भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 518, कुल 810 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 518
५०८संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

नारदजीने कहा— प्रभो! यह सर्वदुर्लभ परम आश्चर्यमय स्तोत्र मुझे प्राप्त हुआ। देवी श्रीराधाका 'संसारविजय' नामक कवच भी उपलब्ध हुआ। सुयज्ञने जिसका प्रयोग किया था, वह दुर्लभ स्तोत्र भी मुझे सुलभ हो गया। भगवान् श्रीकृष्णकी विचित्र कथा सुनकर आपके चरणकमलोंके प्रसादसे मैंने बहुत कुछ पा लिया। अब मैं जिस रहस्यको सुनना चाहता हूँ, उसका वर्णन कीजिये। मुने! वृन्दावनमें प्रातःकाल उस अद्भुत नगरको देखकर गोपोंने क्या कहा?

भगवान् श्रीनारायण बोले— नारद! जब वहाँ रात बीत गयी, विश्वकर्मा चले गये और अरुणोदयकी बेला आयी, तब सब लोग जाग उठे। उठते ही सबसे विलक्षण उस नगरको देख व्रजवासी आपसमें कहने लगे—'यह क्या आश्चर्य है? यह क्या आश्चर्य है?' किन्हीं गोपोंने कुछ अन्य गोपोंने पूछा—'यह कैसे सम्भव हुआ? न जाने भूतलपर किस रूपसे कौन प्रकट हो सकता है?' परंतु नन्दरायजी गर्गके वाक्योंका स्मरण करके मन-ही-मन सब कुछ जान गये। उन्होंने भीतर-ही-भीतर विचार किया—'यह समस्त चराचर जगत् श्रीहरिकी इच्छासे ही उत्पन्न हुआ है। जिनके भ्रूभङ्गकी लीलामात्रसे ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त सारा जगत् आविर्भूत और तिरोभूत होता रहता है, उनके लिये क्या और कैसे असाध्य है? अहो! जिनके रोमकूपोंमें ही सारे ब्रह्माण्ड स्थित हैं, उन परमेश्वर महाविष्णु श्रीहरिके लिये क्या असाध्य हो सकता है? ब्रह्मा, शेषनाग, शिव और धर्म जिनके चरणारविन्दोंका दर्शन करते रहते हैं, उन माया-मानव-रूपधारी परमेश्वरके लिये कौन-सा ऐसा कार्य है, जो असाध्य हो?' नन्दजीने उस नगरमें घूम-घूमकर, एक-एक घरको देख-देखकर और वहाँ लिखे हुए नामोंको पढ़कर सबके लिये घरोंका वितरण किया। नन्द और वृषभानुने शुभ मुहूर्त देखकर प्रवेशकालिक मङ्गलकृत्यका सम्पादन करके अपने सेवकगणोंके साथ अपने-अपने आश्रममें प्रवेश किया। वृन्दावनमें रहकर उन सबके मुख और नेत्र प्रसन्नतासे खिल उठे। उन सब गोपोंने बड़े आनन्दके साथ अपने-अपने उत्तम आश्रममें पदार्पण किया। अपने-अपने मनोहर स्थानपर सब गोपोंको बड़ा आनन्द मिला। वहाँके बालक और बालिकाएँ हर्षपूर्वक खेलने-कूदने लगीं। श्रीकृष्ण और बलदेव भी कौतूहलवश गोपशिशुओंके साथ वहाँ प्रत्येक मनोहर स्थानपर बालोचित क्रीड़ा करने लगे। नारद! इस प्रकार मैंने नगर-निर्माणका सारा वृत्तान्त कह सुनाया। वनमें गोपबालाओंके लिये जो रासमण्डल बना था, उसकी भी बात बतायी। (अध्याय १७)


पुष्करे च महातीर्थे पुण्याहे देवसंसदि॥
राधाप्रभावप्रस्तावे सुप्रसन्नेन चेतसा। इदं स्तोत्रं महापुण्यं तुभ्यं दत्तं मया मुने॥
निन्दकायावैष्णवाय न दातव्यं महामुने। यावज्जीवमिदं स्तोत्रं त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः॥
राधामाधवयोः पादपद्मे भक्तिर्भवेदिह। अन्ते लभेत्तयोर्दास्यं शश्वत्सहचरो भवेत्॥
अणिमादिकसिद्धिं च संप्राप्य नित्यविग्रहम्। व्रतदानोपवासैश्च सर्वैर्नियमपूर्वकैः॥
चतुर्णां चैव वेदानां पाठः सर्वार्थसंयुतैः। सर्वेषां यज्ञतीर्थानां करणैर्विधिबोधितैः॥
प्रदक्षिणेन भूमेश्च कृत्स्नाया एव सप्तधा। शरणागतरक्षायामज्ञानां ज्ञानदानतः॥
देवानां वैष्णवानां च दर्शनेनापि यत् फलम्। तदेव स्तोत्रपाठस्य कलां नार्हति षोडशीम्॥
स्तोत्रस्यास्य प्रभावेण जीवन्मुक्तो भवेन्नरः। (१७। २२०—२४६)