भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 599

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५८९ क्रमशः अर्पित किये। इस प्रकार षोडशोपचार चढ़ाकर पार्वतीने बारंबार प्रणाम किया। यह उनका नित्यका नियम बन गया। वे प्रतिदिन भक्तिभावसे शिवकी पूजा करके पिताके घर लौट जाया करती थीं। अप्सराओंके मुखसे इन्द्रने यह सुना कि भगवान् महेश्वर पार्वतीदेवीके प्रति अनुरक्त हैं। यह समाचार सुनकर इन्द्र हर्षसे नाचने लगे। उन्होंने बड़ी उतावलीके साथ दूत भेजकर कामदेवको बुलवाया। इन्द्रकी आज्ञासे कामदेव अमरावतीपुरीमें गये। तब इन्द्रने उन्हें शीघ्र ही उस स्थानपर भेजा, जहाँ शिवा और शिव विद्यमान थे। पञ्चबाण कामने अपने पाँचों बाणोंको साथ ले उस स्थानको प्रस्थान किया, जहाँ शक्तिसहित शिव विराजमान थे। वहाँ पहुँचकर मदनने देखा, भगवान् शिव शिवाके साथ विद्यमान हैं। उनके मुख और नेत्र प्रसन्न दिखायी देते हैं। वे त्रिभुवनकान्त एवं शान्त हैं। उन्हें देखकर कामदेव बाणसहित धनुष हाथमें लिये आकाशमें खड़ा हो गया। उसने बड़े हर्षके साथ अपने अमोघ एवं अनिवार्य अस्त्रका शंकरपर प्रयोग किया; परंतु वह अमोघ अस्त्र भी परमात्मा शंकरपर व्यर्थ हो गया। जैसे आकाश निर्लेप होता है, उसी तरह निर्लिप्त परमात्मा शिवपर जब वह शस्त्र विफल हो गया, तब कामदेवको बड़ा भय हुआ। वह सामने खड़ा हो भगवान् मृत्युञ्जयकी ओर देखता हुआ काँपने लगा। भयसे विह्वल हुए कामने इन्द्र आदि देवताओंका स्मरण किया। तब सब देवता वहाँ आये और शंकरके कोपसे डरकर काँपने लगे। उन्होंने स्तोत्र पढ़कर देवाधिदेव शंकरका स्तवन किया। इतनेमें ही शिवके ललाटवर्ती नेत्रसे कोपाग्नि प्रकट हुई। देवतालोग स्तुति कर ही रहे थे कि शम्भुसे उत्पन्न हुई वह आग ऊँची-ऊँची लपटें उठाती हुई प्रज्वलित हो उठी। वह प्रलयकालिक अग्निकी ज्वालाके समान जान पड़ती थी। आकाशमें ऊपर उठकर चक्कर काटती हुई वह आग पृथ्वीपर उतर आयी और चारों ओर चक्कर देकर कामदेवपर टूट पड़ी। भगवान् शंकरके कोपसे कामदेव एक ही क्षणमें भस्म हो गये। यह देख सब देवता विषादमें डूब गये और पार्वतीने भी सिर नीचा कर लिया। तदनन्तर रति भगवान् शिवके सामने बहुत विलाप करने लगी। भयसे काँपते हुए समस्त देवताओंने शिवका स्तवन किया। इसके बाद वे बार-बार रोते हुए रतिसे बोले—'माँ ! पतिके शरीरका थोड़ा-सा भस्म लेकर उसकी रक्षा करो और भय छोड़ो। हमलोग उन्हें जीवित करायेंगे। तुम पुनः अपने प्रियतमको प्राप्त करोगी; परंतु जब भगवान् शंकरका क्रोध दूर हो जायगा और उनकी प्रसन्नताका समय होगा, तभी यह कार्य सम्भव हो सकेगा।'

रतिका विलाप देखकर पार्वती मूर्च्छित हो गयीं और उन अतीन्द्रिय गुणातीत चन्द्रशेखरकी स्तुति करने लगीं। तब भगवान् शिव रोती हुई पार्वतीको वहीं छोड़कर अपने स्थानको चले गये। फिर तो उसी क्षण पार्वतीका सारा अभिमान चूर हो गया। गिरिराजनन्दिनीने अपने रूप और यौवनका गर्व त्याग दिया। अब उन्हें सखियोंको अपना मुँह दिखानेमें भी लज्जाका अनुभव होने लगा। सब देवता रतिको आश्वासन दे रुद्रदेवको दण्डवत् प्रणाम करनेके पश्चात् अपने स्थानको चले गये। उस समय उनका मन शोकसे उद्विग्न हो रहा था। राधिके ! कामपत्नी रति रोषसे लाल आँखोंवाले रुद्रदेवका भयसे स्तवन करके शोकसे रोती हुई अपने घरको चली गयी। परंतु पार्वती लज्जावश पिताके घर नहीं गयी। वह सखियोंके मना करनेपर भी तपस्याके लिये वनमें चली गयी। तब शोकसे विह्वल हुई सखियोंने भी उन्हींका अनुगमन किया। माताओंके रोकनेपर भी वे सब-की-सब गङ्गातटवर्ती वनकी ओर चली