भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 68

५८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण ब्राह्मण-बालकरूपधारी विष्णुका मालावतीके साथ संवाद, ब्राह्मणके पूछनेपर मालावतीका अपने दुःख और इच्छाको व्यक्त करना तथा ब्राह्मणका कर्मफलके विवेचनपूर्वक विभिन्न देवताओंकी आराधनासे प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन करना, श्रीकृष्ण एवं उनके भजनकी महिमा बताना सौति कहते हैं—मुने ! क्षणभर वहाँ खड़े रहकर परम मङ्गलदायक ब्रह्मा और शिव आदि देवता मालावतीके निकट गये। देवताओंको आया देख पतिव्रता मालावतीने अपने प्राणवल्लभको उनके समीप रखकर उन सबको प्रणाम किया। तत्पश्चात् वह फूट-फूटकर रोने लगी। इसी बीचमें वहाँ उस देवसमाजके भीतर कोई ब्राह्मण-बालक आया। उसकी आकृति बड़ी मनोहर थी। दण्ड, छत्र, श्वेत वस्त्र और उज्ज्वल तिलक धारण किये तथा हाथमें एक बड़ी-सी पुस्तक लिये वह ब्राह्मण-कुमार अपने तेजसे प्रज्वलित-सा हो रहा था। उसके सम्पूर्ण अङ्ग चन्दनसे चर्चित थे। वह परम शान्त जान पड़ता था और मन्द-मन्द मुस्करा रहा था। विष्णुकी मायासे विस्मित हुए देवताओंकी अनुमति ले वह वहीं देवसभाके मध्यभागमें बैठ गया और तारामण्डलके बीचमें प्रकाशित होनेवाले चन्द्रमाकी भाँति शोभा पाने लगा। वह ब्राह्मण- बालक समस्त देवताओं तथा मालती (मालावती)- से इस प्रकार बोला। ब्राह्मणने कहा—यहाँ ब्रह्मा और शिव आदि सम्पूर्ण देवता किसलिये पधारे हैं? जगत्‌की सृष्टि करनेवाले साक्षात् विधाता यहाँ किस कार्यसे आये हैं? समस्त ब्रह्माण्डोंका संहार करनेवाले स्वयं सर्वव्यापी शम्भु भी यहाँ विराज रहे हैं। इसका क्या कारण है? तीनों लोकोंके समस्त कर्मोंके साक्षी धर्म भी यहाँ उपस्थित हैं, यह महान् आश्चर्य है। सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, काल, मृत्युकन्या तथा यम आदिका समागम ही यहाँ किसलिये सम्भव हुआ है? हे मालावति ! तुम्हारी गोदमें अत्यन्त सूखा हुआ शव कौन है? जीती- जागती स्त्रीके पास मरा हुआ पुरुष क्यों है? उस सभामें देवताओं तथा मालावतीसे ऐसा प्रश्न करके वे ब्राह्मण देवता जब चुप हो गये, तब मालावती उन विद्वान् ब्राह्मणको प्रणाम करके यों बोली। मालावतीने कहा—मैं ब्राह्मणरूपधारी भगवान् विष्णुको प्रसन्नतापूर्वक प्रणाम करती हूँ, जिनके दिये हुए जल और पुष्पमात्रसे सम्पूर्ण देवता तथा श्रीहरि भी संतुष्ट होते हैं। प्रभो ! मैं शोकसे आतुर हूँ। आप मेरे इस निवेदनपर ध्यान दीजिये; क्योंकि योग्य और अयोग्यपर भी कृपा करनेवाले संत- महात्माओंका अनुग्रह सदा सबपर समानरूपसे प्रकट होता है। विप्रवर ! मैं उपबर्हणकी पत्नी तथा चित्ररथकी कन्या हूँ। मुझे सब लोग मालावती कहते हैं। मैंने लक्ष दिव्य वर्षोंतक अपने इन स्वामीके साथ प्रत्येक सुरम्य तथा मनोहर स्थानपर स्वच्छन्द क्रीडा की है। द्विजेन्द्र ! आप विद्वान् हैं। साध्वी युवतियोंका अपने प्रियतमके प्रति जितना स्नेह होता है, वह सब आपको शास्त्रके अनुसार विदित है। मेरे पतिने अकस्मात् ब्रह्माजीका शाप प्राप्त होनेसे अपने प्राणोंको त्याग दिया है। अतः मैं देवताओंसे यह उद्देश्य रखकर विलाप करती हूँ कि मेरे पति जीवित हो जायँ। पृथ्वीपर सब लोग अपने-अपने कार्यकी सिद्धिके लिये व्यग्र रहते हैं। वे लाभ-हानिको नहीं जानते। केवल स्वार्थ-साधनमें तत्पर रहते हैं। सुख, दुःख, भय, शोक, संताप, ऐश्वर्य, परमानन्द, जन्म, मृत्यु और मोक्ष—ये सब मनुष्योंको अपने कर्म एवं प्रयत्नके अनुसार प्राप्त होते हैं। देवता सबके जनक हैं। वे ही कर्मोंका फल देते हैं। साथ ही वे लीलापूर्वक