ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ५३१
व्यवस्था होती है, उसके बाद जीव प्रकट होता है। बारंबार ऐसा होनेसे ही इस नियत व्यवस्थाको स्वभाव कहते हैं। स्वभावसे कर्म होता है और कर्मके अनुसार जीवधारियोंको सुख-दुःखका भोग प्राप्त होता है। यातना, जन्म-मरण, रोग-शोक, भय, उत्पत्ति, विपत्ति, विद्या, कविता, यश, अपयश, पुण्य, स्वर्गवास, पाप, नरकनिवास, भोग, मोक्ष और श्रीहरिका दास्य—ये सब मनुष्योंको कर्मके अनुसार उपलब्ध होते हैं। ईश्वर सबके जनक हैं। शील और कर्मोंका अभ्यास विधाताके लिये भी फलदाता होता है। सब कुछ ईश्वरकी इच्छासे ही सम्भव होता है। विराट् पुरुषसे प्रकृति, पञ्चतत्त्व, जगत्, कूर्म, शेष, धरणी तथा ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त सम्पूर्ण चराचर पदार्थोंका निर्माण हुआ है। जिनकी आज्ञासे वायु कूर्मको, कूर्म शेषको, शेष अपने मस्तकपर वसुधाको और वसुधा सम्पूर्ण चराचर जगत्को धारण करती है; जिनके आदेशसे जगत्के प्राणस्वरूप समीर सदा तीनों लोकोंमें बहते रहते हैं, उत्तम प्रभाके धाम सूर्य समस्त भूगोलका भ्रमण करते हुए तपा करते हैं, अग्नि जलाती है, मृत्यु समस्त जन्तुओंमें संचरित होती है और वृक्ष समयानुसार फूल एवं फल धारण करते हैं; जिनकी आज्ञासे समुद्र अपने स्थानपर विद्यमान रहते और तत्काल ही नीचे-नीचे निमग्न हो जाते हैं; उन परमेश्वरका ही आप भक्तिभावसे भजन कीजिये। इन्द्र क्या कर सकता है? जिनके भ्रूभङ्गकी लीलामात्रसे आजतक कितने ही ब्रह्माण्ड पैदा हुए और कालके गालमें चले गये तथा कितने ही विधाता उत्पन्न होकर नष्ट हो गये। वे परमेश्वर ही मृत्युकी भी मृत्यु, कालके भी काल तथा विधाताके भी विधाता हैं। तात! आप उन्हींकी शरण लीजिये। वे ही आपकी रक्षा करेंगे। अहो! जिनके एक दिन-रातमें अट्ठाईस इन्द्रोंका पतन होता है, ऐसे एक सौ आठ ब्रह्माओंका उन निर्गुण परमात्मा श्रीहरिके एक निमेषमें ही पतन हो जाता है; ऐसे परमात्माके रहते हुए इन्द्रकी पूजा विडम्बनामात्र है।
नारद! यों कहकर श्रीकृष्ण चुप हो गये। उस समय सभामें बैठे हुए महर्षियोंने भगवान्की भूरि-भूरि प्रशंसा की। नन्दके शरीरमें रोमाञ्च हो आया। वे हर्षसे उत्फुल्ल हो सभामें बैठे-बैठे नेत्रोंसे अश्रु बहाने लगे। मनुष्य यदि अपने पुत्रोंसे पराजित हों तो वे आनन्दित ही होते हैं। श्रीकृष्णकी आज्ञा मान नन्दजीने स्वस्तिवाचन किया और क्रमशः सब ब्राह्मणों एवं मुनियोंका वरण किया। उन्होंने आदरपूर्वक गिरिराज गोवर्धनकी, समागत मुनीश्वरोंकी, विद्वान् ब्राह्मणोंकी तथा गौओं और अग्निकी सानन्द पूजा की। पूजाकी समाप्ति होनेपर उस यज्ञ-महोत्सवमें नाना प्रकारके वाद्योंका तुमुल नाद होने लगा। जय-जयकारके शब्द, शङ्खध्वनि तथा हरिनामकीर्तन होने लगे। मुनिवर गर्गने वेदोंके मङ्गलकाण्डका पाठ किया। बन्दीजनोंमें श्रेष्ठ डिंडी जो कंसका प्रिय सचिव था, सामने खड़े हो उच्चस्वरसे मङ्गलाष्टकका पाठ करने लगा। श्रीकृष्ण गिरिराजके निकट जा दूसरी मूर्ति धारण करके बोले—‘मैं साक्षात् गोवर्धन