भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 67, कुल 810 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 67

ब्रह्मखण्ड ५७


जगदीश्वर ! पृथ्वीपर जितनी भी स्त्री-जातियाँ हैं, उनमेंसे किसीको भी विधाताने इन गन्धर्वकुमारके समान गुणवान् पति नहीं दिया है।

इसके अनन्तर मालावती अपने स्वामीके गुणोंका बखान करने लगी और अन्तमें सहसा कुपित हो नारायण, ब्रह्मा, महादेव तथा धर्म आदि समस्त देवताओंको सम्बोधित करके उन्हें शाप देनेको उद्यत हो गयी। तब ब्रह्मा आदि देवताओंने क्षीरसागरके तटपर जाकर भगवान् विष्णुकी शरण ली और मालावतीके भीषण शापसे बचानेकी उनसे प्रार्थना की। देवताओंके प्रार्थना कर चुकनेपर आकाशवाणी हुई—'देवताओ! अब तुमलोग जाओ। यज्ञके मूल हैं भगवान् विष्णु, वे ही ब्राह्मणका रूप धारण करके मालावतीको शान्त करने तथा तुमलोगोंको शापके संकटसे बचानेके लिये जायेंगे।'

आकाशवाणीका यह कथन सुनकर सब देवताओंका हृदय प्रसन्नतासे खिल उठा। वे सब-के-सब उत्कण्ठित हो कौशिकीके तटपर मालावतीके स्थानमें गये। वहाँ पहुँचकर देवताओंने उस सती मालावती देवीको देखा। वह रत्नोंके सारभूत इन्द्रनील आदि मणियोंके आभूषणोंसे उद्दीप्त हो भगवती लक्ष्मीकी कला-सी जान पड़ती थी। उसके अङ्गोंको अग्निमें तपाकर शुद्ध की हुई सुनहरी साड़ी सुशोभित कर रही थी। भालदेशमें सिन्दूरकी बेंदी शोभा दे रही थी। वह शरत्कालके चन्द्रमाकी शान्त प्रभा-सी प्रकाशित होती और अपनी दीप्तिसे सम्पूर्ण दिशाओंको उद्भासित करती थी। पतिसेवारूप महान् धर्मका अनुष्ठान करके चिरकालसे संचित किये हुए तेजसे अग्निकी उत्तम एवं प्रज्वलित शिखा-सी उद्दीप्त हो रही थी। पतिके शवको छातीसे लगाकर योगासन लगाये बैठी थी और स्वामीकी सुरम्य वीणाको दाहिने हाथमें लिये हुए थी।

प्राणवल्लभके प्रति भक्ति तथा स्नेहके कारण योगमुद्रापूर्वक तर्जनी और अङ्गुष्ठ अंगुलियोंके अग्रभागसे शुद्ध स्फटिक मणिकी माला धारण किये थी। मनोहर चम्पाकी-सी अङ्ग-कान्ति, बिम्बफलके सदृश अरुण ओष्ठ और गलेमें रत्नोंकी माला शोभा पाती थी। वह सुन्दरी सोलह वर्षकी-सी अवस्थासे युक्त तथा नित्य सुस्थिर यौवनसे सम्पन्न थी। वह सती अपने स्वामीके शवको बारंबार शुभदृष्टिसे देख रही थी।

इस रूपमें मालावतीको देखकर उन सब देवताओंको बड़ा विस्मय हुआ। वे सभी धर्मात्मा और धर्मभीरु थे; अतः क्षणभर वहाँ अपनेको छिपाये खड़े रहे।

(अध्याय १३)

ब्रह्मवैवर्त पुराण · पृष्ठ 67, कुल 810 में से · BharatKosha