भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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५९० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण गयीं। आगे चलकर पार्वतीने दीर्घकालतक तपस्या | सम्बन्ध रखनेवाली सारी बातें कही गयीं। करके भगवान् त्रिलोचनको पतिरूपमें प्राप्त किया। | पार्वतीका यह चरित्र गूढ़ है। बताओ, तुम और रतिने भी शंकरके वरसे यथासमय कामदेवको | क्या सुनना चाहती हो ? प्राप्त किया। राधे ! इस प्रकार पार्वतीके दर्पमोचनसे | (अध्याय ३९) पार्वतीकी तपस्या, उनके तपके प्रभावसे अग्निका शीतल होना, ब्राह्मण-बालकका रूप धारण करके आये हुए शिवके साथ उनकी बातचीत, पार्वतीका घरको लौटना और माता-पिता आदिके द्वारा उनका सत्कार, भिक्षुवेषधारी शंकरका आगमन, शैलराजको उनके विविध रूपोंके दर्शन, उनकी शिव-भक्तिसे देवताओंको चिन्ता, उनका बृहस्पतिजीको शिव-निन्दाके लिये उकसाना तथा बृहस्पतिका देवताओंको शिव-निन्दाके दोष बताकर तपस्याके लिये जाना श्रीराधिका बोलीं- प्रभो ! यह बहुत ही | निराहार रहकर भक्ति-भावसे तपस्या की। तदनन्तर विचित्र और अपूर्व चरित्र सुननेको मिला है, जो | और भी कठोर तप आरम्भ किया। ग्रीष्म-ऋतुमें कानोंमें अमृतके समान मधुर, सुन्दर, निगूढ़ एवं | अपने चारों ओर आग प्रज्वलित करके वह दिन- ज्ञानका कारण है। भगवन् ! यह न तो अधिक | रात उसे जलाये रखती और उसके बीचमें संक्षेपसे सुना गया है और न विस्तारसे ही। परंतु | बैठकर निरन्तर मन्त्र जपती रहती थी। वर्षा-ऋतु अब विस्तारसे ही सुननेकी इच्छा है; अतः आप | आनेपर श्मशानभूमिमें शिवा सदा योगासन लगाकर विस्तारपूर्वक इस विषयका वर्णन कीजिये। पार्वतीने | बैठती और शिलाकी ओर देखती हुई जलकी स्वयं कौन-कौन-सा कठोर तप किया था ? और | धारासे भीगती रहती थी। शीतकाल आनेपर वह किस-किस वरको पाकर किस तरह महेश्वरको | सदा जलके भीतर प्रवेश कर जाती तथा शरत्की प्राप्त किया तथा रतिने फिर किस प्रकार कामदेवको | भयंकर बर्फवाली रातोंमें भी निराहार रहकर जिलाया ? प्यारे कृष्ण ! आप पार्वती और शिवके | भक्तिपूर्वक तपस्या करती थी। विवाहका वर्णन कीजिये। | इस प्रकार अनेक वर्षोंतक कठोर तप करके श्रीकृष्णने कहा- प्राणाधिके राधिके ! | भी जब सती-साध्वी पार्वती शंकरको न पा सकी, प्राणवल्लभे ! सुनो। प्राणेश्वरि ! तुम प्राणोंकी अधिष्ठात्री | तब वह शोकसे संतप्त हो अग्निकुण्डका निर्माण देवी हो। प्राणाधारे! मनोहरे ! जब रुद्रदेव | करके उसमें प्रवेश करनेको उद्यत हो गयी। वटवृक्षके नीचेसे चले गये, तब पार्वती माता- | तपस्यासे अत्यन्त कृशकाय हुई सती शैल-पुत्रीको पिताके बार-बार रोकनेपर भी तपस्याके लिये | अग्निकुण्डमें प्रवेश करनेको उद्यत देख कृपासिन्धु चली गयी। गङ्गाके तटपर जा तीनों काल स्नान | शिव कृपा करके स्वयं उसके पास गये। अत्यन्त करके वह मेरे दिये हुए मन्त्रका प्रसन्नतापूर्वक | नाटे कदके बालक ब्राह्मणका रूप धारण करके जप करने लगी। उस जगदम्बाने पूरे एक वर्षतक | अपने तेजसे प्रकाशित होते हुए भगवान् शिव