोड़ भक्तिभावसे सिर झुकाकर भगवान् शंकरसे कहा। पार्वती बोलीं- जगन्नाथ ! आज्ञा कीजिये। मैं उत्तम व्रतका पालन करूँगी। हम दोनोंके इष्टदेव श्रीहरिके व्रतोंमें यह श्रेष्ठ व्रत है। नाथ ! श्रीहरिकी आराधना समस्त मङ्गलोंकी कारणरूपा है। यज्ञ, दान, वेदाध्ययन, तीर्थसेवन और पृथ्वीकी परिक्रमा-ये सब श्रीहरिकी आराधनाकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं हैं। जिसके बाहर और भीतर प्रतिक्षण श्रीहरिकी स्मृति बनी रहती है, उस जीवन्मुक्त पुरुषके दर्शनसे ही मुक्ति प्राप्त हो जाती है। उसके चरणकमलोंकी धूल पड़नेसे वसुधा उसी क्षण शुद्ध हो जाती है तथा उसके दर्शनमात्रसे तीनों लोक पवित्र हो जाते हैं। ब्रह्मा, विष्णु, धर्म, शेषनाग, आप महेश्वर और गणेश- ये सब लोग जिनके चरणकमलोंका चिन्तन करते-करते उन्हींके समान महातेजस्वी हो गये हैं। जो जिसका सदा ध्यान करता है, वह निश्चय ही उसे प्राप्त कर लेता है। इतना ही नहीं-ध्याता पुरुष गुण, तेज, बुद्धि और ज्ञानकी दृष्टिसे अपने ध्येयके समान ही हो जाता है। श्रीकृष्णके चिन्तन, तप, ध्यान और सेवासे मैंने आप-जैसा स्वामी और पुत्र भी प्राप्त किया है। मुझे अनायास ही सब कुछ मिल गया। मेरा मनोरथ पूर्ण हो गया। मुझे आप-जैसे स्वामी मिले। कार्तिकेय और गणेश-जैसे पुत्र प्राप्त हुए तथा श्रीकृष्णके अंशस्वरूप हिमवान्-जैसे पिता मिले। प्रभो! मेरे लिये कौन-सी वस्तु दुर्लभ है? पार्वतीकी यह बात सुनकर भगवान् शंकर बहुत प्रसन्न हुए। उनका शरीर पुलकित हो उठा और वे हँसकर मधुर वाणीमें बोले। श्रीमहादेवजीने कहा- ईश्वरि ! तुम महालक्ष्मीस्वरूपा हो। तुम्हारे लिये क्या असाध्य है? तुम सर्वसम्पत्स्वरूपा और अनन्तशक्तिरूपिणी हो। देवि! तुम जिसके घरमें हो, वह सम्पूर्ण ऐश्वर्यका भाजन है। शुभप्रदे! मैं, ब्रह्मा और विष्णु तुममें भक्ति रखकर तुम्हारे कृपाप्रसादसे ही संसारकी सृष्टि, पालन और संहारमें समर्थ हुए हैं। हिमालय कौन है? मेरी क्या बिसात है

७२- विश्वकर्माद्वारा नन्दभवन और राजमार्ग आदिका निर्माण

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४९५

और कार्तिकेय तथा गणेश क्या हैं? तुम्हारे बिना हम सब लोग असमर्थ हैं और तुम्हारा सहयोग पाकर हम सभी सब कुछ करनेमें समर्थ हैं। जो पतिव्रताके योग्य है और जो प्राचीनकालसे श्रुतिमें सुनी गयी है, वह आज्ञा परमेश्वरकी आज्ञा है। पतिव्रते! उस ईश्वरीय आज्ञाको स्वीकार करके तुम व्रतका पालन करो। अबतक जिन स्त्रियोंने इस व्रतका पालन किया है, उन सबकी अपेक्षा विलक्षण ढंगसे तुम इस त्रैमासिक व्रतका अनुष्ठान करो। इस व्रतमें भगवान् सनत्कुमार तुम्हारे पुरोहित हों। सुन्दरि! इसमें जितने कमलों, ब्राह्मणों और द्रव्योंकी आवश्यकता हो, उन सबको देनेके लिये मैं उद्यत हूँ। तुम कुबेरको द्रव्यकोशका संरक्षक नियत करो। इस व्रतमें दानाध्यक्ष मैं रहूँगा और स्वयं भगवती लक्ष्मी धन देनेवाली होंगी। अग्निदेव वेदका पाठ करेंगे, वरुण-देवता जल देंगे, यक्षलोग वस्तुओंको ढोकर लानेका काम करेंगे और स्कन्द उनके अध्यक्ष रहेंगे। इस व्रतमें स्थानको झाड़-बुहारकर शुद्ध करनेका काम स्वयं वायुदेव करेंगे। इन्द्र रसोई परोसेंगे। चन्द्रमा व्रतके अधिष्ठापक होंगे। प्रिये! सूर्यदेव दानका निर्वचन करेंगे; योग्यायोग्यकी यथोचित व्याख्या करेंगे। सुन्दरि! व्रतके लिये जो उपयोगी और नियमित द्रव्य हो, उसे देकर उससे भी अधिक फल-फूल तुम श्रीहरिकी सेवामें समर्पित करो। व्रतमें जितने ब्राह्मणोंको भोजन करानेका नियम है, उतनोंको भोजन कराकर तुम उससे भी अधिक असंख्य ब्राह्मणोंको भक्तिभावसे भोजनके लिये निमन्त्रित करो। समाप्तिके दिन सुवर्ण, रत्न, मोती और मूँगा आदि व्रतोक्त दक्षिणा देकर सारा धन ब्राह्मणोंको बाँट दो।

ऐसा कहकर भगवान् शंकरने पार्वतीसे उस व्रतका अनुष्ठान करवाया। पार्वतीने सब स्त्रियोंकी अपेक्षा विलक्षण रूपसे उस व्रतका सम्पादन किया। नारद! इस प्रकार पार्वतीजीने जो व्रत किया था, वह सब मैंने कह सुनाया। पार्वतीके व्रतमें ब्राह्मणलोग रत्न ढोकर ले जानेमें असमर्थ हो गये। नारद! यह सारा इतिहास तो तुमने सुन लिया, अब जिसका प्रकरण चल रहा है, वह श्रीकृष्णका बालचरित्र सुनो।

यह श्रीकृष्णकी बाललीला पद-पदमें नयी-नयी प्रतीत होगी। पूर्वोक्त दानवेन्द्रोंका वध करके श्रीकृष्ण ग्वालबालोंके साथ गोकुलमें अपने घरको गये, जो कुबेरभवनके समान समृद्धिशाली था। वहाँ बालकोंने प्रसन्नतापूर्वक सब लोगोंसे वनमें घटित घटनाओंकी बातें बतायीं। यह सुनकर सब लोग चकित रह गये, किंतु नन्दजीको बड़ा भय हुआ। उन्होंने वृद्ध गोपों तथा बड़ी-बूढ़ी गोपियोंको घरपर बुलवाया और उन सबके साथ समयोचित कर्तव्यका विचार करके उक्त संकटसे बचनेके लिये युक्ति ढूँढ़ निकाली। युक्ति निश्चित करके गोपराज उस स्थानका त्याग कर देनेको उद्यत हो गये। मुने! उन्होंने उसी क्षण सबको वृन्दावनमें चलनेकी आज्ञा दी। नन्दजीकी आज्ञा सुनकर सब लोग वहाँ जानेको उद्यत हो गये। गोप, गोपियाँ, बालक, बालिकाएँ—सब इस नयी यात्राके लिये तैयार हो गये। समस्त ग्वाल-बाल श्रीकृष्ण और हलधरके साथ प्रसन्नतापूर्वक चल दिये। अनेक प्रकारकी वेश-भूषावाले वे बालक गीत गाते हुए जा रहे थे। कोई वंशीकी तान छेड़ते थे तो कोई सींग बजाते थे। किन्हींके हाथोंमें करताल थे। कुछ लोगोंने अपने हाथोंमें वीणा ले रखी थी। किन्हींके हाथोंमें शरयन्त्र थे तो किन्हींके सिंगे। कुछ गोपबालकोंने अपने कानोंमें नये पल्लव पहन रखे थे। कितनोंने अधखिले कमल और दूसरे-दूसरे फूल धारण कर रखे थे। किन्हींके हाथोंमें फूलोंके नये-नये गजरे थे। कुछ लोगोंने आजानुलम्बिनी वनमाला गलेमें डाल रखी थी। कुछ बालकोंने पल्लवों तथा फूलोंसे अपनी

४९६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

चोटियाँ सजा रखी थीं। विप्रवर! सब ग्वाल-बाल, तरुण अवस्थावाली गोपियोंके यूथ और बड़ी-बूढ़ी गोपियोंकी अपार संख्या थी।

मुने! श्रीराधाकी जो सुशीला आदि सहेली गोपियाँ थीं, वे नाना प्रकारके अलंकारोंसे विभूषित हो बड़ी भव्य दिखायी देती थीं। दिव्य वस्त्र धारण कर हर्षसे मुस्कराती हुई वे सब-की-सब वृन्दावनकी ओर चलीं। कोई शिबिकापर सवार थीं तो कोई रथपर। राधिकादेवी रत्नमय अलंकारोंसे विभूषित हो सुवर्णमय उपकरणोंसे युक्त रथपर बैठकर उन सब सहेलियोंके साथ यात्रा कर रही थीं। यशोदा और रोहिणीजी भी रत्नमय अलंकारोंसे अलंकृत हो सुवर्णमय उपकरणोंसे सुसज्जित रथपर चढ़कर जा रही थीं। नन्द, सुनन्द, श्रीदामा, गिरिभानु, विभाकर, वीरभानु और चन्द्रभानु—ये प्रमुख गोपगण हाथीपर बैठकर सानन्द यात्रा कर रहे थे। श्रीकृष्ण और बलदेव दोनों भाई रत्ननिर्मित आभूषणोंसे विभूषित हो सुवर्णमय रथपर बैठकर बड़े हर्षके साथ वृन्दावनकी ओर जा रहे थे। कोटि-कोटि बूढ़े और जवान गोप उस यात्रामें सम्मिलित थे। कोई घोड़ेपर सवार थे, कोई हाथियोंपर बैठे थे और कितने ही रथपर चढ़कर यात्रा करते थे।

नन्दके सेवक उद्धत गोपगण बड़े हर्षके साथ चल रहे थे। उनमेंसे कुछ लोग बैलोंपर सवार थे। वे सब-के-सब संगीतकी तानमें तत्पर थे। राधिकाकी दूसरी-दूसरी दासियाँ बहुत बड़ी संख्यामें यात्रा कर रही थीं, उनके मनमें बड़ा उल्लास था। मुखपर मन्द मुस्कानकी छटा छा रही थी और वे सब-की-सब सोनेके गहनोंसे सजी थीं। उनमेंसे कितनोंके हाथमें सिन्दूर थे, कितनी ही काजल लेकर चल रही थीं। किन्हींके हाथोंमें कन्दुक थे तो किन्हींके पुतलियाँ। कुछ सुन्दरी दासियाँ अपने हाथोंमें भोग-द्रव्य और क्रीड़ा-द्रव्य लेकर चल रही थीं। किन्हींके हाथोंमें वेशरचनाकी सामग्री थी तो किन्हींके हाथोंमें फूलोंकी मालाएँ। कुछ गोपियाँ हाथोंमें वीणा आदि वाद्य लिये सानन्द यात्रा कर रही थीं। कुछ अपने साथ अग्निशुद्ध दिव्य वस्त्रोंका भार लिये चल रही थीं। कितनी ही चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और केसरका द्रव ले जा रही थीं। कोई संगीतमें मग्न थीं तो कोई विचित्र कथाएँ कह रही थीं। उस समय कोटि-कोटि शिबिकाएँ, रथ, घोड़े, गाड़ियाँ, बैल और लाखों हाथी आदि चल रहे थे। मुने! वृन्दावनमें पहुँचकर सबने उसे गृहशून्य देखा। तब वे सभी लोग वृक्षोंके नीचे यथास्थान ठहर गये। उस समय श्रीकृष्णने गोपोंको अभीष्ट गृह और गौओंके ठहरनेके स्थान बताते हुए कहा—'आज इसी तरह ठहरो। कल सब व्यवस्था हो जायगी।' श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर गोपोंने पूछा—'कन्हैया! यहाँ कहाँ घर हैं।' उनका यह प्रश्न सुनकर श्रीकृष्ण बोले—'इस स्थानपर बहुत-से स्वच्छ गृह हैं, जिन्हें देवताओंने बनाया है; परंतु उन देवताओंको प्रसन्न किये बिना कोई भी गृह हमारी दृष्टिमें नहीं आ सकते। अतः गोपगण! आज वनदेवताओंकी पूजा करके बाहर ही ठहरो। प्रातःकाल तुम्हें यहाँ निश्चय ही बहुत-से रमणीय गृह दिखायी देंगे। धूप, दीप, नैवेद्य, भेंट, पुष्प और चन्दन आदिके

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४९७

द्वारा वटके मूलभागमें स्थित चण्डिकादेवीकी पूजा करो।'

श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर गोपोंने दिनमें देवताओंकी पूजा करके भोजन आदि किये और रातमें वहीं प्रसन्नतापूर्वक शयन किया।

(अध्याय १६)


विश्वकर्माका आगमन, उनके द्वारा पाँच योजन विस्तृत नूतन नगरका निर्माण, वृषभानु गोपके लिये पृथक् भवन, कलावती और वृषभानुके पूर्वजन्मका चरित्र, राजा सुचन्द्रकी तपस्या, ब्रह्माद्वारा वरदान, भनन्दनके यहाँ कलावतीका जन्म और वृषभानुके साथ उसका विवाह, विश्वकर्माद्वारा नन्द-भवनका, वृन्दावनके भीतर रासमण्डलका तथा मधुवनके पास रत्नमण्डपका निर्माण, 'वृन्दावन' नामका कारण, राजा केदारका इतिहास, तुलसीसे वृन्दावन नामका सम्बन्ध तथा राधाके सोलह नामोंमें 'वृन्दा' नाम, राधा नामकी व्याख्या, नींद टूटनेपर नूतन नगर देख ब्रजवासियोंका आश्चर्य तथा उन सबका उन भवनोंमें प्रवेश

भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! रातमें वृन्दावनके भीतर सब व्रजवासी और नन्दरायजी सो गये। निद्राके स्वामी श्रीकृष्ण भी माता यशोदाके वक्षःस्थलपर प्रगाढ़ निद्राके वशीभूत हो गये। रमणीय शय्याओंपर सोयी हुई गोपियाँ भी निद्रित हो गयीं। कोई शिशुओंको गोदमें लेकर, कोई सखियोंके साथ सटकर, कोई छकड़ोंपर और कोई रथोंपर ही स्थित होकर निद्रासे अचेत हो गयीं। पूर्णचन्द्रमाकी चाँदनी फैल जानेसे जब वृन्दावन स्वर्गसे भी अधिक मनोहर प्रतीत होने लगा, नाना प्रकारके कुसुमोंका स्पर्श करके बहनेवाली मन्द-मन्द वायुसे सारा वन-प्रान्त सुवासित हो उठा तथा समस्त प्राणी निश्चेष्ट होकर सो गये, तब रात्रिकालिक पञ्चम मुहूर्तके बीत जानेपर शिल्पियोंके गुरुके भी गुरु भगवान् विश्वकर्मा वहाँ आये। उन्होंने दिव्य एवं महीन वस्त्र पहन रखा था। उनके गलेमें मनोहर रत्नमाला शोभा दे रही थी। वे अनुपम रत्ननिर्मित अलंकारोंसे अलंकृत थे। उनके कानोंमें कान्तिमान् मकराकृत कुण्डल झलमला रहे थे। वे ज्ञान और अवस्थामें वृद्ध होनेपर भी किशोरकी भाँति दर्शनीय थे। अत्यन्त सुन्दर, तेजस्वी तथा कामदेवके समान कान्तिमान् थे।

उनके साथ विशिष्ट शिल्पकलामें निपुण तीन करोड़ शिल्पी थे। उन सबके हाथोंमें मणिरत्न, हेमरत्न तथा लोहनिर्मित अस्त्र थे। कुबेर-वनके किङ्कर यक्षसमुदाय भी वहाँ आ पहुँचे। वे स्फटिकमणि तथा रत्नमय अलंकारोंसे विभूषित थे। किन्हीं-किन्हींके कंधे बहुत बड़े थे। किन्हींके हाथोंमें पद्मरागमणिके ढेर थे तो किन्हींके हाथोंमें इन्द्रनीलमणिके। कुछ यक्षोंने अपने हाथोंमें स्यमन्तकमणि ले रखी थी और कुछ यक्षोंने चन्द्रकान्तमणि। अन्य बहुत-से यक्षोंके हाथोंमें सूर्यकान्तमणि और प्रभाकरमणिके ढेर प्रकाशित

४९८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण


हो रहे थे। किन्हींके हाथोंमें फरसे थे तो किन्हींके लोहसार। कोई-कोई गन्धसार तथा श्रेष्ठ मणि लेकर आये थे। किन्हींके हाथमें चँवर थे और कुछ लोग दर्पण, स्वर्णपात्र और स्वर्ण-कलश आदिके बोझ लेकर आये थे।

विश्वकर्माने वह अत्यन्त मनोहर सामग्री देखकर सुन्दर नेत्रोंवाले श्रीकृष्णका ध्यान करके वहाँ नगर-निर्माणका कार्य आरम्भ किया। भारतवर्षका वह श्रेष्ठ और सुन्दर नगर पाँच योजन विस्तृत था। तीर्थोंका सारभूत वह पुण्यक्षेत्र श्रीहरिको अत्यन्त प्रिय है। जो वहाँ मुमुक्षु होकर निवास करते हैं, उन्हें वह परम निर्वाणकी प्राप्ति करानेवाला है। गोलोकमें पहुँचनेके लिये तो वह सोपानरूप है। सबको मनोवाञ्छित वस्तु प्रदान करनेवाला है। वहाँ चार-चार कमरेवाले चार करोड़ भवन बनाये गये थे, जिससे वह नगर अत्यन्त मनोरम प्रतीत होता था। श्रेष्ठ प्रस्तरोंसे निर्मित वह विशाल नगर किवाड़ों, खम्भों और सोपानोंसे सुशोभित था। चित्रमयी पुत्तलिकाओं, पुष्पों और कलशोंसे वहाँके भवनोंके शिखरभाग अत्यन्त प्रकाशमान जान पड़ते थे। पर्वतीय प्रस्तर-खण्डोंसे निर्मित वेदिकाएँ और प्राङ्गण उस नगरके भवनोंकी शोभा बढ़ा रहे थे। प्रस्तर-खण्डोंके परकोटोंसे सारा नगर घिरा हुआ था। विश्वकर्माने खेल-खेलमें ही सारे नगरकी रचना कर डाली। प्रत्येक गृहमें यथायोग्य बड़े-छोटे दो दरवाजे थे। हर्ष और उत्साहसे भरे हुए देवशिल्पीने स्फटिक-जैसी मणियोंसे उस नगरके भवनोंका निर्माण किया था। गन्धसार-निर्मित सोपानों, शंकु-रचित खम्भों, लोहसारकी बनी हुई किवाड़ों, चाँदीके समुज्ज्वल कलशों तथा वज्रसारनिर्मित प्राकारोंसे उस नगरकी अपूर्व शोभा हो रही थी। उसमें गोपोंके लिये यथास्थान और यथायोग्य निवासस्थान बनाकर विश्वकर्माने वृषभानु गोपके लिये पुनः रमणीय भवनका निर्माण आरम्भ किया। उसके चारों ओर परकोटे और खाइयाँ बनी थीं। चारों दिशाओंमें चार दरवाजे थे। चार-चार कमरोंसे युक्त बीस भव्य भवन बनाये गये थे। उस सम्पूर्ण भवनका निर्माण महामूल्य मणियोंसे किया गया था। रत्नसार-रचित सुरम्य तूलिकाओं, सुवर्णाकार मणियोंद्वारा निर्मित अत्यन्त सुन्दर सोपानों, लोहसारकी बनी हुई किवाड़ों तथा कृत्रिम चित्रोंसे वृषभानु-भवनकी बड़ी शोभा हो रही थी। वहाँका प्रत्येक सुरम्य मन्दिर सोनेके कलशोंसे देदीप्यमान था। उस आश्रमके एक अत्यन्त मनोहर निर्जन प्रदेशमें, जो मनोहर चम्पा-वृक्षोंके उद्यानके भीतर था, पतिसहित कलावतीके उपभोगके लिये विश्वकर्माने कौतूहलवश एक ऐसी अट्टालिका बनायी थी, जिसका निर्माण विशिष्ट श्रेणीकी श्रेष्ठ मणियोंद्वारा हुआ था। उसमें इन्द्रनीलमणिके बने हुए नौ सोपान थे। गन्धसारनिर्मित खम्भों और कपाटोंसे वह अत्यन्त ऊँचा मनोरम भवन सब ओरसे विलक्षण था।

नारदजीने पूछा— भगवन् ! मनोहर रूपवाली कलावती कौन थी और किसकी पत्नी थी, जिसके लिये देवशिल्पीने यत्नपूर्वक सुरम्य गृहका निर्माण किया ?

भगवान् नारायणने कहा— सुन्दरी कलावती कमलाके अंशसे प्रकट हुई पितरोंकी मानसी कन्या है और वृषभानुकी पतिव्रता पत्नी है। उसीकी पुत्री राधा हुईं जो श्रीकृष्णको प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हैं। वे श्रीकृष्णके आधे अंशसे प्रकट हुई हैं; इसलिये उन्हींके समान तेजस्विनी हैं। उनके चरणकमलोंकी रजके स्पर्शसे वसुन्धरा पवित्र हो गयी है। सभी संत-महात्मा सदा ही श्रीराधाके प्रति अविचल भक्तिकी कामना करते हैं।

नारदजीने पूछा— मुने ! व्रजमें रहनेवाले एक मानवने कैसे, किस पुण्यसे और किस प्रकार

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४९९ पितरोंकी परम दुर्लभ मानसी कन्याको पत्नीरूपमें प्राप्त किया ? व्रजके महान् अधिपति वृषभानु पूर्वजन्ममें कौन थे, किसके पुत्र थे और किस तपस्यासे राधा उनकी कन्या हुईं ? सूतजी कहते हैं- नारदजीकी यह बात सुनकर ज्ञानिशिरोमणि महर्षि नारायण हँसे और प्रसन्नतापूर्वक उस प्राचीन इतिहासको बताने लगे। भगवान् नारायण बोले- नारद ! पूर्वकालमें पितरोंके मानससे तीन कन्याएँ प्रकट हुईं- कलावती, रत्नमाला और मेनका। ये तीनों ही अत्यन्त दुर्लभ थीं। इनमेंसे रत्नमालाने कामनापूर्वक राजा जनकको पतिरूपमें वरण किया और मेनकाने श्रीहरिके अंशभूत गिरिराज हिमालयको अपना पति बनाया। रत्नमालाकी पुत्री अयोनिजा सती सत्यपरायणा सीता हुईं, जो साक्षात् लक्ष्मी तथा श्रीरामकी पत्नी थीं। मेनकाकी पुत्री पार्वती हुईं, जो पूर्वजन्ममें सती नामसे प्रसिद्ध थीं। वे भी अयोनिजा ही कही गयी हैं। पार्वती श्रीहरिकी सनातनी माया हैं। उन्होंने तपस्यासे नारायणस्वरूप महादेवजीको पतिरूपमें प्राप्त किया है। कलावतीने मनुवंशी राजा सुचन्द्रका वरण किया। वे राजा साक्षात् श्रीहरिके अंश थे। उन्होंने कलावतीको पाकर अपनेको गुणवानोंमें श्रेष्ठ और अत्यन्त सुन्दर माना। वे उसके सौन्दर्यकी प्रशंसा करते हुए मन-ही-मन कहते थे- 'इसका रूप अद्भुत है। वेष भी आश्चर्यजनक है और इसकी नयी अवस्था कैसी विलक्षण है। सुकोमल अङ्ग, शरत्कालके चन्द्रमासे भी बढ़कर परम सुन्दर मुख तथा गज और खंजनके भी गर्वका गंजन करनेवाली दुर्लभ गति-सभी अद्भुत हैं।' इस अपनी परम सुन्दरी पत्नी कलावतीके साथ विभिन्न रमणीय स्थानोंमें रहकर सुदीर्घकालतक विहार करनेके पश्चात् राजा भोगोंसे विरक्त हो गये और कलावतीको साथ लेकर विन्ध्यपर्वतकी तीर्थभूमिमें तपस्याके लिये चले गये। भारतमें अत्यन्त प्रशंसाके योग्य वह उत्तम स्थान पुलहाश्रमके नामसे प्रसिद्ध है। वहाँ राजाने मोक्षकी इच्छा मनमें लेकर सहस्र दिव्य वर्षोंतक तप किया। उनके मनमें कोई लौकिक कामना नहीं थी। वे आहार छोड़ देनेके कारण कृशोदर हो गये। श्रीकृष्णके चरणकमलोंका ध्यान करते-करते मुनिश्रेष्ठ सुचन्द्रको मूर्च्छा आ गयी। उनके शरीरपर जो बाँबी छा गयी थी, उसे उनकी साध्वी पत्नीने दूर किया। पतिको निश्चेष्ट, प्राणशून्य, मांस और रक्तसे रहित तथा अस्थि- चर्मावशिष्टमात्र देख उस निर्जन वनमें कलावती शोकातुर हो उच्च स्वरसे रोने लगी। मूर्च्छित पतिको वक्षःस्थलसे लगाकर वह महादीना पतिव्रता 'हे नाथ! हा नाथ!' का उच्चारण करती हुई विलाप करने लगी। राजा आहार छोड़ देनेके कारण सूख गये हैं; उनके शरीरकी नस-नाड़ियाँ दिखायी देती हैं- यह देख और कलावतीका विलाप सुनकर कृपानिधान कमलजन्मा जगत्स्रष्टा ब्रह्माजी कृपापूर्वक वहाँ प्रकट हो गये। उन्होंने तुरंत ही राजाके शरीरको अपनी गोदमें लेकर कमण्डलुके जलसे सींचा। फिर ब्रह्मज्ञ ब्रह्माने ब्रह्मज्ञानके द्वारा उसमें जीवका संचार किया। इससे चेतनाको प्राप्त हो नृपवर सुचन्द्रने अपने सामने प्रजापतिको देखकर प्रणाम किया। प्रजापतिने कामके समान कान्तिमान् नरेशसे संतुष्ट होकर कहा- 'राजन् ! तुम इच्छानुसार वर माँगो।' विधाताकी यह बात सुनकर श्रीमान् सुचन्द्रके मुखारविन्दपर मन्द मुस्कानकी प्रभा फैल गयी। वे प्रसन्नवदन हो बोले- 'दयानिधे ! यदि आप वर देनेको उद्यत हैं तो कृपापूर्वक मुझे मनोवाञ्छित निर्वाण प्रदान करें।' इस वरदानके मिल जानेपर मेरी क्या दशा होगी, इसका मन-ही-मन अनुमान करके कलावतीके कण्ठ, ओठ और तालु सूख गये। वह सती संत्रस्त हो वर देनेको उद्यत हुए विधातासे बोली। कलावतीने कहा- कमलोद्भव ब्रह्मन् ! यदि

५०० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

आप महाराजको मुक्ति दे रहे हैं तो मुझ अबलाकी क्या गति होगी, यह आप ही बताइये ? चतुरानन ! कान्तके बिना कान्ताकी क्या शोभा है? श्रुतिमें सुना गया है कि पतिव्रता नारीके लिये पति ही व्रत है, पति ही गुरु, इष्टदेव, तपस्या और धर्म है। ब्रह्मन् ! सभी स्त्रियोंके लिये पतिसे बढ़कर परम प्रिय बन्धु कोई नहीं है। पतिसेवा परम दुर्लभ है। वह सब धर्मोंसे बढ़कर है। पतिसेवासे दूर रहनेवाली स्त्रीका सारा शुभ कर्म निष्फल होता है*। व्रत, दान, तप, पूजन, जप, होम, सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान, पृथ्वीकी परिक्रमा, समस्त यज्ञोंकी दीक्षा, बड़े-बड़े दान, सब वेदोंका पाठ, सब प्रकारकी तपस्या, वेदज्ञ ब्राह्मणोंको भोजन-दान तथा देवाराधन—ये सब मिलकर पति-सेवाकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हैं। जो स्त्रियाँ पतिकी सेवा नहीं करतीं और पतिसे कटुवचन बोलती हैं, वे चन्द्रमा और सूर्यकी सत्तापर्यन्त कालसूत्र नरकमें गिरकर यातना भोगती हैं। वहाँ सर्पोंके बराबर बड़े-बड़े कीड़े दिन-रात उन्हें डँसते रहते हैं और सदा विपरीत एवं भयंकर शब्द किया करते हैं। उस नरकमें स्त्रियोंको मल, मूत्र तथा कफका भोजन करना पड़ता है। यमराजके दूत उनके मुखमें जलती लुआठी डालते हैं। नरकका भोग पूरा करके वे नारियाँ कृमियोनिमें जन्म लेती हैं और सौ जन्मोंतक रक्त, मांस तथा विष्ठा खाती हैं। वेदवाक्योंमें यह निश्चित सिद्धान्त बताया गया है। मैं अबला हूँ। विद्वानोंके मुखसे सुनकर उपर्युक्त बातोंको कुछ-कुछ जानती हूँ। आप तो वेदोंका भी प्राकट्य करनेवाले हैं। प्रभु हैं। विद्वानों, योगियों, ज्ञानियों तथा गुरुके भी गुरु हैं। अच्युत !

आप सर्वज्ञ हैं। मैं आपको क्या समझा सकूँगी ? ये मेरे पति मुझे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हैं। यदि इन्हें मुक्ति प्राप्त हो गयी तो मेरा रक्षक कौन होगा ? मेरे धन और यौवनकी रक्षा कौन करेगा ? कुमारावस्थामें नारीकी रक्षा पिता करता है। फिर वह कन्याका सुपात्रको दान देकर कृतकृत्य हो जाता है। तबसे पति ही नारीकी रक्षा करता है। पतिके अभावमें उसका पुत्र रक्षक होता है। इस प्रकार तीन अवस्थाओंमें नारीके तीन रक्षक माने गये हैं। जो स्त्रियाँ स्वतन्त्र हैं, वे नष्ट मानी गयी हैं। उनका सभी धर्मोंसे बहिष्कार किया गया है। वे नीच कुलमें उत्पन्न, कुलटा और दुष्टहृदया कही गयी हैं। ब्रह्मन् ! उनके सौ जन्मोंका पुण्य नष्ट हो जाता है। पतिव्रताका अपने पतिके प्रति सर्वदा समान स्नेह होता है। दूध पीते बच्चेपर माताओंका अधिक स्नेह देखा जाता है, परंतु वह पतिव्रताके पतिविषयक स्नेहकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं है। पतिसे बढ़कर कोई बन्धु, प्रिय देवता तथा गुरु नहीं है। स्त्रीके लिये पतिसे बढ़कर धर्म, धन, प्राण तथा दूसरा कोई पुरुष नहीं है। जैसे वैष्णवोंका मन श्रीकृष्णचरणारविन्दमें ही निमग्न रहता है, उसी प्रकार साध्वी स्त्रियोंका चित्त अपने प्रियतम पतिमें ही संलग्न रहता है। ब्रह्मन् ! पतिके बिना पतिव्रता स्त्री एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकती। पतिके बिना साध्वी स्त्रियोंके लिये मरण ही जीवन है और जीवन मृत्युसे भी अधिक कष्ट देनेवाला है। ब्रह्मन् ! यदि मेरे बिना ही आप इन्हें मुक्त कर देंगे तो प्रभो ! मैं आपको शाप देकर स्त्री-हत्याका दारुण पाप प्रदान करूँगी।


* व्रतं पतिव्रतायाश्च पतिरेव श्रुतौ श्रुतम्। गुरुश्चाभीष्टदेवश्च तपोधर्ममयः पतिः॥
सर्वेषां च प्रियतमो न बन्धुः स्वामिनः परः। सर्वधर्मोत्परा ब्रह्मन् पतिसेवा सुदुर्लभा॥
स्वामिसेवाविहीनायाः सर्वं तन्निष्फलं भवेत्। (१७। ६७—६९)

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५०१


कलावतीकी बात सुनकर विधाता विस्मित हो मन-ही-मन भय मानते हुए अमृतके समान मधुर एवं हितकर वचन बोले।

ब्रह्माजीने कहा— बेटी! मैं तुम्हारे स्वामीको तुम्हारे बिना ही मुक्ति नहीं दूँगा। पतिव्रते! तुम अपने पतिके साथ कुछ वर्षोंतक स्वर्गमें रहकर सुख भोगो। फिर तुम दोनोंका भारतवर्षमें जन्म होगा। वहाँ जब साक्षात् सती राधिका तुम्हारी पुत्री होंगी तब तुम दोनों जीवन्मुक्त हो जाओगे और श्रीराधाके साथ ही गोलोकमें पधारोगे। नृपश्रेष्ठ! तुम कुछ कालतक अपनी स्त्रीके साथ स्वर्गीय सुखका उपभोग करो। यह स्त्री साध्वी एवं सत्त्वगुणसे युक्त है। तुम मुझे शाप न देना; क्योंकि श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंमें चित्त लगाये रखनेवाले जीवन्मुक्त संत समदर्शी होते हैं। उनके मनमें श्रीहरिके दुर्लभ दास्यभावको पानेकी इच्छा रहती है। वे निर्वाण नहीं चाहते।

ऐसा कहकर उन दोनोंको वर दे विधाता उनके सामने खड़े रहे। वे दोनों उन्हें प्रणाम करके स्वर्गकी ओर चल दिये। फिर ब्रह्माजी भी अपने धामको चले गये। तदनन्तर वे दोनों दम्पति समयानुसार स्वर्गीय भोगोंका उपभोग करके भारतवर्षमें आये, जो परम पुण्यदायक तथा दिव्य स्थान है। ब्रह्मा आदि देवता भी वहाँ जन्म लेनेकी इच्छा करते हैं। सुचन्द्रने गोकुलमें जन्म लिया और वहाँ उनका नाम वृषभानु हुआ। वे सुरभानुके वीर्य और पद्मावतीके गर्भसे उत्पन्न हुए। उन्हें पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण था। वे श्रीहरिके अंश थे और जैसे शुक्लपक्षमें चन्द्रमा बढ़ते हैं, उसी प्रकार व्रजधाममें प्रतिदिन बढ़ने लगे। धीरे-धीरे वे व्रजके अधिपति हुए। उन्हें सर्वज्ञ और महायोगी माना गया है। उनका चित्त सदा श्रीहरिके चरणारविन्दोंके चिन्तनमें ही लगा रहता था। वे उदार, रूपवान्, गुणवान् और श्रेष्ठ बुद्धिवाले थे।

कलावती कान्यकुब्ज देशमें उत्पन्न हुई। वह भी अयोनिजा, पूर्व-जन्मकी बातोंको याद रखनेवाली महासाध्वी, सुन्दरी एवं कमलाकी कला थी। कान्यकुब्ज देशमें महापराक्रमी नृपश्रेष्ठ भनन्दन राज्य करते थे। उन्होंने यज्ञके अन्तमें यज्ञकुण्डसे प्रकट हुई दूध पीती नंगी बालिकाके रूपमें उसे पाया था। वह सुन्दरी बालिका उस कुण्डसे हँसती हुई निकली थी। उसकी अङ्ग-कान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान थी। वह तेजसे उद्भासित हो रही थी। राजेन्द्र भनन्दने उसे गोदमें लेकर अपनी प्यारी रानी मालावतीको प्रसन्नतापूर्वक दे दिया। मालावतीके हर्षकी सीमा न रही। वह उस बालिकाको अपना स्तन पिलाकर पालने लगी। उसके अन्नप्राशन और नामकरणके दिन शुभ बेलामें जब राजा सत्पुरुषोंके बीच बैठे हुए थे, आकाशवाणी हुई—'नरेश्वर! इस कन्याका नाम कलावती रखो।' यह सुनकर राजाने वही नाम रख दिया। उन्होंने ब्राह्मणों, याचकों और वन्दीजनोंको प्रचुर धन दान किया। सबको भोजन कराया और बड़ा भारी उत्सव मनाया। समयानुसार उस रूपवती कन्याने युवावस्थामें प्रवेश किया। सोलह वर्षकी अवस्थामें वह अत्यन्त सुन्दरी दिखायी देने लगी। वह राजकन्या मुनियोंके मनको भी मोह लेनेमें समर्थ थी। मनोहर चम्पाके समान उसकी अङ्गकान्ति थी तथा मुख शरत्कालके पूर्णचन्द्रकी भाँति परम मनोहर था। एक दिन गजराजकी-सी मन्दगतिसे चलनेवाली राजकुमारी राजमार्गसे कहीं जा रही थी। नन्दजीने उसे मार्गमें देखा। देखकर वे बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने उस मार्गसे आने-जानेवाले लोगोंसे आदरपूर्वक पूछा—'यह किसकी कन्या जा रही थी।' लोगोंने बताया—'यह महाराज भनन्दनकी कन्या है। इसका नाम कलावती है। यह धन्या बाला लक्ष्मीजीके अंशसे राजमन्दिरमें प्रकट हुई है और कौतुकवश खेलनेके लिये अपनी सहेलीके घर जा रही है।

७३- ब्राह्मणपत्नियोंद्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति

५०२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण व्रजराज ! आप व्रजको पधारिये।' ऐसा उत्तर देकर लोग चले गये। नन्दके मनमें बड़ा हर्ष हुआ। वे राजभवनको गये। रथसे उतरकर उन्होंने तत्काल ही राजसभामें प्रवेश किया। राजा उठकर खड़े हो गये। उन्होंने नन्दरायजीसे बातचीत की और उन्हें बैठनेके लिये सोनेका सिंहासन दिया। उन दोनोंमें परस्पर बहुत प्रेमालाप हुआ। फिर नन्दने विनीत होकर राजासे सम्बन्धकी बात चलायी। नन्दजीने कहा - राजेन्द्र ! सुनिये। मैं एक शुभ एवं विशेष बात कह रहा हूँ। आप इस समय अपनी कन्याका सम्बन्ध एक विशिष्ट पुरुषके साथ स्थापित कीजिये। व्रजमें सुरभानुके पुत्र श्रीमान् वृषभानु निवास करते हैं, जो व्रजके राजा हैं। वे भगवान् नारायणके अंशसे उत्पन्न हुए हैं और उत्तम गुणोंके भण्डार, सुन्दर, सुविद्वान्, सुस्थिर यौवनसे युक्त, योगी, पूर्वजन्मकी बातोंको स्मरण करनेवाले और नवयुवक हैं। आपकी कन्या भी यज्ञकुण्डसे उत्पन्न हुई है; अतः अयोनिजा है। त्रिभुवनमोहिनी कन्या कलावती भगवती कमलाकी अंश है और स्वभावतः शान्त जान पड़ती है। वृषभानु आपकी पुत्रीके योग्य हैं तथा आपकी पुत्री भी उन्हींके योग्य है। मुने ! राजसभामें ऐसा कहकर नन्दजी चुप हो गये। तब नृपश्रेष्ठ भनन्दनने विनयसे नम्र हो उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया। भनन्दन बोले - व्रजेश्वर ! सम्बन्ध तो विधाताके वशकी बात है। वह मेरे द्वारा साध्य नहीं है। ब्रह्माजी ही सम्बन्ध करनेवाले हैं। मैं तो केवल जन्मदाता हूँ। कौन किसकी पत्नी या कन्या है तथा कौन किसका साधन-सम्पन्न पति है? इसे विधाताके सिवा और कौन जानता है? कर्मोंके अनुरूप फल देनेवाले विधाता ही सबके कारण हैं। किया हुआ कर्म कभी निष्फल नहीं होता, उसका फल मिलकर ही रहेगा - ऐसा श्रुतिमें सुना गया है। अन्यथा असमर्थ पुरुषके उद्यमकी भाँति सारा कर्म निष्फल हो जाता है। यदि विधाताने मेरी पुत्रीको ही वृषभानुकी पत्नी होनेकी बात लिखी है तो वह पहलेसे ही उनकी पत्नी है। मैं फिर कौन हूँ, जो उसमें बाधा डाल सकूँ तथा दूसरा भी कौन उस सम्बन्धका निवारण कर सकता है? नारद ! यों कहकर राजेन्द्र भनन्दनने विनयसे सिर झुकाकर नन्दरायजीको आदरपूर्वक मिष्टान्न भोजन कराया। तत्पश्चात् राजाकी अनुमति ले व्रजराज व्रजको लौट गये। जाकर उन्होंने सुरभानुकी सभामें सब बातें बतायीं। सुरभानुने भी यत्नपूर्वक नन्द और गर्गजीके सहयोगसे सादर इस सम्बन्धको जोड़ा। विवाहकालमें महाराज भनन्दनने गजरत्न, अश्वरत्न, अन्यान्य रत्न तथा मणियोंके आभूषण आदि बहुत दहेज दिये। वृषभानु कलावतीको पाकर बड़ी प्रसन्नताके साथ निर्जन एवं रमणीय स्थानमें उसके साथ विहार करने लगे। कलावती एक पलका भी विरह होनेपर स्वामीके बिना व्याकुल हो उठती थी और वृषभानु भी एक क्षणके लिये भी कलावतीके दूर होनेपर उसके बिना विकल हो जाते थे। वह राजकन्या पूर्वजन्मकी बातोंको याद रखनेवाली देवी थी। मायासे मनुष्यरूपमें प्रकट हुई थी। वृषभानु भी श्रीहरिके अंश और जातिस्मर थे तथा कलावतीको पाकर बड़े प्रसन्न थे। उन दोनोंका प्रेम प्रतिदिन नया-नया होकर बढ़ने लगा। लीलावश पूर्वकालमें सुदामाके शाप और श्रीकृष्णकी आज्ञासे श्रीकृष्णप्राणाधिका सती राधिका उन दोनोंकी अयोनिजा पुत्री हुईं। उसके दर्शनमात्रसे वे दोनों दम्पति भवबन्धनसे मुक्त हो गये। नारद ! इस प्रकार इतिहास कहा गया। अब जिसका प्रकरण चल रहा है, वह प्रसङ्ग सुनो। उक्त इतिहास पापरूपी ईंधनको जलानेके लिये प्रज्वलित अग्निकी शिखाके समान है।

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५०३ शिल्पिशिरोमणि विश्वकर्मा वृषभानुके आश्रमपर जाकर वहाँसे अपने सेवकगणोंके साथ दूसरे स्थानपर गये। वे तत्त्वज्ञ थे। उन्होंने मन-ही-मन एक कोस लंबे-चौड़े एक मनोहर स्थानका विचार करके वहाँ महात्मा नन्दके लिये आश्रम बनाना आरम्भ किया। बुद्धिसे अनुमान करके उनके लिये सबसे विलक्षण भवन बनाया। वह श्रेष्ठ भवन चार गहरी खाइयोंसे घिरा हुआ था, शत्रुओंके लिये उन्हें लाँघना बहुत कठिन था। उन चारों खाइयोंमें प्रस्तर जुड़े हुए थे। उन खाइयोंके दोनों तटोंपर फूलोंके उद्यान थे, जिनके कारण वे पुष्पोंसे सजी हुई-सी जान पड़ती थीं और सुन्दर एवं मनोहर चम्पाके वृक्ष तटोंपर खिले हुए थे। उन्हें छूकर बहनेवाली सुगन्धित वायु उन परिखाओंको सब ओरसे सुवासित कर रही थी। तटवर्ती आम, सुपारी, कटहल, नारियल, अनार, श्रीफल (बेल), भृङ्ग (इलायची), नीबू, नारंगी, ऊँचे आम्रातक (आमड़ा), जामुन, केले, केवड़े और कदम्बसमूह आदि फूले-फले वृक्षोंसे उन खाइयोंकी सब ओरसे शोभा हो रही थी। वे सारी परिखाएँ सदा वृक्षोंसे ढकी होनेके कारण जल-क्रीड़ाके योग्य थीं। अतएव सबको प्रिय थीं। परिखाओंके एकान्त स्थानमें जानेके लिये विश्वकर्माने उत्तम मार्ग बनाया, जो स्वजनोंके लिये सुगम और शत्रुवर्गके लिये दुर्गम था। थोड़े-थोड़े जलसे ढके हुए मणिमय खम्भोंद्वारा संकेतसे उस मार्गपर खम्भोंकी सीमा बनायी गयी थी। वह मार्ग न तो अधिक संकीर्ण था और न अधिक विस्तृत ही था। परिखाके ऊपरी भागमें देवशिल्पीने मनोहर परकोटा बनाया था, जिसकी ऊँचाई बहुत अधिक थी। वह सौ धनुषके बराबर ऊँचा था। उसमें लगा हुआ एक-एक पत्थर पचीस-पचीस हाथ लंबा था। सिन्दूरी रंगकी मणियोंसे निर्मित वह प्राकार बड़ा ही सुन्दर दिखायी देता था। उसमें बाहरसे दो और भीतरसे सात दरवाजे थे। दरवाजे मणिसारनिर्मित किवाड़ोंसे बंद रहते थे। वह नन्दभवन इन्द्रनीलमणिके चित्रित कलशोंद्वारा विशेष शोभा पा रहा था। मणिसाररचित कपाट भी उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। स्वर्णसारनिर्मित कलशोंसे उसका शिखरभाग बहुत ही उद्दीप्त जान पड़ता था। नन्दभवनका निर्माण करके विश्वकर्मा नगरमें घूमने लगे। उन्होंने नाना प्रकारके मनोहर राजमार्ग बनाये। रक्तभानुमणिकी बनी हुई वेदियों तथा सुन्दर पत्तनोंसे वे मार्ग सुशोभित होते थे। उन्हें आर-पार दोनों ओरसे बाँधकर पक्का बनाया गया था, जिससे वे बड़े मनोहर लगते थे। राजमार्गके दोनों ओर मणिमय मण्डप बने हुए थे, जो वैश्योंके वाणिज्य-व्यवसायके उपयोगमें आने योग्य थे। वे मण्डप दायें-बायें सब ओरसे प्रकाशित हो उन राजमार्गोंको भी प्रकाश पहुँचाते थे। तदनन्तर वृन्दावनमें जाकर विश्वकर्माने सुन्दर, गोलाकार और मणिमय परकोटोंसे युक्त रासमण्डलका निर्माण किया, जो सब ओरसे एक-एक योजन

५०४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण


विस्तृत था। उसमें स्थान-स्थानपर मणिमय वेदिकाएँ बनी हुई थीं। मणिसाररचित नौ करोड़ मण्डप उस रासमण्डलकी शोभा बढ़ाते थे। वे शृङ्गारके योग्य, चित्रोंसे सुसज्जित और शय्याओंसे सम्पन्न थे। नाना जातिके फूलोंकी सुगन्ध लेकर बहती हुई वायु उन मण्डपोंको सुवासित करती थी। उनमें रत्नमय प्रदीप जलते थे। सुवर्णमय कलश उनकी उज्ज्वलता बढ़ा रहे थे। पुष्पोंसे भरे हुए उद्यानों तथा सरोवरोंसे सुशोभित रासस्थलका निर्माण करके विश्वकर्मा दूसरे स्थानको गये। वे उस रमणीय वृन्दावनको देखकर बहुत संतुष्ट हुए। वनके भीतर जगह-जगह एकान्त स्थानमें मन-बुद्धिसे विचार और निश्चय करके उन्होंने वहाँ तीस रमणीय एवं विलक्षण वनोंका निर्माण किया। वे केवल श्रीराधा-माधवकी ही क्रीड़ाके लिये बनाये गये थे।

तदनन्तर मधुवनके निकट अत्यन्त मनोहर निर्जन स्थानमें वटवृक्षके मूलभागके निकट सरोवरके पश्चिम किनारे केतकीवनके बीच और चम्पाके उद्यानके पूर्व विश्वकर्माने राधा-माधवकी क्रीड़ाके लिये पुनः एक रत्नमय मण्डपका निर्माण किया, जो चार वेदिकाओंसे घिरा हुआ और अत्यन्त सुन्दर था। रत्नसाररचित सौ तूलिकाएँ उसकी शोभा बढ़ाती थीं। अमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित तथा नाना प्रकारके चित्रोंसे चित्रित नौ जोड़े कपाटों और नौ मनोहर द्वारोंसे उस रत्नमण्डपकी बड़ी शोभा हो रही थी। उस मण्डपकी दीवारोंके दोनों बगलमें और ऊपर भी श्रेष्ठ रत्नोंद्वारा रचित कृत्रिम चित्रमय कलश उसकी श्रीवृद्धि कर रहे थे। उन कलशोंकी तीन कोटियाँ थीं। उक्त रत्नमण्डपमें महामूल्यवान् श्रेष्ठ मणिरत्नोंद्वारा निर्मित नौ सोपान शोभा दे रहे थे। उत्तम रत्नोंके सारभागसे बने हुए कलशोंसे मण्डपका शिखर-भाग जगमगा रहा था। पताका, तोरण तथा श्वेत चामर उस भवनको शोभा बढ़ा रहे थे। उसमें सब ओर अमूल्य रत्नमय दर्पण लगे थे, जिनके कारण सबको अपने सामनेकी ओरसे ही वह मण्डप दीप्तिमान् दिखायी देता था। वह सौ धनुष ऊपरतक अग्नि-शिखाके समान प्रकाशपुञ्ज फैला रहा था। उसका विस्तार सौ हाथका था। वह रत्नमण्डप गोलाकार बना था। उसके भीतर रत्ननिर्मित शय्याएँ बिछी थीं, जिनसे उस उत्तम भवनके भीतरी भागकी बड़ी शोभा हो रही थी। उक्त शय्याओंपर अग्निशुद्ध दिव्य वस्त्र बिछे थे। मालाओंके समूहसे सुसज्जित होकर वे विचित्र शोभा धारण करते थे। पारिजातके फूलोंकी मालाओंके बने हुए तकिये उनपर यथास्थान रखे गये थे। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुंकुमसे वह सारा भवन सुवासित हो रहा था। उसमें मालती और चम्पाके फूलोंकी मालाएँ रखी थीं। नूतन शृङ्गारके योग्य तथा पारस्परिक प्रेमकी वृद्धि करनेवाले कपूरयुक्त ताम्बूलके बीड़े उत्तम रत्नमय पात्रोंमें सजाकर रखे गये थे। उस भवनमें रत्नोंकी बनी हुई बहुत-सी चौकियाँ थीं, जिनमें हीरे जड़े थे और मोतियोंकी झालरें लटक रही थीं। रत्नसारजटित कितने ही घट यथास्थान रखे हुए थे। रत्नमय चित्रोंसे चित्रित अनेक रत्नसिंहासन उस मण्डपकी शोभा बढ़ाते थे, जिनमें जड़ी हुई चन्द्रकान्त मणियाँ पिघलकर जलकी बूँदोंसे उस भवनको सींच रही थीं। शीतल एवं सुवासित जल तथा भोग्य वस्तुओंसे युक्त उस रमणीय मिलन-मन्दिर (रत्नमण्डप)-का निर्माण करके विश्वकर्मा फिर नगरमें गये।

जिनके लिये जो भवन बने थे, उनपर उनके नाम उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक लिखे। इस कार्यमें उनके शिष्य तथा यक्षगण उनकी सहायता करते थे। मुने! निद्राके स्वामी श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण उस समय निद्राके वशीभूत थे। उनको नमस्कार करके विश्वकर्मा अपने घरको चले गये। परमेश्वर श्रीकृष्णकी

श्रीकृष्णजन्मखण्ड

५०५

इच्छासे ही भूतलपर ऐसा आश्चर्यमय नगर निर्मित हुआ। इस प्रकार मैंने श्रीहरिका सारा मङ्गलमय चरित्र कह सुनाया, जो सुखद और पापहारी है। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो ?

नारदजीने पूछा— भगवन्! भारतवर्षमें इस काननका नाम 'वृन्दावन' क्यों हुआ ? इसकी व्युत्पत्ति अथवा संज्ञा क्या है ? आप उत्तम तत्त्वज्ञ हैं, अतः इस तत्त्वको बताइये।

सूतजी कहते हैं— नारदजीका प्रश्न सुनकर नारायण ऋषिने सानन्द हँसकर सारा ही पुरातन तत्त्व कहना आरम्भ किया।

भगवान् नारायण बोले— नारद! पहले सत्ययुगकी बात है। राजा केदार सातों द्वीपोंके अधिपति थे। ब्रह्मन्! वे सदा सत्य धर्ममें तत्पर रहते थे और अपनी स्त्रियों तथा पुत्र-पौत्रवर्गके साथ सानन्द जीवन बिताते थे। उन धार्मिक नरेशने समस्त प्रजाओंका पुत्रोंकी भाँति पालन किया। सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करके भी राजा केदारने इन्द्रपद पानेकी इच्छा नहीं की। वे नाना प्रकारके पुण्यकर्म करके भी स्वयं उनका फल नहीं चाहते थे। उनका सारा नित्यनैमित्तिक कर्म श्रीकृष्णकी प्रीतिके लिये ही होता था। केदारके समान राजाधिराज न तो कोई पहले हुआ है और न पुनः होगा ही। उन्होंने अपनी त्रिभुवनमोहिनी पत्नी तथा राज्यकी रक्षाका भार पुत्रोंपर रखकर जैगीषव्य मुनिके उपदेशसे तपस्याके लिये वनको प्रस्थान किया। वे श्रीहरिके अनन्य भक्त थे और निरन्तर उन्हींका चिन्तन करते थे। मुने! भगवान्‌का सुदर्शनचक्र राजाकी रक्षाके लिये सदा उन्हींके पास रहता था। वे मुनिश्रेष्ठ नरेश चिरकालतक तपस्या करके अन्तमें गोलोकको चले गये। उनके नामसे केदारतीर्थ प्रसिद्ध हुआ। अवश्य ही आज भी वहाँ मरे हुए प्राणीको तत्काल मुक्तिलाभ होता है।

उनकी कन्याका नाम वृन्दा था, जो लक्ष्मीकी अंश थी। उसने योगशास्त्रमें निपुण होनेके कारण किसीको अपना पुरुष नहीं बनाया। दुर्वासाने उसे परम दुर्लभ श्रीहरिका मन्त्र दिया। वह घर छोड़कर तपस्याके लिये वनमें चली गयी। उसने साठ हजार वर्षोंतक निर्जन वनमें तपस्या की। तब उसके सामने भक्तवत्सल भगवान् श्रीकृष्ण प्रकट हुए। उन्होंने प्रसन्नमुखसे कहा—'देवि! तुम कोई वर माँगो।' वह सुन्दर विग्रहवाले शान्तस्वरूप राधिका-कान्तको देखकर सहसा बोल उठी—'तुम मेरे पति हो जाओ।' उन्होंने 'तथास्तु' कहकर उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। वह कौतूहलवश श्रीकृष्णके साथ गोलोकमें गयी और वहाँ राधाके समान श्रेष्ठ सौभाग्यशालिनी गोपी हुई। वृन्दाने जहाँ तप किया था, उस स्थानका नाम 'वृन्दावन' हुआ अथवा वृन्दाने जहाँ क्रीड़ा की थी, इसलिये वह स्थान 'वृन्दावन' कहलाया।

वत्स! अब दूसरा पुण्यदायक इतिहास सुनो—जिससे इस काननका नाम 'वृन्दावन' पड़ा। वह प्रसङ्ग मैं तुमसे कहता हूँ, ध्यान दो। राजा कुशध्वजके दो कन्याएँ थीं। दोनों ही धर्मशास्त्रके ज्ञानमें निपुण थीं। उनके नाम थे—तुलसी और वेदवती। संसार चलानेका जो कार्य है, उससे उन दोनों बहिनोंको वैराग्य था। उनमेंसे वेदवतीने तपस्या करके परम पुरुष नारायणको प्राप्त किया। वह जनककन्या सीताके नामसे सर्वत्र विख्यात है। तुलसीने तपस्या करके श्रीहरिको पतिरूपमें प्राप्त करनेकी इच्छा की, किंतु दैववश दुर्वासाके शापसे उसने शङ्खचूड़को प्राप्त किया। फिर परम मनोहर कमलाकान्त भगवान् नारायण उसे प्राणवल्लभके रूपमें प्राप्त हुए। भगवान् श्रीहरिके शापसे देवेश्वरी तुलसी वृक्षरूपमें प्रकट हुई और तुलसीके शापसे श्रीहरि शालग्रामशिला हो गये। उस शिलाके वक्षः-

७४- श्रीकृष्णका विषमिश्रित यमुना-जल पीकर मरी हुई गौओंको जीवित करना

५०६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

स्थलपर उस अवस्थामें भी सुन्दरी तुलसी निरन्तर स्थित रहने लगी। मुने! तुलसीका सारा चरित्र तुमसे विस्तारपूर्वक कहा जा चुका है, तथापि यहाँ प्रसङ्गवश पुनः उसकी कुछ चर्चा की गयी। तपोधन! उस तुलसीकी तपस्याका एक यह भी स्थान है; इसलिये इसे मनीषी पुरुष 'वृन्दावन' कहते हैं। (तुलसी और वृन्दा समानार्थक शब्द है) अथवा मैं तुमसे दूसरा उत्कृष्ट हेतु बता रहा हूँ, जिससे भारतवर्षका यह पुण्यक्षेत्र वृन्दावनके नामसे प्रसिद्ध हुआ। राधाके सोलह नामोंमें एक वृन्दा नाम भी है, जो श्रुतिमें सुना गया है। उन वृन्दा नामधारिणी राधाका यह रमणीय क्रीडा-वन है; इसलिये इसे 'वृन्दावन' कहा गया है। पूर्वकालमें श्रीकृष्णने श्रीराधाकी प्रीतिके लिये गोलोकमें वृन्दावनका निर्माण किया था। फिर भूतलपर उनकी क्रीडाके लिये प्रकट हुआ वह वन उस प्राचीन नामसे ही 'वृन्दावन' कहलाने लगा।

नारदजीने पूछा— जगद्गुरो! श्रीराधिकाके सोलह नाम कौन-कौन-से हैं? मुझ शिष्यसे उन्हें बताइये; उन्हें सुननेके लिये मेरे मनमें उत्कण्ठा है। मैंने सामवेदमें वर्णित श्रीराधाके सहस्र नाम सुने हैं; तथापि इस समय आपके मुखसे उनके सोलह नामोंको सुनना चाहता हूँ। विभो! वे सोलह नाम उन सहस्र नामोंके ही अन्तर्गत हैं या उनसे भिन्न हैं? अहो! उन भक्तवाञ्छित पुण्यस्वरूप नामोंका मुझसे वर्णन कीजिये। साथ ही उन सबकी व्युत्पत्ति भी बताइये। जगत्के आदिकारण! जगन्माता श्रीराधाके उन सर्वदुर्लभ पावन नामोंको मैं सुनना चाहता हूँ।

श्रीनारायणने कहा— राधा, रासेश्वरी, रासवासिनी, रसिकेश्वरी, कृष्णप्राणाधिका, कृष्णप्रिया, कृष्णस्वरूपिणी, कृष्णवामाङ्गसम्भूता, परमानन्दरूपिणी, कृष्णा, वृन्दावनी, वृन्दा, वृन्दावनविनोदिनी, चन्द्रावली, चन्द्रकान्ता और शरच्चन्द्रप्रभानना—ये सारभूत सोलह नाम उन सहस्र नामोंके ही अन्तर्गत हैं। राधा शब्दमें 'धा' का अर्थ है संसिद्धि (निर्वाण) तथा 'रा' दानवाचक है। जो स्वयं निर्वाण (मोक्ष) प्रदान करनेवाली हैं; वे 'राधा' कही गयी हैं। रासेश्वरकी ये पत्नी हैं; इसलिये इनका नाम 'रासेश्वरी' है। उनका रासमण्डलमें निवास है; इससे वे 'रासवासिनी' कहलाती हैं। वे समस्त रसिक देवियोंकी परमेश्वरी हैं; अतः पुरातन संत-महात्मा उन्हें 'रसिकेश्वरी' कहते हैं। परमात्मा श्रीकृष्णके लिये वे प्राणोंसे भी अधिक प्रियतमा हैं; अतः साक्षात् श्रीकृष्णने ही उन्हें 'कृष्णप्राणाधिका' नाम दिया है। वे श्रीकृष्णकी अत्यन्त प्रिया कान्ता हैं अथवा श्रीकृष्ण ही सदा उन्हें प्रिय हैं; इसलिये समस्त देवताओंने उन्हें 'कृष्णप्रिया' कहा है। वे श्रीकृष्णरूपको लीलापूर्वक निकट लानेमें समर्थ हैं तथा सभी अंशोंमें श्रीकृष्णके सदृश हैं; अतः 'कृष्णस्वरूपिणी' कही गयी हैं। परम सती श्रीराधा श्रीकृष्णके आधे वामाङ्गभागसे प्रकट हुई हैं; अतः श्रीकृष्णने स्वयं ही उन्हें 'कृष्णवामाङ्गसम्भूता' कहा है। सती श्रीराधा स्वयं परमानन्दकी मूर्तिमती राशि हैं; अतः श्रुतियोंने उन्हें 'परमानन्दरूपिणी' की संज्ञा दी है। 'कृष्' शब्द मोक्षका वाचक है, 'ण' उत्कृष्टताका बोधक है और 'आकार' दाताके अर्थमें आता है। वे उत्कृष्ट मोक्षकी दात्री हैं; इसलिये 'कृष्णा' कही गयी हैं। वृन्दावन उन्हींका है; इसलिये वे 'वृन्दावनी' कही गयी हैं अथवा वृन्दावनकी अधिदेवी होनेके कारण उन्हें यह नाम प्राप्त हुआ है। सखियोंके समुदायको 'वृन्द' कहते हैं और 'अकार' सत्ताका वाचक है। उनके समूह-की-समूह सखियाँ हैं; इसलिये वे 'वृन्दा' कही गयी हैं। उन्हें सदा वृन्दावनमें विनोद प्राप्त होता है; अतः वेद उनको 'वृन्दावनविनोदिनी' कहते हैं।

७५- भगवान् श्रीकृष्णका रक्तरञ्जित मुखवाले कालियनागके मस्तकपर चढ़ना तथा उनके भारसे आक्रान्त हो कालियनागका प्राण त्याग देनेको उद्यत होना; नागपत्नी सुरसा तथा दूसरी नागिनियोंका श्रीहरिके सामने आकर रोना और उन्हें प्रणामकर अपनी बात कहना

श्रीकृष्णजन्मखण्ड

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वे सदा मुखचन्द्र तथा नखचन्द्रकी अवली (पंक्ति)-से युक्त हैं; इस कारण श्रीकृष्णने उन्हें 'चन्द्रावली' नाम दिया है। उनकी कान्ति दिन-रात सदा ही चन्द्रमाके तुल्य बनी रहती है; अतः श्रीहरि हर्षोल्लासके कारण उन्हें 'चन्द्रकान्ता' कहते हैं। उनके मुखपर दिन-रात शरत्कालके चन्द्रमाकी-सी प्रभा फैली रहती है; इसलिये मुनिमण्डलीने उन्हें 'शरच्चन्द्रप्रभानना' कहा है।

यह अर्थ और व्याख्याओंसहित षोडश-नामावली कही गयी; जिसे नारायणने अपने नाभिकमलपर विराजमान ब्रह्माको दिया था। फिर ब्रह्माजीने पूर्वकालमें मेरे पिता धर्मदेवको इन नामावलीका उपदेश दिया और श्रीधर्मदेवने महातीर्थ पुष्करमें सूर्य-ग्रहणके पुण्य पर्वपर देवसभाके बीच मुझे कृपापूर्वक इन सोलह नामोंका उपदेश दिया था। श्रीराधाके प्रभावकी प्रस्तावना होनेपर बड़े प्रसन्नचित्तसे उन्होंने इन नामोंकी व्याख्या की थी। मुने! यह राधाका परम पुण्यमय स्तोत्र है, जिसे मैंने तुमको दिया। महामुने! जो वैष्णव न हो तथा वैष्णवोंका निन्दक हो, उसे इसका उपदेश नहीं देना चाहिये। जो मनुष्य जीवनभर तीनों संध्याओंके समय इस स्तोत्रका पाठ करता है, उसकी यहाँ राधा-माधवके चरणकमलोंमें भक्ति होती है। अन्तमें वह उन दोनोंका दास्यभाव प्राप्त कर लेता है और दिव्य शरीर एवं अणिमा आदि सिद्धिको पाकर सदा उन प्रिया-प्रियतमके साथ विचरता है। नियमपूर्वक किये गये सम्पूर्ण व्रत, दान और उपवाससे, चारों वेदोंके अर्थसहित पाठसे, समस्त यज्ञों और तीर्थोंके विधिबोधित अनुष्ठान तथा सेवनसे, सम्पूर्ण भूमिकी सात बार की गयी परिक्रमासे, शरणागतकी रक्षासे, अज्ञानीको ज्ञान देनेसे तथा देवताओं और वैष्णवोंका दर्शन करनेसे भी जो फल प्राप्त होता है, वह इस स्तोत्रपाठकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं है। इस स्तोत्रके प्रभावसे मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है*।


* राधा रासेश्वरी रासवासिनी रसिकेश्वरी । कृष्णप्राणाधिका कृष्णप्रिया कृष्णस्वरूपिणी ॥
कृष्णवामाङ्गसम्भूता परमानन्दरूपिणी । कृष्णा वृन्दावनी वृन्दा वृन्दावनविनोदिनी ॥
चन्द्रावली चन्द्रकान्ता शरच्चन्द्रप्रभानना । नामान्येतानि साराणि तेषामभ्यन्तराणि च ॥
राधेत्येवं च संसिद्धौ राकारो दानवाचकः । स्वयं निर्वाणदात्री या सा राधा परिकीर्तिता ॥
रासेश्वरस्य पत्नीयं तेन रासेश्वरी स्मृता । रासे च वासो यस्याश्च तेन सा रासवासिनी ॥
सर्वासां रसिकानां च देवीनामीश्वरी परा । प्रवदन्ति पुरा सन्तस्तेन तां रसिकेश्वरीम् ॥
प्राणाधिका प्रेयसी सा कृष्णस्य परमात्मनः । कृष्णप्राणाधिका सा च कृष्णेन परिकीर्तिता ॥
कृष्णस्यातिप्रिया कान्ता कृष्णो वास्याः प्रियः सदा । सर्वैर्देवगणैरुक्ता तेन कृष्णप्रिया स्मृता ॥
कृष्णरूपं संनिधातुं या शक्ता चावलीलया । सर्वांशैः कृष्णसदृशी तेन कृष्णस्वरूपिणी ॥
वामाङ्कार्द्धेन कृष्णस्य या सम्भूता परा सती । कृष्णवामाङ्गसम्भूता तेन कृष्णेन कीर्तिता ॥
परमानन्दराशिश्च स्वयं मूर्तिमती सती । श्रुतिभिः कीर्तिता तेन परमानन्दरूपिणी ॥
कृषिर्मोक्षार्थवचनो ण एवोत्कृष्टवाचकः । आकारो दातृवचनस्तेन कृष्णा प्रकीर्तिता ॥
अस्ति वृन्दावनं यस्यास्तेन वृन्दावनी स्मृता । वृन्दावनस्याधिदेवी तेन वाथ प्रकीर्तिता ॥
सङ्घः सखीनां वृन्दः स्यादकारोऽप्यस्तिवाचकः । सखिवृन्दोऽस्ति यस्याश्च सा वृन्दा परिकीर्तिता ॥
वृन्दावने विनोदश्च सोऽस्या ह्यस्ति च तत्र वै । वेदा वदन्ति तां तेन वृन्दावनविनोदिनीम् ॥
नखचन्द्रावलीवक्त्रचन्द्रोऽस्ति यत्र संततम् । तेन चन्द्रावली सा च कृष्णेन परिकीर्तिता ॥
कान्तिरस्ति चन्द्रतुल्या सदा यस्या दिवानिशम् । मुनिना कीर्तिता तेन शरच्चन्द्रप्रभानना ॥
इदं षोडशनामोक्तमर्थव्याख्यानसंयुतम् । नारायणेन यद्दत्तं ब्रह्मणे नाभिपङ्कजे ॥
ब्रह्मणा च पुरा दत्तं धर्माय जनकाय मे । धर्मेण कृपया दत्तं मह्यमादित्यपर्वणि ॥