भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५८७

हैं। आप ही विद्वानोंके जनक, विद्वान् तथा विद्वानोंके गुरु हैं। आप ही मन्त्र, जप, तप और उनके फलदाता हैं। आप ही वाक् और आप ही वाणीकी अधिष्ठात्री देवी हैं। आप ही उसके स्रष्टा और गुरु हैं। अहो! सरस्वतीका बीज अद्भुत है। यहाँ कौन आपकी स्तुति कर सकता है?

ऐसा कहकर गिरिराज हिमालय उनके चरणकमलोंको धारण करके खड़े रहे। भगवान् शिव वृषभपर बैठे हुए शैलराजको प्रबोध देते रहे। जो मनुष्य तीनों संध्याओंके समय इस परम पुण्यमय स्तोत्रका पाठ करता है, वह भवसागरमें रहकर भी समस्त पापों तथा भयोंसे मुक्त हो जाता है। पुत्रहीन मनुष्य यदि एक मासतक इसका पाठ करे तो पुत्र पाता है। भार्याहीनको सुशीला तथा परम मनोहारिणी भार्या प्राप्त होती है। वह चिरकालसे खोयी हुई वस्तुको सहसा तथा अवश्य पा लेता है। राज्यभ्रष्ट पुरुष भगवान् शंकरके प्रसादसे पुनः राज्यको प्राप्त कर लेता है। कारागार, श्मशान और शत्रु-संकटमें पड़नेपर तथा अत्यन्त जलसे भरे गम्भीर जलाशयमें नाव टूट जानेपर, विष खा लेनेपर, महाभयंकर संग्रामके बीच फँस जानेपर तथा हिंसक जन्तुओंसे घिर जानेपर इस स्तुतिका पाठ करके मनुष्य भगवान् शंकरकी कृपासे समस्त भयोंसे मुक्त हो जाता है।

(अध्याय ३७-३८)


गिरिराज हिमवान्‌द्वारा गणोंसहित शिवका सत्कार, मेनाको शिवके अलौकिक सौन्दर्यके दर्शन, पार्वतीद्वारा शिवकी परिक्रमा, शिवका उन्हें आशीर्वाद, शिवाद्बारा शिवका षोडशोपचार-पूजन, शंकरद्वारा कामदेवका दहन तथा पार्वतीको तपस्याद्वारा शिवकी प्राप्ति

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—प्रिये! इस प्रकार स्तुति करके गिरिराज हिमवान् नगरसे दूर निवास करनेवाले भगवान् शंकरसे कुछ ही दूरीपर उनकी आज्ञा ले स्वयं भी ठहर गये। उन्होंने भक्तिपूर्वक भगवान्‌को मधुपर्क आदि दिया और मुनियों तथा शिवके पार्षदोंका पूजन किया। उस समय मेना स्त्रियोंके साथ वहाँ आयी। उसने वटके नीचे आसन लगाये चन्द्रशेखर शिवको देखा। उनके प्रसन्न मुखपर मन्द हास्यकी छटा छा रही थी। वे व्याघ्रचर्म धारण किये मुनि-मण्डलीके मध्य भागमें ब्रह्मतेजसे प्रकाशित हो रहे थे, मानो आकाशमें तारिकाओंके बीच द्विजराज चन्द्रमा शोभा पा रहे हों। करोड़ों कन्दर्पोंके समान उनका मनोहर रूप अत्यन्त आह्लाद प्रदान करनेवाला था। वे वृद्धावस्था छोड़कर नूतन यौवन धारण करते थे और अत्यन्त सुन्दर रमणीय रूप हो युवतियोंके चित्त चुरा रहे थे। वे कामातुरा कामिनियोंको कामदेवके समान जान पड़ते थे। सतियोंको औरस पुत्रके समान प्रतीत होते थे। वैष्णवोंको महाविष्णु तथा शैवोंको सदाशिवके रूपमें दृष्टिगोचर होते थे। शक्तिके उपासकोंको शक्तिस्वरूप, सूर्यभक्तोंको सूर्यरूप, दुष्टोंको कालरूप तथा श्रेष्ठ पुरुषोंको परिपालकके रूपमें दिखायी देते थे। कालको कालके समान, मृत्युको मृत्यु एवं अत्यन्त भयानक जान पड़ते थे। स्त्रियोंके लिये उनका व्याघ्रचर्म मनोहर वस्त्र बन गया। भस्म चन्दन हो गया। सर्प सुन्दर मालाओंके रूपमें परिणत हो गये। कण्ठमें कालकूटकी प्रभा कस्तूरीके समान प्रतीत हुई। जटा सुन्दर सँवारी हुई चूड़ा