भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 513

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५०३ शिल्पिशिरोमणि विश्वकर्मा वृषभानुके आश्रमपर जाकर वहाँसे अपने सेवकगणोंके साथ दूसरे स्थानपर गये। वे तत्त्वज्ञ थे। उन्होंने मन-ही-मन एक कोस लंबे-चौड़े एक मनोहर स्थानका विचार करके वहाँ महात्मा नन्दके लिये आश्रम बनाना आरम्भ किया। बुद्धिसे अनुमान करके उनके लिये सबसे विलक्षण भवन बनाया। वह श्रेष्ठ भवन चार गहरी खाइयोंसे घिरा हुआ था, शत्रुओंके लिये उन्हें लाँघना बहुत कठिन था। उन चारों खाइयोंमें प्रस्तर जुड़े हुए थे। उन खाइयोंके दोनों तटोंपर फूलोंके उद्यान थे, जिनके कारण वे पुष्पोंसे सजी हुई-सी जान पड़ती थीं और सुन्दर एवं मनोहर चम्पाके वृक्ष तटोंपर खिले हुए थे। उन्हें छूकर बहनेवाली सुगन्धित वायु उन परिखाओंको सब ओरसे सुवासित कर रही थी। तटवर्ती आम, सुपारी, कटहल, नारियल, अनार, श्रीफल (बेल), भृङ्ग (इलायची), नीबू, नारंगी, ऊँचे आम्रातक (आमड़ा), जामुन, केले, केवड़े और कदम्बसमूह आदि फूले-फले वृक्षोंसे उन खाइयोंकी सब ओरसे शोभा हो रही थी। वे सारी परिखाएँ सदा वृक्षोंसे ढकी होनेके कारण जल-क्रीड़ाके योग्य थीं। अतएव सबको प्रिय थीं। परिखाओंके एकान्त स्थानमें जानेके लिये विश्वकर्माने उत्तम मार्ग बनाया, जो स्वजनोंके लिये सुगम और शत्रुवर्गके लिये दुर्गम था। थोड़े-थोड़े जलसे ढके हुए मणिमय खम्भोंद्वारा संकेतसे उस मार्गपर खम्भोंकी सीमा बनायी गयी थी। वह मार्ग न तो अधिक संकीर्ण था और न अधिक विस्तृत ही था। परिखाके ऊपरी भागमें देवशिल्पीने मनोहर परकोटा बनाया था, जिसकी ऊँचाई बहुत अधिक थी। वह सौ धनुषके बराबर ऊँचा था। उसमें लगा हुआ एक-एक पत्थर पचीस-पचीस हाथ लंबा था। सिन्दूरी रंगकी मणियोंसे निर्मित वह प्राकार बड़ा ही सुन्दर दिखायी देता था। उसमें बाहरसे दो और भीतरसे सात दरवाजे थे। दरवाजे मणिसारनिर्मित किवाड़ोंसे बंद रहते थे। वह नन्दभवन इन्द्रनीलमणिके चित्रित कलशोंद्वारा विशेष शोभा पा रहा था। मणिसाररचित कपाट भी उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। स्वर्णसारनिर्मित कलशोंसे उसका शिखरभाग बहुत ही उद्दीप्त जान पड़ता था। नन्दभवनका निर्माण करके विश्वकर्मा नगरमें घूमने लगे। उन्होंने नाना प्रकारके मनोहर राजमार्ग बनाये। रक्तभानुमणिकी बनी हुई वेदियों तथा सुन्दर पत्तनोंसे वे मार्ग सुशोभित होते थे। उन्हें आर-पार दोनों ओरसे बाँधकर पक्का बनाया गया था, जिससे वे बड़े मनोहर लगते थे। राजमार्गके दोनों ओर मणिमय मण्डप बने हुए थे, जो वैश्योंके वाणिज्य-व्यवसायके उपयोगमें आने योग्य थे। वे मण्डप दायें-बायें सब ओरसे प्रकाशित हो उन राजमार्गोंको भी प्रकाश पहुँचाते थे। तदनन्तर वृन्दावनमें जाकर विश्वकर्माने सुन्दर, गोलाकार और मणिमय परकोटोंसे युक्त रासमण्डलका निर्माण किया, जो सब ओरसे एक-एक योजन