भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 660

६५० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण मैं आज अपनी आँखोंसे देखूँगा। पूर्वकालमें भगवान् शंकरने ब्रह्माजीकी आयुपर्यन्त तप किया। तब ज्योतिर्मण्डलके बीच गोलोकमें परमात्मा श्रीकृष्णके उन्हें दर्शन हुए। वे श्रीकृष्ण सर्वतत्त्व- स्वरूप और सम्पूर्ण सिद्धियोंसे सम्पन्न हैं। वे सबके अपने तथा सर्वश्रेष्ठ परमतत्त्व हैं। भगवान् शिवने उनके चरणारविन्दोंकी परम निर्मल भक्ति पायी। उद्धव! जिन भक्तवत्सलने अपने भक्त शिवको अपने समान ही बना दिया, ऐसे प्रभावशाली उन परमेश्वरके आज मैं दर्शन करूँगा। जितने समयमें सहस्र इन्द्रोंका पतन हो जाता है, उतने कालतक निराहार रहकर कृशोदर हुए भगवान् अनन्तने उन परमात्माकी प्रसन्नताके लिये भक्तिभावसे तपस्या की। तब उन्होंने उन अनन्त देवको अपने समान ज्ञान प्रदान किया। उद्धव ! उन्हीं परमेश्वरके आज मैं दर्शन करूँगा। उद्धवजी ! अट्ठाईस इन्द्रोंका पतन हो जानेपर ब्रह्माजीका एक दिन-रात होता है। इसी क्रमसे तीस दिनोंका मास और बारह मासोंका वर्ष मानकर सौ वर्ष पूर्ण होनेपर ब्रह्माजीकी आयु पूरी होती है। अहो ! ऐसे ब्रह्माका पतन जिनके एक निमेषमें हो जाता है, उन परमात्माको आज मैं प्रत्यक्ष देखूँगा। भाई उद्धव! जैसे भूतलके धूलि-कणोंकी गणना नहीं हो सकती, उसी प्रकार ब्रह्माओं तथा ब्रह्माण्डोंकी गणना भी असम्भव है। उन अखिल ब्रह्माण्डोंके आधार हैं महाविराट्, जो श्रीकृष्णके षोडशांशमात्र हैं। प्रत्येक ब्रह्माण्डमें ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवता, मुनि, मनु, सिद्ध तथा मानव आदि चराचर प्राणी वास करते हैं। ब्रह्माण्डोंके आधारभूत वे महाविराट् भी, जिनका सोलहवाँ अंश हैं और जिनकी लीलामात्रसे आविर्भूत एवं तिरोभूत होते हैं; ऐसे सर्वशासक परमेश्वरके आज मैं दर्शन करूँगा। ऐसा कहकर अक्रूरजी प्रेमावेशसे मूर्च्छित हो गये। उनका अङ्ग-अङ्ग पुलकित हो उठा और वे नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए भगवच्चरणारविन्दोंका ध्यान करने लगे। उनका हृदय भक्तिसे भर गया। वे परमात्मा श्रीकृष्णके चरणकमलका स्मरण करते हुए भावनासे ही उनकी परिक्रमा करने लगे। उद्धवने अक्रूरको हृदयसे लगा लिया और बारंबार उनकी प्रशंसा की। तत्पश्चात् अक्रूरजी भी शीघ्र ही अपने घरको चले गये। (अध्याय ६५) श्रीराधाका श्रीकृष्णको अपने दुःस्वप्न सुनाना और उनके बिना अपनी दयनीय स्थितिका चित्रण करना, श्रीकृष्णका उन्हें सान्त्वना देना और आध्यात्मिक योगका श्रवण कराना श्रीनारायण कहते हैं- उसी दिन राधाने रात्रिमें बड़े बुरे सपने देखे। उन्होंने उठकर श्रीकृष्णसे कहा। राधिका बोलीं- प्रभो ! मैं रत्नसिंहासनपर रत्नमय छत्र धारण किये बैठी थी। उसी समय रोषसे भरे हुए एक ब्राह्मणने आकर मेरा वह छत्र ले लिया और मुझ अबलाको ही महाघोर कज्जलाकार दुस्तर गम्भीर सागरमें फेंक दिया। मैं शोकसे पीड़ित हो वहाँ जलके प्रवाहमें बारंबार चक्कर काटने लगी। घड़ियालोंसे भरे उस समुद्रमें बड़ी- बड़ी लहरोंके वेगसे टकराकर मैं व्याकुल हो गयी और बारंबार तुम्हें पुकारने लगी- 'हे नाथ ! मेरी रक्षा करो, रक्षा करो।' तुम्हें न देखकर मैं महान् भयमें पड़ गयी और देवतासे प्रार्थना करने लगी। श्रीकृष्ण ! समुद्रमें डूबती हुई मैंने देखा, चन्द्रमण्डलके सैकड़ों टुकड़े हो गये हैं और वह आकाशसे भूतलपर गिर रहा है। दूसरे ही क्षण मुझे दिखायी दिया कि सूर्यमण्डल भी आकाशसे पृथ्वीपर गिर