ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५०२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण व्रजराज ! आप व्रजको पधारिये।' ऐसा उत्तर देकर लोग चले गये। नन्दके मनमें बड़ा हर्ष हुआ। वे राजभवनको गये। रथसे उतरकर उन्होंने तत्काल ही राजसभामें प्रवेश किया। राजा उठकर खड़े हो गये। उन्होंने नन्दरायजीसे बातचीत की और उन्हें बैठनेके लिये सोनेका सिंहासन दिया। उन दोनोंमें परस्पर बहुत प्रेमालाप हुआ। फिर नन्दने विनीत होकर राजासे सम्बन्धकी बात चलायी। नन्दजीने कहा - राजेन्द्र ! सुनिये। मैं एक शुभ एवं विशेष बात कह रहा हूँ। आप इस समय अपनी कन्याका सम्बन्ध एक विशिष्ट पुरुषके साथ स्थापित कीजिये। व्रजमें सुरभानुके पुत्र श्रीमान् वृषभानु निवास करते हैं, जो व्रजके राजा हैं। वे भगवान् नारायणके अंशसे उत्पन्न हुए हैं और उत्तम गुणोंके भण्डार, सुन्दर, सुविद्वान्, सुस्थिर यौवनसे युक्त, योगी, पूर्वजन्मकी बातोंको स्मरण करनेवाले और नवयुवक हैं। आपकी कन्या भी यज्ञकुण्डसे उत्पन्न हुई है; अतः अयोनिजा है। त्रिभुवनमोहिनी कन्या कलावती भगवती कमलाकी अंश है और स्वभावतः शान्त जान पड़ती है। वृषभानु आपकी पुत्रीके योग्य हैं तथा आपकी पुत्री भी उन्हींके योग्य है। मुने ! राजसभामें ऐसा कहकर नन्दजी चुप हो गये। तब नृपश्रेष्ठ भनन्दनने विनयसे नम्र हो उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया। भनन्दन बोले - व्रजेश्वर ! सम्बन्ध तो विधाताके वशकी बात है। वह मेरे द्वारा साध्य नहीं है। ब्रह्माजी ही सम्बन्ध करनेवाले हैं। मैं तो केवल जन्मदाता हूँ। कौन किसकी पत्नी या कन्या है तथा कौन किसका साधन-सम्पन्न पति है? इसे विधाताके सिवा और कौन जानता है? कर्मोंके अनुरूप फल देनेवाले विधाता ही सबके कारण हैं। किया हुआ कर्म कभी निष्फल नहीं होता, उसका फल मिलकर ही रहेगा - ऐसा श्रुतिमें सुना गया है। अन्यथा असमर्थ पुरुषके उद्यमकी भाँति सारा कर्म निष्फल हो जाता है। यदि विधाताने मेरी पुत्रीको ही वृषभानुकी पत्नी होनेकी बात लिखी है तो वह पहलेसे ही उनकी पत्नी है। मैं फिर कौन हूँ, जो उसमें बाधा डाल सकूँ तथा दूसरा भी कौन उस सम्बन्धका निवारण कर सकता है? नारद ! यों कहकर राजेन्द्र भनन्दनने विनयसे सिर झुकाकर नन्दरायजीको आदरपूर्वक मिष्टान्न भोजन कराया। तत्पश्चात् राजाकी अनुमति ले व्रजराज व्रजको लौट गये। जाकर उन्होंने सुरभानुकी सभामें सब बातें बतायीं। सुरभानुने भी यत्नपूर्वक नन्द और गर्गजीके सहयोगसे सादर इस सम्बन्धको जोड़ा। विवाहकालमें महाराज भनन्दनने गजरत्न, अश्वरत्न, अन्यान्य रत्न तथा मणियोंके आभूषण आदि बहुत दहेज दिये। वृषभानु कलावतीको पाकर बड़ी प्रसन्नताके साथ निर्जन एवं रमणीय स्थानमें उसके साथ विहार करने लगे। कलावती एक पलका भी विरह होनेपर स्वामीके बिना व्याकुल हो उठती थी और वृषभानु भी एक क्षणके लिये भी कलावतीके दूर होनेपर उसके बिना विकल हो जाते थे। वह राजकन्या पूर्वजन्मकी बातोंको याद रखनेवाली देवी थी। मायासे मनुष्यरूपमें प्रकट हुई थी। वृषभानु भी श्रीहरिके अंश और जातिस्मर थे तथा कलावतीको पाकर बड़े प्रसन्न थे। उन दोनोंका प्रेम प्रतिदिन नया-नया होकर बढ़ने लगा। लीलावश पूर्वकालमें सुदामाके शाप और श्रीकृष्णकी आज्ञासे श्रीकृष्णप्राणाधिका सती राधिका उन दोनोंकी अयोनिजा पुत्री हुईं। उसके दर्शनमात्रसे वे दोनों दम्पति भवबन्धनसे मुक्त हो गये। नारद ! इस प्रकार इतिहास कहा गया। अब जिसका प्रकरण चल रहा है, वह प्रसङ्ग सुनो। उक्त इतिहास पापरूपी ईंधनको जलानेके लिये प्रज्वलित अग्निकी शिखाके समान है।