ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 519, कुल 810 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ५०९
श्रीवनके समीप यज्ञ करनेवाले ब्राह्मणोंकी पत्नियोंका ग्वालबालोंसहित श्रीकृष्णको भोजन देना तथा उनकी कृपासे गोलोकधामको जाना, श्रीकृष्णकी मायासे निर्मित उनकी छायामयी स्त्रियोंका ब्राह्मणोंके घरोंमें जाना तथा विप्रपत्नियोंके पूर्वजन्मका परिचय
नारदजी बोले— मुनिश्रेष्ठ! ज्ञानसिन्धो! मैं आपका शरणागत शिष्य हूँ। आप मुझे श्रीकृष्ण-लीलामृतका पान कराइये।
भगवान् श्रीनारायणने कहा— एक दिन बलरामसहित श्रीकृष्ण ग्वालबालोंको साथ ले श्रीमधुवनमें गये, जहाँ यमुनाके किनारे कमल खिले हुए थे। उस समय सब बालक सहस्रों गौओंके साथ वहाँ विचरने और खेलने लगे। खेलते-खेलते वे थक गये और उन्हें भूख-प्यास सताने लगी। तब सब गोपशिशु बड़ी प्रसन्नताके साथ श्रीकृष्णके पास आये और बोले—'कन्हैया! हमें बड़ी भूख लगी है। हम सेवकोंको आज्ञा दो, क्या करें?' ग्वालबालोंकी बात सुनकर प्रसन्नमुख और नेत्रवाले दयानिधान श्रीहरिने उनसे यह हितकर तथा सच्ची बात कही।
श्रीकृष्ण बोले— बालको! जहाँ ब्राह्मणोंका सुखदायक यज्ञस्थान है, वहाँ जाओ। जाकर उन यज्ञतत्पर ब्राह्मणोंसे शीघ्र ही भोजनके लिये अन्न माँगो। वे सभी आङ्गिरस गोत्रवाले ब्राह्मण हैं और श्रीवनके निकट अपने आश्रममें यज्ञ करते हैं। उन्होंने श्रुतियों और स्मृतियोंका विशेष ज्ञान प्राप्त किया है। वे सब निःस्पृह वैष्णव हैं और मोक्षकी कामनासे मेरा ही यजन कर रहे हैं। परंतु मायासे आच्छादित होनेके कारण उन्हें इस बातका पता नहीं है कि योगमायासे मनुष्यरूप धारण करके प्रकट हुआ मैं ही उनका आराध्य देव हूँ। केवल यज्ञकी ओर ही उन्मुख रहनेवाले वे ब्राह्मण यदि तुम्हें अन्न न दें तो शीघ्र ही जाकर उनकी पत्नियोंसे माँगना; क्योंकि वे बालकोंके प्रति दयासे भरी हुई हैं।
श्रीकृष्णकी बात सुनकर वे श्रेष्ठ गोपबालक ब्राह्मणोंके सामने जा मस्तक झुकाकर खड़े हो गये और बोले—'विप्रवरो! हमें शीघ्र भोजन दीजिये।' परंतु उनमेंसे कुछ द्विजोंने तो उनकी बात सुनी ही नहीं और कुछ लोग सुनकर भी ज्यों-के-त्यों खड़े रह गये। तब वे पाकशालामें गये, जहाँ ब्राह्मणियाँ भोजन बना रही थीं। उन बालकोंने ब्राह्मणपत्नियोंको सिर झुकाकर प्रणाम किया। प्रणाम करके वे सब बालक उन पतिव्रता ब्राह्मणियोंसे बोले—'माताओ! हम सब बालक भूखसे पीड़ित हैं। हमें भोजन दो।'
उन बालकोंकी बात सुनकर और उनकी मनोहर आकृति देखकर उन सती-साध्वी ब्राह्मणियोंने मुस्कराते हुए मुखारविन्दसे आदरपूर्वक पूछा।
ब्राह्मणपत्नियां बोलीं— समझदार बालको! तुमलोग कौन हो? किसने तुम्हें भेजा है? और तुम्हारे नाम क्या हैं? हम तुम्हें व्यञ्जनसहित नाना प्रकारका श्रेष्ठ भोजन प्रदान करेंगी।
ब्राह्मणियोंकी बात सुनकर वे सभी स्निग्ध एवं हृष्ट-पुष्ट गोपबालक प्रसन्नतापूर्वक हँसते हुए बोले।
बालकोंने कहा— माताओ! हमें बलराम और श्रीकृष्णने भेजा है। हमलोग भूखसे बहुत पीड़ित हैं। हमें भोजन दो। हम शीघ्र ही उनके पास लौट जायँगे। यहाँसे थोड़ी दूरपर वनके भीतर भाण्डीर-वटके निकट मधुवनमें बलराम और केशव बैठे हैं। वे दोनों भाई भी थके-माँदे और भूखे हैं तथा भोजन माँग रहे हैं।