ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 525, कुल 810 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ५१५
वह नाग उद्विग्न हो गया और 'हाय! हाय! मेरे प्राण निकले जा रहे हैं'—यों कहकर उसने पुनः उन्हें उगल दिया। श्रीकृष्णके वज्रोपम अङ्गोंको चबानेसे उसके सारे दाँत टूट गये और मुँह लहूलुहान हो गया। भगवान् उस समय रक्तरंजित मुखवाले कालिय नागके मस्तकपर चढ़ गये। विश्वम्भरके भारसे आक्रान्त हो कालिय नाग प्राण त्याग देनेको उद्यत हो गया। मुने! उसने रक्त वमन किया और मूर्च्छित होकर वह गिर पड़ा। उसे मूर्च्छित देख सब नाग प्रेमसे विह्वल हो रोने लगे। कोई भाग गये और कोई डरके मारे बिलमें घुस गये। अपने प्रियतमको मरणोन्मुख हुआ देख नागपत्नी सती सुरसा दूसरी नागिनियोंके साथ श्रीहरिके सामने आयी और पति-प्रेमसे रोने लगी। उसने दोनों हाथ जोड़कर शीघ्र ही भयसे श्रीहरिको प्रणाम किया और उनके दोनों चरणारविन्द पकड़कर व्याकुल हो उनसे कहा।
सुरसा बोली—हे जगदीश्वर! आप मुझे मेरे स्वामीको लौटा दीजिये। दूसरोंको मान देनेवाले प्रभो! मुझे भी मान दीजिये। स्त्रियोंको पति प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय होता है। उनके लिये पतिसे बढ़कर दूसरा कोई बन्धु नहीं है। नाथ! आप देवेश्वरोंके भी स्वामी, अनन्त प्रेमके सागर, उत्तम बन्धु, सम्पूर्ण भुवनोंके बान्धव तथा श्रीराधिकाजीके लिये प्रेमके समुद्र हैं। अतः मेरे प्राणनाथका वध न कीजिये। आप विधाताके भी विधाता हैं। इसलिये यहाँ मुझे पतिदान दीजिये। त्रिनेत्रधारी महादेवके पाँच मुख हैं; ब्रह्माजीके चार और शेषनागके सहस्र मुख हैं; कार्तिकेयके भी छः मुख हैं; परंतु ये लोग भी अपने मुख-समूहोंद्वारा आपकी स्तुति करनेमें जडवत् हो जाते हैं। साक्षात् सरस्वती भी आपका स्तवन करनेमें समर्थ नहीं हैं। सम्पूर्ण वेद, अन्यान्य देवता तथा संत-महात्मा भी आपकी स्तुतिके विषयमें शक्तिहीनताका ही परिचय देते हैं। कहाँ तो मैं कुबुद्धि, अज्ञ एवं नारियोंमें अधम सर्पिणी और कहाँ सम्पूर्ण भुवनोंके परम आश्रय तथा किसीके भी दृष्टिपथमें न आनेवाले आप परमेश्वर! जिनकी स्तुति ब्रह्मा, विष्णु और शेषनाग करते हैं, उन मानव-वेषधारी आप निराकार परमेश्वरकी स्तुति मैं करना चाहती हूँ, यह कैसी विडम्बना है? पार्वती, लक्ष्मी तथा वेदजननी सावित्री जिनके स्तवनसे डरती हैं और स्तुति करनेमें समर्थ नहीं हो पातीं; उन्हीं आप परमेश्वरका स्तवन कलिकलुषमें निमग्न तथा वेद-वेदाङ्ग एवं शास्त्रोंके श्रवणमें मूढ़ स्त्री मैं क्यों करना चाहती हूँ, यह समझमें नहीं आता। आप रत्नमय पर्यङ्कपर रत्ननिर्मित भूषणोंसे भूषित हो शयन करते हैं। रत्नालंकारोंसे अलंकृत अङ्गवाली राधिकाके वक्षःस्थलपर विराजमान होते हैं। आपके सम्पूर्ण अङ्ग चन्दनसे चर्चित रहते हैं, मुखारविन्दपर मन्द मुस्कानकी प्रभा फैली होती है। आप उमड़ते हुए प्रेमरसके महासागरमें सदा सुखसे निमग्न रहते हैं। आपका मस्तक मल्लिका और मालतीकी मालाओंसे सुशोभित होता है। आपका मानस नित्य निरन्तर पारिजात पुष्पोंकी सुगन्धसे आमोदित रहा करता है। कोकिलके कलरव तथा भ्रमरोंके गुञ्जारवसे उद्दीपित प्रेमके कारण आपके अङ्ग उठी हुई पुलकावलियोंसे अलंकृत रहते हैं। जो सदा प्रियतमाके दिये हुए ताम्बूलका सानन्द