भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 526
५१६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

चर्वण करते हैं; वेद भी जिनकी स्तुति करनेमें असमर्थ हैं तथा बड़े-बड़े विद्वान् भी जिनके स्तवनमें जडवत् हो जाते हैं; उन्हीं अनिर्वचनीय परमेश्वरका स्तवन मुझ-जैसी नागिन क्या कर सकती है? मैं तो आपके उन चरणकमलोंकी वन्दना करती हूँ, जिनका सेवन ब्रह्मा, शिव और शेष करते हैं तथा जिनकी सेवा सदा लक्ष्मी, सरस्वती, पार्वती, गङ्गा, वेदमाता सावित्री, सिद्धोंके समुदाय, मुनीन्द्र और मनु करते हैं। आप स्वयं कारणरहित हैं, किंतु सबके कारण आप ही हैं। सर्वेश्वर होते हुए भी परात्पर हैं स्वयंप्रकाश, कार्य-कारणस्वरूप तथा उन कार्य-कारणोंके भी अधिपति हैं। आपको मेरा नमस्कार है। हे श्रीकृष्ण ! हे सच्चिदानन्दघन ! हे सुरासुरेश्वर ! आप ब्रह्मा, शिव, शेषनाग, प्रजापति, मुनि, मनु, चराचर प्राणी, अणिमा आदि सिद्धि, सिद्ध तथा गुणोंके भी स्वामी हैं। मेरे पतिकी रक्षा कीजिये, आप धर्म और धर्मीके तथा शुभ और अशुभके भी स्वामी हैं। सम्पूर्ण वेदोंके स्वामी होते हुए भी उन वेदोंमें आपका अच्छी तरह निरूपण नहीं हो सका है। सर्वेश्वर ! आप सर्वस्वरूप तथा सबके बन्धु हैं। जीवधारियों तथा जीवोंके भी स्वामी हैं। अतः मेरे पतिकी रक्षा कीजिये।

इस प्रकार स्तुति करके नागराजवल्लभा सुरसा भक्तिभावसे मस्तक झुका श्रीकृष्णके चरणकमलोंको पकड़कर बैठ गयी। नागपत्नीद्वारा किये गये इस स्तोत्रका जो त्रिकाल संध्याके समय पाठ करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो अन्ततोगत्वा श्रीहरिके धाममें चला जाता है। उसे इहलोकमें श्रीहरिकी भक्ति प्राप्त होती है और अन्तमें वह निश्चय ही श्रीकृष्णका दास्य-सुख पा जाता है। वह श्रीहरिका पार्षद हो सालोक्य आदि चतुर्विध मुक्तियोंको करतलगत कर लेता है।

**नारदजीने पूछा—**नागपत्नीकी बात सुनकर हर्षसे उत्फुल्ल नेत्रोंवाले सर्वनन्दन भगवान् गोविन्दने स्वयं उससे क्या कहा? महाभाग ! यह अत्यन्त अद्भुत रहस्य मुझसे बताइये।

**भगवान् नारायणने कहा—**मुने! नागपत्नी भयसे व्याकुल हो हाथ जोड़कर भगवान्‌के चरणोंमें पड़ी थी। उसकी उपर्युक्त बातें सुनकर श्रीकृष्णने उससे इस प्रकार कहा—

**श्रीकृष्ण बोले—**नागेश्वरि ! उठो, उठो। भय छोड़ो और वर माँगो। मात:! मेरे वरके प्रभावसे अजर-अमर हुए अपने पतिको ग्रहण करो और यमुनाका हृद छोड़कर अपने घरको चली जाओ। वत्से ! अपने पति और परिवारके साथ अभीष्ट स्थानको पधारो। नागेशि ! आजसे तुम मेरी कन्या हुई और तुम्हारे प्राणोंसे भी अधिक प्रियतम यह नागराज मेरे जामाता हुए; इसमें संशय नहीं है। शुभे ! मेरे चरणकमलोंके चिह्नसे युक्त होनेके कारण तुम्हारे पतिको अब गरुड कष्ट नहीं देंगे, अपितु भक्तिभावसे स्तुति करके मेरे चरणचिह्नको प्रणाम करेंगे। अब तुम गरुडका भय छोड़ो और शीघ्र रमणक द्वीपको चली जाओ। बेटी ! इस हृदसे निकलो और इच्छानुसार वर माँगो।

श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर सुरसाके नेत्र और मुख हर्षसे खिल उठे। उसकी आँखोंमें आँसू भर आये तथा उसने भक्ति-भावसे मस्तक झुकाकर कहा।

**सुरसा बोली—**वरदाता परमेश्वर ! पिताजी ! यदि आप मुझे वर देना चाहते हैं तो अपने चरणकमलोंकी सुदृढ़ एवं अविचल भक्ति प्रदान कीजिये। मेरा मन भ्रमरकी भाँति सदा आपके चरणारविन्दपर ही मँडराता रहे। मुझे आपके स्मरणकी कभी विस्मृति न हो, मेरा कान्तविषयक सौभाग्य सदा बना रहे और ये मेरे प्राणवल्लभ ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ हो जायँ। प्रभो ! यही मेरी प्रार्थना है; इसे पूर्ण कीजिये।