भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 661

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६५१ पड़ा और उसके चार टुकड़े हो गये। फिर एक ही समयमें आकाशके भीतर चन्द्रमा और सूर्यके मण्डलको मैंने पूर्णतः राहुसे ग्रस्त और अत्यन्त काला देखा। एक ही क्षणके बाद देखती हूँ कि एक तेजस्वी ब्राह्मणने रोषपूर्वक आकर मेरी गोदमें रखे हुए अमृत-कलशको फोड़ डाला। क्षणभर बाद यह दिखायी दिया कि वह महारुष्ट ब्राह्मण मेरे नेत्रगत पुरुषको पकड़कर लिये जा रहा है। प्रभो! मेरे हाथसे क्रीड़ा-कमल-दण्ड सहसा गिर पड़ा और उसके टुकड़े-टुकड़े हो गये। उत्तम रत्नोंके सारभागसे बना हुआ दर्पण भी सहसा हाथसे गिरकर टूक-टूक हो गया। जो पहले निर्मल था, वह पीछे काला दिखायी देने लगा था। मेरा रत्नसारनिर्मित हार और कमल छिन्न-भिन्न हो वक्षःस्थलसे खिसककर पृथ्वीपर गिर पड़ा। कमल अत्यन्त मलिन पड़ गया था। मेरी अट्टालिकामें जो पुतलियाँ बनी हैं, वे सब- की-सब क्षण-क्षणमें नाचती, हँसती, ताल ठोकती, गाती और रोती दिखायी दीं। आकाशमें काले रंगका एक विशाल चक्र बारंबार घूमता दिखायी दिया, जो बड़ा भयंकर था। वह कभी नीचेको गिरता और फिर ऊपरको उठ जाता था। मेरे प्राणोंका अधिष्ठाता देवता पुरुषरूपमें भीतरसे बाहर निकला और मुझसे बोला- 'राधे! बिदा होकर अब मैं यहाँसे जा रहा हूँ।' काले वस्त्र पहने हुए एक काली प्रतिमा दिखायी दी, जो मेरा आलिङ्गन और चुम्बन करने लगी। प्राणवल्लभ ! यह विपरीत लक्षण देखकर मेरे दायें अङ्ग फड़क रहे हैं और प्राण आन्दोलित हो रहे हैं। वे शोकसे रोते और क्षीण होते हैं। मेरा चित्त उद्विग्न हो उठा है। नाथ! तुम वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ हो। बताओ, यह सब क्या है? क्या है? यों कहकर राधिकादेवी शोकसे विह्वल और भयभीत हो श्रीकृष्णके चरणकमलोंमें गिर पड़ीं। उनके कण्ठ, ओठ और तालु सूख गये थे। भगवान् श्रीकृष्णने राधाको उठाकर सान्त्वना दी और उनके प्रति अपना महान् स्नेह प्रकट किया। तब राधा बोलीं- श्यामसुन्दर ! जब मैं आपके साथ रहती हूँ, तब हर्षसे खिल उठती हूँ और आपके बिना मलिन हो मृतक-तुल्य हो जाती हूँ। आपके साथ रहनेपर मैं उसी प्रकार चमक उठती हूँ, जैसे प्रातःकाल सूर्योदय होनेपर विशिष्ट ओषधियाँ तथा रजनीमें दीपशिखा। आपके बिना मैं दिन- दिन उसी तरह क्षीण होने लगती हूँ, जैसे कृष्णपक्षमें चन्द्रमाकी कला। आपके वक्षमें विराजमान होनेपर मेरी दीप्ति पूर्ण चन्द्रमाकी प्रभाके समान प्रकाशित होती है और जब आप मुझे त्यागकर अन्यत्र चले जाते हैं, तब मैं तत्काल ऐसी हो जाती हूँ, मानो मर गयी। मैं अमावास्याके चन्द्रमाकी कलाके समान विलीन-सी हो जाती हूँ। घीकी आहुति पाकर जैसे अग्निशिखा प्रज्वलित हो उठती है, उसी प्रकार आपका साथ पाकर मैं दीप्तिसे दमक उठती हूँ और आपके बिना शिशिर-ऋतुमें कमलिनीकी भाँति बुझ-सी जाती हूँ। जब मेरे पाससे तुम चले जाते हो, तब मैं चिन्तारूपी ज्वर या जरासे ग्रस्त हो जाती हूँ। जैसे सूर्य और चन्द्रमाके अस्त होनेपर सारी भूमि अन्धकारसे आच्छन्न हो जाती है, उसी तरह जब तुम दृष्टिसे ओझल होते हो, तब मैं शोक और दुःखमें डूब जाती हूँ। तुम्हीं सबके आत्मा हो; विशेषतः मेरे प्राणनाथ हो। जैसे जीवात्माके त्याग देनेपर शरीर मुर्दा हो जाता है, उसी प्रकार मैं तुम्हारे बिना मरी- सी हो जाती हूँ। तुम मेरे पाँचों प्राण हो। तुम्हारे बिना मैं मृतक हूँ, ठीक उसी तरह जैसे नेत्रगोलक आँखकी पुतलीके बिना अंधे होते हैं। जैसे चित्रोंसे युक्त स्थानकी शोभा बढ़ जाती है, उसी तरह तुम्हारे साथ मेरी शोभा अधिक हो जाती है और जब तुम मेरे साथ नहीं रहते हो तब मैं तिनकोंसे आच्छादित और झाड़-बुहार या सजावटसे रहित भूमिकी भाँति शोभाहीन हो जाती