ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 521, कुल 810 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ५११
तेजस्वी हैं, ज्ञान और ज्ञानी हैं तथा इन सबसे परे हैं। वेदमें आपको अनिर्वचनीय कहा गया है; फिर कौन आपकी स्तुति करनेमें समर्थ है? सृष्टिके सूत्रभूत जो महत्तत्त्व आदि एवं पञ्च-तन्मात्राएँ हैं, वे भी आपसे भिन्न नहीं हैं। आप सम्पूर्ण शक्तियोंके बीज तथा सर्वशक्तिस्वरूप हैं। समस्त शक्तियोंके ईश्वर हैं, सर्वरूप हैं तथा सब शक्तियोंके आश्रय हैं। आप निरीह, स्वयंप्रकाश, सर्वानन्दमय तथा सनातन हैं। अहो! आकारहीन होते हुए भी आप सम्पूर्ण आकारोंसे युक्त हैं—सब आकार आपके ही हैं। आप सम्पूर्ण इन्द्रियोंके विषयोंको जानते हैं तो भी इन्द्रियवान् नहीं हैं। जिनकी स्तुति करने तथा जिनके तत्त्वका निरूपण करनेमें सरस्वती जडवत् हो जाती हैं; महेश्वर, शेषनाग, धर्म और स्वयं विधाता भी जडतुल्य हो जाते हैं; पार्वती, लक्ष्मी, राधा एवं वेदजननी सावित्री भी जडताको प्राप्त हो जाती हैं; फिर दूसरे कौन विद्वान् आपकी स्तुति कर सकते हैं? प्राणेश्वरेश्वर! हम स्त्रियाँ आपकी क्या स्तुति कर सकती हैं? देव! हमपर प्रसन्न होइये। दीनबन्धो! कृपा कीजिये।
यों कह सब ब्राह्मणपत्नियाँ उनके चरणारविन्दोंमें पड़ गयीं। तब श्रीकृष्णने प्रसन्नमुख एवं नेत्रोंसे उन सबको अभयदान दिया।
जो पूजाकालमें विप्रपत्नियोंद्वारा किये गये इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह ब्राह्मणपत्नियोंको मिली हुई गतिको प्राप्त कर लेता है; इसमें संशय नहीं है।
भगवान् श्रीनारायण कहते हैं—नारद! उन ब्राह्मणपत्नियोंको अपने चरणारविन्दोंमें पड़ी देख श्रीमधुसूदनने कहा—'देवियो! वर माँगो। तुम्हारा कल्याण होगा।' श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर विप्रपत्नियोंको बड़ी प्रसन्नता हुई, श्रद्धासे उनका मस्तक झुक गया और वे भक्तिभावसे इस प्रकार बोलीं।
**द्विजपत्नियोंने कहा—**श्रीकृष्ण! हम आपसे वर नहीं लेंगी। हमारी अभिलाषा यह है कि आपके चरणकमलोंकी सेवा प्राप्त हो; अतः आप हमें अपना दास्यभाव तथा परम दुर्लभ सुदृढ़ भक्ति प्रदान करें। केशव! हम प्रतिक्षण आपके मुखारविन्दको देखती रहें, यही कृपा कीजिये। प्रभो! अब हम पुनः घरको नहीं जायेंगी।
द्विजपत्नियोंकी यह बात सुनकर करुणानिधान त्रिलोकीनाथ श्रीकृष्णने 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। फिर वे बालकोंकी मण्डलीमें बैठ गये। तदनन्तर ब्राह्मणपत्नियोंने उन्हें सुधाके समान मधुर अन्न प्रदान किया। भगवान्ने उस अन्नको लेकर गोप-बालकोंको भोजन कराया और स्वयं भी भोजन किया। इसी समय विप्रपत्नियोंने देखा कि आकाशसे एक सोनेका बना हुआ श्रेष्ठ विमान उतर रहा है। उसमें रत्नमय दर्पण लगे हैं। उसके सभी उपकरण रत्नोंके सारतत्त्वसे बने हुए हैं। वह रत्नोंके ही खम्भोंसे आबद्ध है तथा उत्तम रत्नमय कलशोंसे वह और भी उज्ज्वल जान पड़ता है। उसमें श्वेत चँवर लगे हुए हैं। अग्निशुद्ध दिव्य वस्त्र उसकी शोभा बढ़ाते हैं। उस विमानको पारिजातके फूलोंकी मालाओंके जालसे सजाया गया है। उसमें सौ पहिये हैं। मनके समान वेगसे चलनेवाला वह विमान बड़ा मनोहर है। वनमालासे विभूषित दिव्य पार्षद उसे सब ओरसे घेरे खड़े हैं। उन पार्षदोंने पीताम्बर पहन रखा है। वे रत्नमय अलंकारोंसे अलंकृत, नूतन यौवनसे सम्पन्न, श्यामकान्तिवाले, परम मनोहर, दो भुजाओंसे युक्त तथा गोपवेशधारी थे। उनके हाथोंमें मुरली थी। उन्होंने मोरपङ्ख और गुञ्जाकी