भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 669

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६५९

अक्रूरजीके शुभ स्वप्न तथा मङ्गलसूचक शकुनका वर्णन, उनका रासमण्डल और वृन्दावनका दर्शन करते हुए नन्दभवनमें जाना, नन्दद्वारा उनका स्वागत-सत्कार, उन्हें श्रीकृष्णके विविध रूपोंमें दर्शन, उनके द्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति तथा श्रीकृष्णको मथुरा चलनेकी सलाह देना, गोपियोंद्वारा अक्रूरका विरोध और उनके रथका भञ्जन, श्रीकृष्णका उन्हें समझाना और आकाशसे दिव्य रथका आगमन

भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! कंससे ब्रजमें जानेकी आज्ञा पाकर अक्रूरजी अपने घर गये और उत्तम मिष्टान्न खाकर शय्यापर सोये। उन्होंने सुवासित जल पीकर कपूर मिला हुआ पान खाया और सुखपूर्वक निद्रा ली। तदनन्तर रातके पिछले पहरमें जब कि बाजे आदिकी ध्वनि नहीं होती थी; उन्होंने एक सुन्दर सपना देखा। ऐसा सपना, जिसकी पुराणों और श्रुतियोंमें प्रशंसा की गयी है। अक्रूरजी नीरोग थे। उनकी शिखा बँधी हुई थी। उन्होंने दो वस्त्र धारण कर रखे थे। वे सुन्दर शय्यापर सोये थे। उनके मनमें उत्तम स्नेह उमड़ रहा था और वे चिन्ता तथा शोकसे रहित थे।

मुने! उन्होंने स्वप्नमें पहले एक ब्राह्मण-बालकको देखा, जिसकी किशोर अवस्था और अङ्गकान्ति श्याम थी। वह दो भुजाओंसे विभूषित था। उसके हाथोंमें मुरली थी। वह पीत वस्त्र धारण करके वनमालासे सुशोभित था। उसके सारे अङ्ग चन्दनसे चर्चित थे। मालतीकी माला उसकी शोभा बढ़ाती थी। वह भूषणके योग्य और उत्तम मणिरत्ननिर्मित आभूषणोंसे विभूषित था। उसके मस्तकपर मोरपंखका मुकुट शोभा दे रहा था। मुखपर मन्द मुस्कानकी प्रभा फैल रही थी और नेत्र कमलोंकी शोभाको लज्जित कर रहे थे। इसके बाद उन्होंने पति और पुत्रोंसे युक्त, पीताम्बरधारिणी तथा रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित एक सुन्दरी सतीको देखा, जिसके एक हाथमें जलता दीपक था और दूसरेमें श्वेत धान्य। उसका मुख शरद्-ऋतुके चन्द्रमाको तिरस्कृत कर रहा था। वह सुन्दरी सती मुस्कराती हुई वर देनेको उद्यत थी। इसके बाद उन्हें शुभाशीर्वाद देते हुए एक ब्राह्मण, श्वेत कमल, राजहंस, अश्व तथा सरोवरके दर्शन हुए। उन्होंने फल और फूलोंसे लदे हुए आम, नीम, नारियल, विशाल आक और केलेके वृक्षका सुन्दर एवं मनोहर चित्र भी देखा। उन्हें यह भी दिखायी दिया कि सफेद साँप मुझे काट रहा है और मैं पर्वतपर खड़ा हूँ। उन्होंने कभी अपनेको वृक्षपर, कभी हाथीपर, कभी नावपर और कभी घोड़ेकी पीठपर बैठे देखा। कभी देखा कि मैं वीणा बजा रहा हूँ और खीर खा रहा हूँ। कमलके पत्तेपर परोसा हुआ प्रिय अन्न दही, दूधके साथ ले रहा हूँ। कभी देखा कि मेरे अङ्गोंमें कीड़े और विष्ठा लग गये हैं और मैं रोता-रोता मोहित हो रहा हूँ। कभी उन्हें अपने हाथोंमें श्वेत धान्य और श्वेत पुष्प दिखायी दिया तथा कभी उन्होंने अपने-आपको चन्दनसे चर्चित देखा। कभी अपने-आपको अट्टालिकापर और कभी समुद्रमें देखा। शरीरमें रक्त लगा है; अङ्ग-अङ्ग छिन्न-भिन्न एवं क्षत-विक्षत हो रहा है और उसमें मेद तथा पीब लिपटे हुए हैं—यह बात देखनेमें आयी। तदनन्तर चाँदी, सोना, उज्ज्वल मणिरत्न, मुक्ता, माणिक्य, भरे हुए कलशका जल, बछड़ासहित गौ, साँड़, मोर, तोता, सारस, हंस, चील, खंजरीट, ताम्बूल, पुष्पमाला, प्रज्वलित अग्नि, देवपूजा, पार्वतीकी प्रतिमा, श्रीकृष्णकी प्रतिमा, शिवलिङ्ग, ब्राह्मण-