ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संहार मैं कैसे करूँ?' ऐसा सोचकर भगवान्ने स्वयं ही उसकी पूर्वजन्मकी स्मृति हर ली; क्योंकि स्तुति करनेवालेका वध उचित नहीं है। दुर्वचन बोलनेवालेके ही वधका विधान है। तब दानव वैष्णवी मायाके प्रभावसे पुनः अपने-आपको भूल गया। उसके कण्ठदेशमें दुर्वचनने स्थान जमा लिया। मुने! वह शीघ्र ही मरना चाहता था, इसलिये दुर्दैवसे ग्रस्त हो विवेक खो बैठा। क्रोधसे उसके ओठ फड़कने लगे और वह दैत्य श्रीहरिसे इस प्रकार बोला।
दैत्यने कहा— दुर्मते! तू निश्चय ही मरना चाहता है। मनुष्यके बच्चे! मैं आज तुम्हें यमलोक भेज दूँगा।
इस प्रकार बहुत-से दुर्वचन कहकर उस गदहेने श्रीकृष्णपर आक्रमण कर दिया। भयानक युद्ध हुआ। अन्तमें श्रीहरिने प्रसन्नतापूर्वक हँसकर उस दानवराजकी प्रशंसा करते हुए कहा—'मेरे भक्त बलिके पुत्र! दानवेन्द्र! तुम्हारा उत्तम जीवन धन्य है। वत्स! तुम्हारा कल्याण हो। अब तुम मोक्ष प्राप्त करो। मेरा दर्शन कल्याणका बीज तथा मोक्षका परम कारण है। तुम सबसे अधिक और सबसे उत्कृष्ट मनोहर स्थान प्राप्त करो।'
यों कहकर श्रीकृष्णने अपने उत्तम चक्रका स्मरण किया, जो अपनी दीप्तिसे करोड़ों सूर्योंके समान उद्दीप्त होता है। स्मरण करते ही वह आ गया और श्रीकृष्णने उस सुदर्शनचक्रको अपने हाथमें ले लिया। उसमें सोलह अरे थे। उस उत्तम अस्त्रको घुमाकर श्रीकृष्णने उसकी ओर फेंका तथा जिसे ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी नहीं मार सकते थे, उसे लीलासे ही काट डाला।
उस महात्मा दानवका मस्तक पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसके शरीरसे सैकड़ों सूर्योंके समान कान्तिमान् तेजःपुञ्ज उठा, जो श्रीहरिकी ओर देखकर उन्हींके चरणकमलोंमें लीन हो गया। अहो! उस दानवराजने परम मोक्ष प्राप्त कर लिया। उस समय आकाशमें खड़े हुए समस्त देवता और मुनि अत्यन्त हर्षसे उत्फुल्ल हो वहाँ पारिजातके फूलोंकी वर्षा करने लगे। स्वर्गमें दुन्दुभियाँ बज उठीं। अप्सराएँ नाचने लगीं। गन्धर्व-समूह गीत गाने लगे और मुनिलोग सानन्द स्तुति करने लगे। स्तुति करके हर्षसे विह्वल हुए समस्त देवता और मुनि चले गये। 'धेनुकासुर मारा गया'—यह देख ग्वाल-बाल वहाँ आ गये। बलवानोंमें श्रेष्ठ बलरामने पुरुषोत्तमका स्तवन किया। समस्त ग्वाल-बालोंने भी उनके गुण गाये। वे खुशीके मारे नाचने लगे। श्रीकृष्ण और बलरामको कुछ पके हुए फल देकर शेष सभी फलोंको उन बालकोंने प्रसन्न-चित्त होकर खाया। खा-पीकर बलराम और बालकोंके साथ श्रीहरि शीघ्र अपने घरको गये। (अध्याय २२)