भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 554

५४४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण कर सकता। जबतक जीवधारीका जन्म होता है, तबतक उसे भोग सुखदायक जान पड़ते हैं। परंतु मुनीन्द्र ! सबसे अधिक सुखदायिनी है श्रीहरिके चरणकमलोंकी सेवा। मैं यहाँ श्रीकृष्ण-चरणारविन्दोंके चिन्तनमें लगा था, परंतु मेरे इस शुभ अनुष्ठानमें भारी विघ्न उपस्थित हो गया। न जाने पूर्वजन्मके किस कर्म-दोषसे यह विघ्न आया है। किंतु मुने ! मैं आपकी कन्याके सौ कटु वचनोंको अवश्य क्षमा करूँगा। इससे अधिक होनेपर उसका फल उसे दूँगा। स्त्रीके कटु वचनोंको सुनते रहना- यह पुरुषके लिये सबसे बड़ी निन्दाकी बात है। जिसे स्त्रीने जीत लिया हो, वह तीनों लोकोंके सत्पुरुषोंमें अत्यन्त निन्दित है। मैं आपकी आज्ञा शिरोधार्य करके इस समय आपकी पुत्रीको ग्रहण करूँगा। ऐसा कहकर दुर्वासा चुप हो गये। और्वमुनिने वेदोक्त-विधिसे अपनी पुत्री उनको ब्याह दी। दुर्वासाने 'स्वस्ति' कहकर कन्याका पाणिग्रहण किया। और्वमुनिने उन्हें दहेज दिया और अपनी कन्या उन्हें सौंपकर वे मोहवश रोने लगे। संतानके वियोगसे होनेवाला शोक आत्माराम मुनिको भी नहीं छोड़ता। और्व बोले-बेटी ! सुनो। मैं तुम्हें नीतिका परम दुर्लभ सार-तत्त्व बता रहा हूँ। वह हितकारक, सत्य, वेदप्रतिपादित तथा परिणाममें सुखद है। नारीके लिये अपना पति ही इहलोक और परलोकमें सबसे बड़ा बन्धु है। कुलवधुओंके लिये पतिसे बढ़कर दूसरा कोई प्रियतम नहीं है। पति ही उनका महान् गुरु है। देवपूजा, व्रत, दान, तप, उपवास, जप, सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान, समस्त यज्ञोंकी दीक्षा, पृथ्वीकी परिक्रमा तथा ब्राह्मणों और अतिथियोंका सेवन-ये सब पतिसेवाकी सोलहवीं कलाके समान भी नहीं हैं। पतिव्रताको इन सबसे क्या प्रयोजन है? समस्त शास्त्रोंमें पतिसेवाको परम धर्म कहा गया है। अपनी बुद्धिसे पतिको सदा नारायणसे भी अधिक समझकर तुम उनके चरणकमलोंकी प्रतिदिन सेवा करना। परिहास, क्रोध, भ्रम अथवा अवहेलनासे भी अपने स्वामी मुनिके लिये उनके सामने या परोक्षमें भी कभी कटु वचन न बोलना। भारतवर्षकी भूमिपर जो स्त्रियाँ स्वेच्छानुसार कटु वचन बोलती अथवा दुराचारमें प्रवृत्त होती हैं, उनकी शुद्धिके लिये श्रुतिमें कोई प्रायश्चित्त नहीं है। उन्हें सौ कल्पोंतक नरकमें रहना पड़ता है। जो स्त्री समस्त धर्मोंसे सम्पन्न होनेपर भी पतिके प्रति कटु वचन बोलती है, उसका सौ जन्मोंका किया हुआ पुण्य निश्चय ही नष्ट हो जाता है। इस प्रकार अपनी कन्याको देकर और उसे समझा-बुझाकर मुनिवर और्व चले गये तथा स्वात्माराम मुनि दुर्वासा स्त्रीके साथ प्रसन्नतापूर्वक अपने आश्रममें रहने लगे। चतुर पुरुषका चतुरा स्त्रीके साथ योग्य समागम हुआ। मुनीश्वर दुर्वासा तपस्या छोड़कर घर-गृहस्थीमें आसक्त हो गये। कन्दली स्वामीके साथ प्रतिदिन कलह करती थी और मुनीन्द्र दुर्वासा नीतियुक्त वचन कहकर अपनी पत्नीको समझाते थे; परंतु उनकी बातको वह कुछ नहीं समझती थी। वह सदा कलहमें ही रुचि रखती थी। पिताके दिये हुए ज्ञानसे भी वह शान्त नहीं हुई। समझानेसे भी उसने अपनी आदत नहीं छोड़ी। स्वभावको लाँघना बहुत कठिन होता है। वह बिना कारण ही पतिको प्रतिदिन जली-कटी सुनाती थी। जिनके डरसे सारा जगत् काँपता था, वे ही मुनि उस कन्दलीके कोपसे थर-थर काँपते थे और उसकी की हुई कटूक्तिको चुपचाप सह लेते थे। दयानिधान मुनि मोहवश उसे तत्काल समझाने लगते थे। कुछ ही कालमें उसकी सौ कटूक्तियाँ पूरी हो गयीं तो भी मुनिने कृपापूर्वक उसकी सौसे भी अधिक कटूक्तियोंको क्षमा किया। पत्नीकी जली-कटी बातोंसे मुनिका हृदय दग्ध