ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 553, कुल 810 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ५४३ दुर्वासाका और्वकन्या कन्दलीसे विवाह, उसकी कटूक्तियोंसे कुपित हो मुनिका उसे भस्म कर देना, फिर शोकसे देह-त्यागके लिये उद्यत मुनिको विप्ररूपधारी श्रीहरिका समझाना, उन्हें एकानंशाको पत्नी बनानेके लिये कहना, कन्दलीका भविष्य बताना और मुनिको ज्ञान देकर अन्तर्धान होना तथा मुनिकी तपस्यामें प्रवृत्ति भगवान् श्रीनारायण कहते हैं- मुने! दुर्वासामु्निका गूढ़ वृत्तान्त सुनो। सबसे अद्भुत बात यह है कि उन ऊर्ध्वरेता मुनीश्वरको भी स्त्रीका संयोग प्राप्त हुआ। यह कैसे ? सो बता रहा हूँ। साहसिक तथा तिलोत्तमाका शृङ्गार (मिलन-प्रसंग) देखकर उन जितेन्द्रिय मुनिके मनमें भी कामभावका संचार हो गया। असत्- पुरुषोंका सङ्ग प्राप्त होनेसे उनका सांसर्गिक दोष अपनेमें आ जाता है। इसी समय उस मार्गसे मुनिवर और्व अपनी पुत्रीके साथ आ पहुँचे। उनकी पुत्री पतिका वरण करना चाहती थी। पूर्वकालमें तपःपरायण ब्रह्माजीके ऊरुसे उन ऊर्ध्वरेता योगीन्द्रका जन्म हुआ था, इसलिये वे 'और्व' कहलाये। उनके जानुसे एक कन्या उत्पन्न हुई, जिसका नाम 'कन्दली' था। वह दुर्वासाको ही अपना पति बनाना चाहती थी, दूसरा कोई पुरुष उसके मनको नहीं भाता था। पुत्रीसहित मुनिवर और्व दुर्वासामु्निके आगे आकर खड़े हो गये। वे बड़े प्रसन्न थे और अपने तेजसे प्रज्वलित अग्निशिखाके समान उद्भासित होते थे। मुनिवर और्वको सामने आया देख मुनीश्वर दुर्वासा भी बड़े वेगसे उठे और सानन्द उनके प्रति नत-मस्तक हो गये। प्रसन्नतासे भरे हुए और्वने दुर्वासाको हृदयसे लगा लिया और उनसे अपनी कन्याका मनोरथ प्रकट किया। और्व बोले- मुने ! यह मेरी मनोहरा कन्या 'कन्दली' नामसे विख्यात है। अब यह सयानी हो गयी है और संदेशवाहकोंके मुखसे आपकी प्रशंसा सुनकर केवल आपका ही 'पति'-रूपसे चिन्तन करने लगी है। यह कन्या अयोनिजा है और अपने सौन्दर्यसे तीनों लोकोंका मन मोह लेनेमें समर्थ है। वैसे तो यह समस्त गुणोंकी खान है; किंतु इसमें एक दोष भी है। दोष यह है कि कन्दली अत्यन्त कलहकारिणी है। यह क्रोधपूर्वक कटु भाषण करती है; परंतु अनेक गुणोंसे युक्त वस्तुको केवल एक ही दोषके कारण त्यागना नहीं चाहिये। और्वका वचन सुनकर दुर्वासाको हर्ष और शोक दोनों प्राप्त हुए। उसके गुणोंसे हर्ष हुआ और दोषसे दुःख। उन्होंने गुण तथा रूपसे सम्पन्न मुनि-कन्याको सामने देखा और व्यथित-हृदयसे मुनिवर और्वको इस प्रकार उत्तर दिया। दुर्वासाने कहा- नारीका रूप त्रिभुवनमें मुक्तिमार्गका निरोधक, तपस्यामें व्यवधान डालनेवाला तथा सदा ही मोहका कारण होता है। वह संसाररूपी कारागारमें बड़ी भारी बेड़ी है, जिसका भार वहन करना अत्यन्त दुष्कर है। शंकर आदि महापुरुष भी ज्ञानमय खड्गसे उस बेड़ीको काट नहीं सकते। नारी सदा साथ देनेवाली छायासे भी अधिक सहगामिनी है। वह कर्मभोग, इन्द्रिय, इन्द्रियाधार, विद्या और बुद्धिसे भी अधिक बाँधनेवाली है। छाया शरीरके रहनेतक ही साथ देती है; भोग तभीतक साथ रहते हैं जबतक उनकी समाप्ति न हो जाय; देह और इन्द्रियाँ जीवनपर्यन्त ही साथ रहती हैं; विद्या जबतक उसका अनुशीलन होता है तभीतक साथ देती है; यही दशा बुद्धिकी भी है; परंतु सुन्दरी स्त्री जन्म-जन्ममें मनुष्यको बन्धनमें डाले रहती है। सुन्दरी स्त्रीवाला पुरुष जबतक जीता है, तबतक अपने जन्म-मरणरूपी बन्धनका निवारण नहीं