ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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मालासे आबद्ध टेढ़े मुकुट धारण कर रखे थे।
वे रथसे तुरंत ही उतरकर श्रीहरिके चरणोंमें प्रणाम करके ब्राह्मणपत्नियोंसे बोले—'आपलोग इस विमानपर चढ़ जायँ।' ब्राह्मणपत्नियाँ श्रीहरिको नमस्कार करके मनोवाञ्छित गोलोकमें जा पहुँचीं। वे मानव-देहका त्याग करके तत्काल दिव्य गोपी हो गयीं। तत्पश्चात् श्रीहरिने वैष्णवी मायाके द्वारा उनकी छायाका निर्माण करके स्वयं ही उन्हें ब्राह्मणोंके घरोंमें भेज दिया। ब्राह्मण-लोग अपनी पत्नियोंके लिये मन-ही-मन बहुत उद्विग्न थे और सब ओर उनकी खोज कर रहे थे। इसी समय रास्तेमें उन्हें अपनी पत्नियाँ दिखायी दीं। उन्हें देखकर सब ब्राह्मणोंके मुख और नेत्र प्रसन्नतासे खिल उठे। सम्पूर्ण अङ्ग पुलकित हो गये और वे विनयपूर्वक उनसे बोले।
**ब्राह्मणोंने कहा—**अहो! तुम सब लोग परम धन्य हो; क्योंकि तुमने साक्षात् परमेश्वरके दर्शन किये हैं। हमारा जीवन व्यर्थ है। हम-लोगोंका वेदपाठ भी निरर्थक है। वेद और पुराणमें सर्वत्र विद्वानोंद्वारा श्रीहरिकी ही समस्त विभूतियोंका वर्णन किया गया है। सबके जनक श्रीहरि ही हैं। तप, जप, व्रत, ज्ञान, वेदाध्ययन, पूजन, तीर्थ-स्नान और उपवास—सबके फलदाता श्रीकृष्ण ही हैं। जिसने श्रीकृष्णकी सेवा कर ली, उसे तपस्याओंके फलोंसे क्या प्रयोजन है? जिसे कल्पवृक्षकी प्राप्ति हो गयी, वह दूसरे किसी वृक्षको लेकर क्या करेगा? जिसके हृदयमें श्रीकृष्ण विराजमान हैं, उसे यज्ञादि कर्मोंके अनुष्ठानकी क्या आवश्यकता है? जिसने समुद्रको पी लिया, उसके लिये कुआँ लाँघनेमें क्या पुरुषार्थ है?*
ऐसा कहकर ब्राह्मणलोग उन श्रेष्ठ कामिनियोंको साथ ले हर्षपूर्वक अपने घरको लौटे और उनके साथ आनन्दपूर्वक रहने लगे। उन सबका क्रीड़ामें तथा अन्य सब कर्मोंमें पहलेवाली स्त्रियोंकी अपेक्षा अधिक प्रेम तथा उदारभाव प्रकट होता था; परंतु मायाशक्तिसे प्रभावित होनेके कारण ब्राह्मणलोग उसका अनुमान नहीं कर पाते थे। उधर सनातन पूर्णब्रह्म नारायणस्वरूप श्रीकृष्ण बलराम तथा ग्वालबालोंके साथ शीघ्र ही अपने घरको चले गये। इस प्रकार मैंने श्रीहरिका सम्पूर्ण उत्तम माहात्म्य कह सुनाया। इसे मैंने पूर्वकालमें अपने पिता धर्मके मुखसे सुना था। नारद! अब तुम और क्या सुनना चाहते हो?
**नारदजीने पूछा—**ऋषीन्द्र! किस पुण्यके प्रभावसे उन ब्राह्मणपत्नियोंको ऐसी गति प्राप्त हुई, जो बड़े-बड़े मुनीश्वरों तथा योगसिद्ध पुरुषोंके लिये भी दुर्लभ है। पूर्वकालमें ये पुण्यवती स्त्रियाँ कौन थीं और किस दोषसे इस भूतलपर आयी थीं। मेरे इस संदेहका निवारण करनेवाली बात कहिये।
**भगवान् श्रीनारायण बोले—**नारद! ये देवियाँ सप्तर्षियोंकी सुन्दर रूप-गुण-सम्पन्ना पतिव्रता पत्नियाँ थीं। एक बार अनलदेवने इनका अङ्ग
*अहोऽतिधन्या यूयं च दृष्टो युष्माभिरीश्वरः। अस्माकं जीवनं व्यर्थं वेदपाठोऽप्यनर्थकः॥
वेदे पुराणे सर्वत्र विद्वद्भिः परिकीर्तितम्। हरेर्विभूतयः सर्वाः सर्वेषां जनको हरिः॥
तपो जपो व्रतं ज्ञानं वेदाध्ययनमर्चनम्। तीर्थस्नानमनशनं सर्वेषां फलदो हरिः॥
श्रीकृष्णः सेवितो येन किं तस्य तपसां फलैः। प्राप्तः कल्पतरुर्येन किं तस्यान्येन शाखिना॥
श्रीकृष्णो हृदये यस्य किं तस्य कर्मभिः कृतैः। किं पीतसागरस्यैव पौरुषं कूपलङ्घने॥
(१८। ६६–७०)