ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ५४१
धेनुकके पूर्वजन्मका परिचय, बलि-पुत्र साहसिक तथा तिलोत्तमाका स्वच्छन्द विहार, दुर्वासाका शाप और वर, साहसिकका गदहेकी योनिमें जन्म लेना तथा तिलोत्तमाका बाणपुत्री 'उषा' होना
नारदजीने पूछा— भगवन्! किस पापसे बलि-पुत्र साहसिकको गदहेकी योनि प्राप्त हुई? दुर्वासाजीने किस अपराधसे दानवराजको शाप दिया? नाथ! फिर किस पुण्यसे दानवेश्वरने सहसा महाबली श्रीहरिका धाम एवं उनके साथ एकत्व (सायुज्य) मोक्ष प्राप्त कर लिया? संदेह-भंजन करनेवाले महर्षे! इन सब बातोंको आप विस्तारपूर्वक बताइये। अहो! कविके मुखमें काव्य पद-पदपर नया-नया प्रतीत होता है।
भगवान् श्रीनारायणने कहा— वत्स! नारद! सुनो। मैं इस विषयमें प्राचीन इतिहास कहूँगा। मैंने इसे पिता धर्मके मुखसे गन्धमादन पर्वतपर सुना था। यह विचित्र एवं अत्यन्त मनोहर वृत्तान्त पाद्म-कल्पका है और श्रीनारायणदेवकी कथासे युक्त होनेके कारण कानोंके लिये उत्तम अमृत है। जिस कल्पकी यह कथा है, उसमें तुम उपबर्हण नामक गन्धर्वके रूपमें थे। तुम्हारी आयु एक कल्पकी थी। तुम शोभायमान, सुन्दर और सुस्थिर यौवनसे सम्पन्न थे। पचास कामिनियोंके पति होकर सदा शृङ्गारमें ही तत्पर रहते थे। ब्रह्माजीके वरदानसे तुम्हें सुमधुर कण्ठ प्राप्त हुआ था और तुम सम्पूर्ण गायकोंके राजा समझे जाते थे। उन्हीं दिनों दैववश ब्रह्माका शाप प्राप्त होनेसे तुम दासीपुत्र हुए और वैष्णवोंके अवशिष्ट भोजनजनित पुण्यसे इस समय साक्षात् ब्रह्माजीके पुत्र हो। अब तो तुम असंख्य कल्पोंतक जीवित रहनेवाले महान् वैष्णवशिरोमणि हो। ज्ञानमयी दृष्टिसे सब कुछ देखते और जानते हो तथा महादेवजीके प्रिय शिष्य हो। मुने! उस पाद्म-कल्पका वृत्तान्त मुझसे सुनो। दैत्यके इस सुधा-तुल्य मधुर वृत्तान्तको मैं तुम्हें सुना रहा हूँ।
एक दिनकी बात है। बलिका बलवान् पुत्र साहसिक अपने तेजसे देवताओंको परास्त करके गन्धमादनकी ओर प्रस्थित हुआ। उसके सम्पूर्ण अङ्ग चन्दनसे चर्चित थे। वह रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित हो रत्नके ही सिंहासनपर विराजमान था। उसके साथ बहुत बड़ी सेना थी। इसी समय स्वर्गकी परम सुन्दरी अप्सरा तिलोत्तमा उस मार्गसे आ निकली। उसने साहसिकको देखा और साहसिकने उसको। पुंश्चली स्त्रियोंका आचरण दोषपूर्ण होता ही है। वहीं दोनों एक-दूसरेके प्रति आकर्षित हो गये। चन्द्रमाके समीप जाती हुई तिलोत्तमा वहाँ बीचमें ही ठहर गयी। कुलटा स्त्रियाँ कैसी दुष्टहृदया होती हैं और वे किसी भी पापका विचार न करके सदा पापरत ही रहा करती हैं—यह सब बतलाकर भी तिलोत्तमाने अपने बाह्य रूप-सौन्दर्यसे साहसिकको मोहित कर लिया। तदनन्तर वे दोनों गन्धमादनके एकान्त रमणीय स्थानमें जाकर यथेच्छ विहार करने लगे। वहीं मुनिवर दुर्वासा योगासनसे विराजमान होकर श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंका चिन्तन कर रहे थे। तिलोत्तमा और साहसिक उस समय कामवश चेतनाशून्य थे। उन्होंने अत्यन्त निकट ध्यान लगाये बैठे हुए मुनिको नहीं देखा। उनके उच्छृङ्खल अभिसारसे मुनिका ध्यान सहसा भङ्ग हो गया। उन्होंने उन दोनोंकी कुत्सित चेष्टाएँ देख क्रोधमें भरकर कहा।
दुर्वासा बोले— ओ गदहेके समान आकार-