ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड
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शिव और पार्वतीके सम्बन्धको जोड़नेवाली थीं।
ऋषि बोले—शैलराज! हमारी बात सुनो। यह तुम्हारे लिये शुभकारक है। तुम पार्वतीका विवाह शिवके साथ कर दो और उन लोकसंहारक महादेवके श्वशुर बनो। देवेश्वर शिव तुमसे याचना नहीं करेंगे। तुम यत्नपूर्वक शीघ्र ही उन्हें समझाओ—विवाहके लिये तैयार करो। तुम्हारी शंकाका निवारण करनेके लिये ब्रह्माजी स्वयं विवाह स्थिर करानेके निमित्त प्रयत्न करें। योगियोंमें श्रेष्ठ शंकर कभी विवाहके लिये इच्छुक नहीं हैं। ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे ही वे तुम्हारी पुत्रीको ग्रहण करेंगे। उसे ग्रहण करनेका दूसरा कारण यह है कि तुम्हारी कन्याकी तपस्याके अन्तमें उन्होंने उसे अपनानेकी प्रतिज्ञा कर ली है। इन दो कारणोंसे ही योगिराज शिव विवाह करेंगे।
ऋषियोंकी यह बात सुनकर हिमवान् हँसे और कुछ भयभीत हो अत्यन्त विनयपूर्वक बोले।
हिमालयने कहा—मैं शिवके पास कोई राजोचित सामग्री नहीं देखता। न रहनेके लिये कोई घर है, न ऐश्वर्य। यहाँतक कि उनके कोई स्वजन-बान्धव भी नहीं हैं। जो अत्यन्त निर्लिप्त योगी हो, उसके हाथ कन्या देना उचित नहीं है। आपलोग ब्रह्माजीके पुत्र हैं। अतः अपना सत्य एवं निश्चित मत प्रकट कीजिये। यदि पिता कामना, लोभ, भय अथवा मोहके वशीभूत हो सुयोग्य पात्रके हाथमें अपनी कन्या नहीं देता है तो सौ वर्षोंतक नरकमें पड़ा रहता है;* अतः मैं स्वेच्छासे शूलपाणिको अपनी कन्या नहीं दूँगा। ऋषियो! इस विषयमें जो उचित कार्य हो; वह आप कीजिये।
हिमवान्की बात सुनकर वेद-वेदाङ्गोंके विद्वान् ब्रह्मपुत्र वसिष्ठ वेदोक्त मत प्रकट करनेके लिये उद्यत हुए।
वसिष्ठजीने कहा—शैलराज! लोक और वेदमें तीन प्रकारके वचन कहे गये हैं। शास्त्रज्ञ पुरुष अपनी निर्मल ज्ञानदृष्टिसे उन सभी वचनोंको जानता है। पहला वचन वह है, जो वर्तमान कालमें कानोंको सुन्दर लगे और जल्दी समझमें आ जाय; किंतु पीछे असत्य और अहितकर सिद्ध हो। ऐसी बात केवल शत्रु कहता है। उससे कदापि हित नहीं होता। दूसरे प्रकारका वचन वह है, जो आरम्भमें सहसा दुःखजनक जान पड़े; परंतु परिणाममें सुख देनेवाला हो। ऐसा वचन दयालु और धर्मशील पुरुष ही अपने भाई-बन्धुओंको समझानेके लिये कहता है। तीसरी उत्कृष्ट श्रेणीका वचन वह है जो कानोंमें पड़ते ही अमृतके समान मधुर प्रतीत हो तथा सर्वदा सुखकी प्राप्ति करानेवाला हो। उसमें सारतत्त्व सत्य होता है और उसमें सबका हित होता है। ऐसा वचन सर्वश्रेष्ठ तथा सभीको अभीष्ट होता है। गिरिराज! इस प्रकार नीतिशास्त्रमें तीन प्रकारके वचनोंका निरूपण किया गया है। अब तुम्हीं कहो इन तीनोंमेंसे कौन-सा वचन तुमसे कहूँ? तुम्हें कैसी बात सुननेकी इच्छा है? देवेश्वर शंकर वास्तवमें बाह्य धन-सम्पत्तिसे रहित हैं; क्योंकि उनका मन एकमात्र तत्त्वज्ञानके समुद्रमें निमग्न रहता है। बाह्य धन-सम्पत्ति आपाततः रमणीय जान पड़ती है; परंतु वह बिजलीकी चमककी भाँति शीघ्र ही नष्ट हो जानेवाली है। नित्यानन्दस्वरूप स्वात्माराम परमेश्वरको इस तरहकी सम्पत्तिके लिये क्या इच्छा होगी? गृहस्थ मनुष्य ऐसे पुरुषको अपनी पुत्री देता है, जो राज्य-वैभवसे सम्पन्न हो। जिसके मनमें स्त्रीसे द्वेष हो, ऐसे वरको कन्या देनेवाला पिता कन्याघाती होता है; परंतु कौन कह सकता है कि भगवान् शंकर दुःखी हैं? क्योंकि धनाध्यक्ष कुबेर भी उनके किङ्कर हैं।
* नानुरूपाय पात्राय पिता कन्यां ददाति चेत्। कामाल्लोभाद्भयान्मोहाच्छताब्दं नरकं व्रजेत्॥
(४१।५०)