ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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है, इसका ज्ञान किसीको नहीं है। वे अत्यन्त वृद्ध हैं। विकारशून्य हैं। सबके आश्रय हैं अथवा सभी उनके आश्रय हैं। व्यर्थ घूमते रहते हैं। सर्पोंका हार धारण किये भीख माँगते हैं। (यही उनका परिचय है, जिन्हें तुम अपनी पुत्री देने जा रहे हो।) भगवान् नारायण ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ तथा कुलीन हैं। (अथवा समस्त कुलोंकी उत्पत्तिके स्थान हैं।) तुम उनके महत्त्वको समझो। पार्वतीका दान करनेके निमित्त वे ही तुम्हारे लिये योग्य पात्र हैं। पार्वतीका विवाह शंकरसे हो रहा है, यह सुनते ही बड़े-बड़े लोगोंके मुखपर उपहाससूचक मुस्कराहट दौड़ जायगी। एक तुम हो, जो लाखों पर्वतोंके राजाधिराज हो और एक शिव हैं, जिनके एक भी भाई-बन्धु नहीं है। तुम अपने बन्धु-बान्धवोंसे तथा धर्मपत्नी मेनासे भी शीघ्र ही पूछो और इन सबकी सम्मति जाननेका प्रयत्न करो। भैया! और सबसे तो यत्नपूर्वक पूछना, किंतु पार्वतीसे इस विषयमें न पूछना; क्योंकि उसे शंकरके अनुरागका रोग लगा हुआ है। रोगीको दवा नहीं अच्छी लगती। उसे सदा कुपथ्य ही रुचिकर जान पड़ता है।
वृन्दावनविनोदिनी राधे! यों कह शान्त स्वभाववाले ब्राह्मणने शीघ्र ही स्नान और भोजन करके प्रसन्नतापूर्वक अपने घरका रास्ता लिया। ब्राह्मणकी पूर्वोक्त बात सुनकर मेना शोकयुक्त हो नेत्रोंसे आँसू बहाने लगीं। उनका हृदय व्यथित हो उठा। वे हिमालयसे बोलीं।
मेनाने कहा—शैलराज! मेरी बात सुनिये, जो परिणाममें सुख देनेवाली है। आप इन श्रेष्ठ पर्वतोंसे पूछिये, इनकी क्या राय है। मैं तो अपनी बेटीको शंकरके हाथमें नहीं दूँगी। देखिये, मैं सारे विषयोंको त्याग दूँगी, विष खा लूँगी और पार्वतीके गलेमें फाँसी लगाकर भयानक वनमें चली जाऊँगी।
ऐसा कह मेना रोषपूर्वक पार्वतीका हाथ पकड़कर कोपभवनमें चली गयीं। खाना-पीना छोड़कर रोने लगीं और भूमिपर ही सो गयीं। इसी समय भाइयोंसहित वसिष्ठ वहाँ आये। उन सबके साथ अरुन्धती भी थीं। शैलराजने उन सब महर्षियोंको प्रणाम करके बैठनेके लिये सोनेका सिंहासन दिया और सोलह उपचार अर्पित करके भक्तिभावसे उनका पूजन किया। ऋषिलोग सभाके बीच उस सुखद सिंहासनपर बैठे और अरुन्धतीदेवी तत्काल वहाँ चली गयीं, जहाँ मेना और पार्वती थीं। जाकर उन्होंने देखा, मेना शोकसे अचेत हो पृथ्वीपर सो रही हैं। तब उन साध्वी देवीने मधुर वाणीमें कहा।
अरुन्धती बोलीं—पतिव्रते मेनके! उठो। मैं अरुन्धती तुम्हारे घर आयी हूँ। मुझे पितरोंकी मानसी कन्या तथा ब्रह्माजीकी पुत्रवधू समझो।
अरुन्धतीका स्वर सुनकर मेना शीघ्र ही उठकर खड़ी हो गयीं। उन्होंने लक्ष्मीके समान तेजस्विनी देवी अरुन्धतीके चरणोंमें मस्तक रखकर उन्हें प्रणाम किया और इस प्रकार कहा।
मेना बोलीं—अहो! हमारा जन्म बड़ा ही पुण्यमय है। हमलोगोंका यह कौन-सा पुण्य आज फलित हुआ है, जिससे ब्रह्माजीकी पुत्रवधू तथा वसिष्ठजीकी धर्मपत्नीने मेरे घरमें पदार्पण किया है। देवि! मैं आपकी किङ्करी हूँ। यह घर आपका है। हमारे बड़े पुण्यसे आपका यहाँ शुभागमन हुआ है।
सम्भ्रमपूर्वक इतना ही कहकर मेनाने सती अरुन्धतीको सोनेकी चौकीपर बिठाया और उनके चरण पखारकर उन्हें मिष्टान्न भोजन कराया। फिर स्वयं भी पुत्रीके साथ भोजन किया। तदनन्तर अरुन्धतीने मेनाको शिवके लिये नीतिकी बातें समझायीं और प्रसङ्गवश उनके साथ सम्बन्ध जोड़नेवाले वचन भी कहे। इधर उन महर्षियोंने भी शैलराजको उत्तम वाणीमें नीतिका सारतत्त्व समझाया और प्रसङ्गवश ऐसी बातें कहीं, जो