ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ४९७
द्वारा वटके मूलभागमें स्थित चण्डिकादेवीकी पूजा करो।'
श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर गोपोंने दिनमें देवताओंकी पूजा करके भोजन आदि किये और रातमें वहीं प्रसन्नतापूर्वक शयन किया।
(अध्याय १६)
विश्वकर्माका आगमन, उनके द्वारा पाँच योजन विस्तृत नूतन नगरका निर्माण, वृषभानु गोपके लिये पृथक् भवन, कलावती और वृषभानुके पूर्वजन्मका चरित्र, राजा सुचन्द्रकी तपस्या, ब्रह्माद्वारा वरदान, भनन्दनके यहाँ कलावतीका जन्म और वृषभानुके साथ उसका विवाह, विश्वकर्माद्वारा नन्द-भवनका, वृन्दावनके भीतर रासमण्डलका तथा मधुवनके पास रत्नमण्डपका निर्माण, 'वृन्दावन' नामका कारण, राजा केदारका इतिहास, तुलसीसे वृन्दावन नामका सम्बन्ध तथा राधाके सोलह नामोंमें 'वृन्दा' नाम, राधा नामकी व्याख्या, नींद टूटनेपर नूतन नगर देख ब्रजवासियोंका आश्चर्य तथा उन सबका उन भवनोंमें प्रवेश
भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! रातमें वृन्दावनके भीतर सब व्रजवासी और नन्दरायजी सो गये। निद्राके स्वामी श्रीकृष्ण भी माता यशोदाके वक्षःस्थलपर प्रगाढ़ निद्राके वशीभूत हो गये। रमणीय शय्याओंपर सोयी हुई गोपियाँ भी निद्रित हो गयीं। कोई शिशुओंको गोदमें लेकर, कोई सखियोंके साथ सटकर, कोई छकड़ोंपर और कोई रथोंपर ही स्थित होकर निद्रासे अचेत हो गयीं। पूर्णचन्द्रमाकी चाँदनी फैल जानेसे जब वृन्दावन स्वर्गसे भी अधिक मनोहर प्रतीत होने लगा, नाना प्रकारके कुसुमोंका स्पर्श करके बहनेवाली मन्द-मन्द वायुसे सारा वन-प्रान्त सुवासित हो उठा तथा समस्त प्राणी निश्चेष्ट होकर सो गये, तब रात्रिकालिक पञ्चम मुहूर्तके बीत जानेपर शिल्पियोंके गुरुके भी गुरु भगवान् विश्वकर्मा वहाँ आये। उन्होंने दिव्य एवं महीन वस्त्र पहन रखा था। उनके गलेमें मनोहर रत्नमाला शोभा दे रही थी। वे अनुपम रत्ननिर्मित अलंकारोंसे अलंकृत थे। उनके कानोंमें कान्तिमान् मकराकृत कुण्डल झलमला रहे थे। वे ज्ञान और अवस्थामें वृद्ध होनेपर भी किशोरकी भाँति दर्शनीय थे। अत्यन्त सुन्दर, तेजस्वी तथा कामदेवके समान कान्तिमान् थे।
उनके साथ विशिष्ट शिल्पकलामें निपुण तीन करोड़ शिल्पी थे। उन सबके हाथोंमें मणिरत्न, हेमरत्न तथा लोहनिर्मित अस्त्र थे। कुबेर-वनके किङ्कर यक्षसमुदाय भी वहाँ आ पहुँचे। वे स्फटिकमणि तथा रत्नमय अलंकारोंसे विभूषित थे। किन्हीं-किन्हींके कंधे बहुत बड़े थे। किन्हींके हाथोंमें पद्मरागमणिके ढेर थे तो किन्हींके हाथोंमें इन्द्रनीलमणिके। कुछ यक्षोंने अपने हाथोंमें स्यमन्तकमणि ले रखी थी और कुछ यक्षोंने चन्द्रकान्तमणि। अन्य बहुत-से यक्षोंके हाथोंमें सूर्यकान्तमणि और प्रभाकरमणिके ढेर प्रकाशित