भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 598, कुल 810 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 598

५८८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

जान पड़ी। चन्द्रमा भाल-देशमें चन्दन जान पड़े। मस्तकपर गङ्गाकी मनोहारिणी धारा परम सुन्दर मालती मालाके रूपमें परिणत हो गयी। अस्थियोंकी माला रत्नमाला बन गयी। धतूर मनोहर चम्पाके रूपमें बदल गया। पाँच मुखके स्थानमें उन्हें एक ही मुख दिखायी देने लगा, जो दो नेत्र-कमलोंसे सुशोभित था। मुख शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाकी आभाको प्रतिहत करके अत्यन्त देदीप्यमान हो रहा था। बन्धुजीव (दुपहरिया)-की लालीको तिरस्कृत करनेवाले उनके ओष्ठ और अधरसे मुखकी मनोहरता बढ़ गयी थी। श्वेत चन्द्रमा ही मानो वृषभराज नन्दी बन गये थे और भूत आदि नर्तकोंका काम करते थे। महेश्वरके स्वरूपमें तत्काल सब कुछ बदल गया। शिवका ऐसा रूप देख मेना बहुत संतुष्ट हुई। कितनी रमणियाँ भगवान् शंकरके रूप-सौन्दर्यको देखकर अत्यन्त मुग्ध हो गयीं और नाना प्रकारकी अभिलाषाएँ करने लगीं। अहो! पार्वती बड़ी पुण्यवती है। भारतवर्षमें इसीका जन्म स्पृहणीय है; क्योंकि ये शिव इसके स्वामी होनेवाले हैं।

इस प्रकारकी बातें कितनी ही स्त्रियाँ कर रही थीं। शिवका दर्शन करके मेना सानन्द अपने घरको लौट गयीं। शिवका पूजन करके उनके चरणोंमें मस्तक नवाकर शैलराज भी अपने घरको गये। गिरिराजने मेनाके साथ एकान्तमें सलाह करके पार्वतीको उसकी मङ्गल-कामनासे शिवके समीप भेजा। पार्वतीका हृदय भगवान् शंकरमें अनुरक्त था। सखियोंके साथ मनोहर वेष धारण करके हर्षपूर्वक वे शिवके निकट गयीं। वहाँ प्रसन्नमुख और नेत्रवाले शान्तस्वरूप शिवका दर्शन करके शिवाने सात बार परिक्रमा की और मुस्कराकर उन्हें प्रणाम किया। उस समय भगवान् शिवने आशीर्वाद देते हुए कहा—'सुन्दरि! तुम्हें अनन्य प्रेमी, गुणवान्, अमर, ज्ञानिशिरोमणि और सुन्दर पति प्राप्त हो। शुभे! तुम्हारा पतिविषयक सौभाग्य सतत बना रहे। साध्वि! तुम्हारा पुत्र नारायणके समान गुणवान् होगा। जगदम्बिके! तीनों लोकोंमें तुम्हारी उत्कृष्ट पूजा होगी। तुम समस्त ब्रह्माण्डोंमें सबसे श्रेष्ठ होओ। सुन्दरि! तुमने सात बार परिक्रमा करके भक्तिभावसे मुझे नमस्कार किया है। अतः मैं सात जन्मोंके लिये संतुष्ट हो गया। तुम उसका फल पाओ। तीर्थ, प्रियतम पति, इष्टदेवता, गुरुमन्त्र तथा औषधमें जिनकी जैसी आस्था होती है, उन्हें वैसी ही सिद्धि प्राप्त होती है।'

ऐसा कहकर योगीश्वर शंकरने व्याघ्रचर्मपर योगासन लगाया और मुझ परब्रह्मरूप ज्योतिका तत्काल ध्यान आरम्भ कर दिया। तब देवी पार्वतीने उनके दोनों चरण पखारकर चरणामृत-पान किया और अग्निशुद्ध वस्त्रसे भक्तिपूर्वक उन चरणोंका मार्जन किया। विश्वकर्माद्वारा निर्मित रमणीय रत्नसिंहासन उनकी सेवामें अर्पित किया। फिर कांस्यपात्रमें रखे हुए अपूर्व नैवेद्यका भोग लगाया। तत्पश्चात् उनके चरणोंमें गङ्गाजलसे युक्त अर्घ्य दिया। इसके बाद मनोहर सुगन्धयुक्त चन्दन तथा कस्तूरी और कुंकुम भी सेवामें प्रस्तुत किये। तदनन्तर हालाहल विषके चिह्नसे सुन्दर प्रतीत होनेवाले कण्ठमें मालतीकी माला पहनायी। भक्ति-भावसे पूजा की। शिवकी प्रसन्नताके लिये उनपर पुष्पोंकी वृष्टि की। सुवर्णपात्रमें अमृत और मधुर मधु दिया। सैकड़ों रत्नमय दीप जलाये। सब ओर उत्तम धूपकी सुगन्ध फैलायी। त्रिभुवन-दुर्लभ वस्त्र, सोनेके तारोंका यज्ञोपवीत तथा पीनेके लिये सुगन्धित एवं शीतल जल पार्वतीने अपने प्रियतमकी सेवामें प्रस्तुत किये। फिर रत्नसारेन्द्रनिर्मित अतिशय सुन्दर रमणीय भूषण, सुवर्णमढ़ी सींगवाली दुर्लभ कामधेनु, स्नानोपयोगी द्रव्य, तीर्थजल तथा मनोहर ताम्बूल भी