ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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थीं—'हे नाथ! हे कृष्ण!' फिर दूसरे ही क्षण संतप्त हो रोने लगतीं और तत्काल मूर्च्छित हो जाती थीं। राधिकाका शरीर विरहाग्निसे संतप्त हो तपायी हुई लोहेकी छड़ीके समान अग्नितुल्य हो गया था; इसे छूआ नहीं जाता था। राधाके लिये सोने और जागनेमें, दिन और रातमें, घर और वनमें, जल, थल और आकाशमें तथा चन्द्रोदय और सूर्योदयमें कोई भेद नहीं रह गया है। इनकी आकृति मृतकतुल्य एवं जडवत् हो गयी है। ये एक ही स्थानपर रहकर सदा सम्पूर्ण जगत्को विष्णुमय देखती हैं। चिकने पङ्कपर कमलोंके सजल पत्र बिछाकर जो शय्या तैयार की गयी थी; उसपर ये आपके लिये विरहातुर होकर सोयी थीं। प्यारी सखियाँ निरन्तर श्वेत चँवर डुलाकर सेवा करने लगीं। इनके अङ्गोंपर चन्दनमिश्रित जल छिड़का गया। इनके सारे वस्त्र गीले हो गये, तथापि राधाके अङ्गोंका स्पर्श होनेमात्रसे वहाँका सारा पङ्क सूख गया। स्निग्ध कमलदल तत्क्षण जलकर भस्म हो गये। चन्दन सूख गया। राधाका चम्पाके समान कान्तिमान् सुनहरा वर्ण केशके रंगकी भाँति काला पड़ गया। सिन्दूरके सुन्दर बिन्दु तत्काल श्याम हो गये। वेश-भूषा, विलास, लीला एवं क्रीड़ा छूट गयी। कमलाकान्त कृष्ण! यदि आप शीघ्र लौटकर नहीं आयेंगे तो आपके वियोगमें मेरी सखी निश्चय ही अपने प्राणोंका परित्याग कर देगी। अतः नीतिविशारद श्रीकृष्ण! आप मन-ही-मन विचारकर जो उचित हो वह करें, जिससे आपके प्रति अनुरक्त अबलाकी हत्या न हो।
रत्नमालाकी यह बात सुनकर माधव हँस पड़े और हितकर, सत्य, नीतिसार एवं परिणाममें सुखद वचन बोले।
श्रीभगवान्ने कहा— प्रिये रत्ने! यद्यपि मैं ईश्वर हूँ और मिलनमें बाधा डालनेवाले शापका खण्डन कर सकता हूँ, तथापि ऐसा करना मेरे लिये उचित नहीं है। मैं नियतिके नियमको बदला नहीं करता हूँ। समस्त ब्रह्माण्डोंमें मैंने जो मर्यादा स्थापित की है, उसीका सहारा लेकर देवता, मुनि और मनुष्य कर्म करते हैं (फिर उसको मैं ही कैसे तोड़ दूँ)। सुन्दरि! सुदामके शापसे हम दोनों दम्पतिको परस्पर जो कुछ समयके लिये वियोग प्राप्त होनेवाला है, वह यद्यपि हमें अभीष्ट नहीं है, तथापि होकर ही रहेगा। सुमध्यमे! मैं राधाको वर देता हूँ। उस वरके अनुसार जाग्रत्-अवस्थामें ही इन्हें मुझसे वियोगका अनुभव होगा; परंतु स्वप्नमें राधाको निरन्तर मेरा आलिङ्गन प्राप्त होता रहेगा। मैंने प्रियाजीको आध्यात्मकी बुद्धि प्रदान की है। उससे इनका शोक मिट जायगा। रत्नमाले! तुम्हारा कल्याण हो। तुम राधाको समझाओ। अब मैं नन्दभवनको जा रहा हूँ।
नारद! यों कहकर जगदीश्वर श्रीकृष्ण नन्दभवनकी ओर चल दिये और सखियाँ राधाको समझाने लगीं। घर जाकर श्यामसुन्दरने माता-पिताको प्रणाम किया। माताने उन्हें गोदमें बिठा लिया और तुरंतका तैयार किया हुआ माखन खिलाया। फिर शीतल जल पीकर उन्होंने माताका दिया हुआ पान खाया और वहीं माँके समीप बैठे रहे। समस्त गोपसमूह श्वेत चँवर डुलाकर उनकी सेवा करने लगे। उन्होंने भी श्यामसुन्दरको प्रसन्नतापूर्वक हार, चन्दन और ताम्बूल दिये।
\hfill (अध्याय ६८-६९)