भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 542

५३२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण पर्वत हूँ और तुमलोगोंकी दी हुई भोज्य वस्तुएँ खा रहा हूँ। तुम मुझसे वर माँगो। ' उस समय श्रीकृष्णने नन्दसे कहा - 'पिताजी ! सामने देखिये, गिरिराज प्रकट हुए हैं। इनसे वर माँगिये। आपका कल्याण होगा।' तब गोपराजने हरिदास्य और हरिभक्तिका वर माँगा। परोसी हुई सामग्री खाकर और वर देकर गिरिराज अदृश्य हो गये। मुनीन्द्रों और ब्राह्मणोंको भोजन कराकर गोपराजने बन्दीजनों, ब्राह्मणों और मुनियोंको धन दिया। तत्पश्चात् आनन्दयुक्त नन्द बलराम और श्रीकृष्णको आगे करके सपरिवार अपने घरको गये। उन्होंने बन्दी डिंडीको वस्त्र, चाँदी, सोना, श्रेष्ठ घोड़ा, मणि तथा नाना प्रकारके भक्ष्य पदार्थ दिये। मुनि और ब्राह्मण बलराम तथा श्रीकृष्णकी स्तुति एवं नमस्कार करके चले गये। समस्त अप्सराएँ, गन्धर्व और किन्नर भी अपने-अपने स्थानको पधारे। उस महोत्सवमें आये हुए राजा और सम्पूर्ण गोप भी श्रीकृष्णको सादर नमस्कार करके वहाँसे बिदा हो गये। इसी समय यज्ञभङ्ग हो जानेसे अपनी अनेक प्रकारकी निन्दा सुनकर इन्द्र कुपित हो उठे। उनके ओठ फड़कने लगे। उन्होंने मरुद्गणों और मेघोंके साथ तत्काल रथपर आरूढ़ हो मनोहर नन्दनगर वृन्दावनपर आक्रमण किया। फिर युद्ध-शास्त्रमें निपुण समस्त देवता भी हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र लिये रोषपूर्वक रथपर आरूढ़ हो उनके पीछे-पीछे गये। वायुकी सनसनाहट, मेघोंकी गड़गड़ाहट और सेनाकी भयानक गर्जनासे सारा नगर काँप उठा। नन्दको भी बड़ा भय हुआ; परंतु वे नीतिमें निपुण थे। अतः अपनी पत्नी तथा सेवकगणोंको पुकारकर निर्जन स्थानमें ले जाकर शोकसे कातर हो बोले । नन्दजीने कहा- हे यशोदे ! हे रोहिणि ! इधर आओ और मेरी बात सुनो। तुमलोग राम और कृष्णको व्रजसे दूर ले जाओ। भयसे व्याकुल बालक-बालिकाएँ और स्त्रियाँ भी दूर चली जायँ । केवल बलवान् गोप मेरे पास ठहरें। फिर हमलोग इस प्राण-संकटसे निकलनेका प्रयास करेंगे। यों कहकर गोपप्रवर नन्दने भयभीत हुए श्रीहरिका स्मरण किया। उनके दोनों हाथ जुड़ गये। भक्तिसे मस्तक झुक गया और वे काण्वशाखामें कहे गये स्तोत्रद्वारा श्रीशचीपतिकी स्तुति करने लगे। नन्द बोले - इन्द्र, सुरपति, शक्र, अदितिज, पवनाग्रज, सहस्राक्ष, भगाङ्ग, कश्यपात्मज, विडौजा, शुनासीर, मरुत्वान्, पाकशासन, जयन्तजनक, श्रीमान्, शचीश, दैत्यसूदन, वज्रहस्त, कामसखा, गौतमीव्रतनाशन, वृत्रहा, वासव, दधीचि-देह- भिक्षुक, जिष्णु, वामनभ्राता, पुरुहूत, पुरन्दर, दिवस्पति, शतमख, सुत्रामा, गोत्रभिद्, विभु, लेखर्षभ, बलाराति, जम्भभेदी, सुराश्रय, संक्रन्दन, दुश्च्यवन, तुराषाट्, मेघवाहन, आखण्डल, हरि, हय, नमुचिप्राणनाशन, वृद्धश्रवा, वृष तथा दैत्यदर्पनिषूदन - ये छियालीस नाम निश्चय ही समस्त पापोंका नाश करनेवाले हैं। जो मनुष्य कौथुमीशाखामें कहे गये इस स्तोत्रका प्रतिदिन पाठ करता है, उसकी बड़ी-से-बड़ी विपत्तिमें इन्द्र वज्र हाथमें लिये रक्षा करते हैं। उसे अतिवृष्टि, शिलावृष्टि तथा भयंकर वज्रपातसे भी कभी भय नहीं होता; क्योंकि स्वयं इन्द्र उसकी रक्षा करते हैं। नारद ! जिस घरमें यह स्तोत्र पढ़ा जाता है और जो पुण्यवान् पुरुष इसे जानता है; उसके उस घरपर न कभी वज्रपात होता है और न ओले या पत्थर ही बरसते हैं। भगवान् श्रीनारायण कहते हैं- नन्दके मुखसे इस स्तोत्रको सुनकर मधुसूदन श्रीकृष्ण कुपित हो गये। वे ब्रह्मतेजसे प्रज्वलित हो रहे थे। उन्होंने पितासे यह नीतिकी बात कही। तात ! आप बड़े डरपोक हैं। किसकी स्तुति करते हैं? कौन हैं इन्द्र ? मेरे निकट रहकर आप इन्द्रका भय छोड़