भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 506, कुल 810 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 506
४९६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

चोटियाँ सजा रखी थीं। विप्रवर! सब ग्वाल-बाल, तरुण अवस्थावाली गोपियोंके यूथ और बड़ी-बूढ़ी गोपियोंकी अपार संख्या थी।

मुने! श्रीराधाकी जो सुशीला आदि सहेली गोपियाँ थीं, वे नाना प्रकारके अलंकारोंसे विभूषित हो बड़ी भव्य दिखायी देती थीं। दिव्य वस्त्र धारण कर हर्षसे मुस्कराती हुई वे सब-की-सब वृन्दावनकी ओर चलीं। कोई शिबिकापर सवार थीं तो कोई रथपर। राधिकादेवी रत्नमय अलंकारोंसे विभूषित हो सुवर्णमय उपकरणोंसे युक्त रथपर बैठकर उन सब सहेलियोंके साथ यात्रा कर रही थीं। यशोदा और रोहिणीजी भी रत्नमय अलंकारोंसे अलंकृत हो सुवर्णमय उपकरणोंसे सुसज्जित रथपर चढ़कर जा रही थीं। नन्द, सुनन्द, श्रीदामा, गिरिभानु, विभाकर, वीरभानु और चन्द्रभानु—ये प्रमुख गोपगण हाथीपर बैठकर सानन्द यात्रा कर रहे थे। श्रीकृष्ण और बलदेव दोनों भाई रत्ननिर्मित आभूषणोंसे विभूषित हो सुवर्णमय रथपर बैठकर बड़े हर्षके साथ वृन्दावनकी ओर जा रहे थे। कोटि-कोटि बूढ़े और जवान गोप उस यात्रामें सम्मिलित थे। कोई घोड़ेपर सवार थे, कोई हाथियोंपर बैठे थे और कितने ही रथपर चढ़कर यात्रा करते थे।

नन्दके सेवक उद्धत गोपगण बड़े हर्षके साथ चल रहे थे। उनमेंसे कुछ लोग बैलोंपर सवार थे। वे सब-के-सब संगीतकी तानमें तत्पर थे। राधिकाकी दूसरी-दूसरी दासियाँ बहुत बड़ी संख्यामें यात्रा कर रही थीं, उनके मनमें बड़ा उल्लास था। मुखपर मन्द मुस्कानकी छटा छा रही थी और वे सब-की-सब सोनेके गहनोंसे सजी थीं। उनमेंसे कितनोंके हाथमें सिन्दूर थे, कितनी ही काजल लेकर चल रही थीं। किन्हींके हाथोंमें कन्दुक थे तो किन्हींके पुतलियाँ। कुछ सुन्दरी दासियाँ अपने हाथोंमें भोग-द्रव्य और क्रीड़ा-द्रव्य लेकर चल रही थीं। किन्हींके हाथोंमें वेशरचनाकी सामग्री थी तो किन्हींके हाथोंमें फूलोंकी मालाएँ। कुछ गोपियाँ हाथोंमें वीणा आदि वाद्य लिये सानन्द यात्रा कर रही थीं। कुछ अपने साथ अग्निशुद्ध दिव्य वस्त्रोंका भार लिये चल रही थीं। कितनी ही चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और केसरका द्रव ले जा रही थीं। कोई संगीतमें मग्न थीं तो कोई विचित्र कथाएँ कह रही थीं। उस समय कोटि-कोटि शिबिकाएँ, रथ, घोड़े, गाड़ियाँ, बैल और लाखों हाथी आदि चल रहे थे। मुने! वृन्दावनमें पहुँचकर सबने उसे गृहशून्य देखा। तब वे सभी लोग वृक्षोंके नीचे यथास्थान ठहर गये। उस समय श्रीकृष्णने गोपोंको अभीष्ट गृह और गौओंके ठहरनेके स्थान बताते हुए कहा—'आज इसी तरह ठहरो। कल सब व्यवस्था हो जायगी।' श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर गोपोंने पूछा—'कन्हैया! यहाँ कहाँ घर हैं।' उनका यह प्रश्न सुनकर श्रीकृष्ण बोले—'इस स्थानपर बहुत-से स्वच्छ गृह हैं, जिन्हें देवताओंने बनाया है; परंतु उन देवताओंको प्रसन्न किये बिना कोई भी गृह हमारी दृष्टिमें नहीं आ सकते। अतः गोपगण! आज वनदेवताओंकी पूजा करके बाहर ही ठहरो। प्रातःकाल तुम्हें यहाँ निश्चय ही बहुत-से रमणीय गृह दिखायी देंगे। धूप, दीप, नैवेद्य, भेंट, पुष्प और चन्दन आदिके