ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मखण्ड ५९
कर्मरूपी वृक्षोंका मूलोच्छेद करनेमें भी समर्थ होते हैं। देवतासे बढ़कर कोई बन्धु नहीं है। देवतासे बढ़कर कोई बलवान् नहीं है। देवतासे बढ़कर दयालु और दाता भी दूसरा कोई नहीं है। मैं समस्त देवताओंसे याचना करती हूँ कि वे मुझे पतिदान दें। यही मुझे अभीष्ट है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके फल देनेवाले देवता कल्पवृक्षरूप हैं। इसलिये मैं इनसे याचना करती हूँ, ये मेरा मनोरथ सफल करें। यदि देवतालोग मुझे अभीष्ट पतिदान देंगे, तब तो इनका भला है; अन्यथा मैं इन सबको निश्चय ही स्त्रीके वधका पाप दूँगी। इतना ही नहीं, मैं इन सबको दारुण एवं दुर्निवार शाप भी दे सकती हूँ। सतीके शापको टालना बहुत कठिन होता है। किस तपस्यासे उसका निवारण किया जायगा?
शौनक! ऐसा कहकर शोकातुर पतिव्रता मालावती उस देवसभामें चुप हो गयी। तब उन श्रेष्ठ ब्राह्मणने उससे कहा।
ब्राह्मण बोले—मालावती! इसमें संदेह नहीं कि देवतालोग कर्मोंका फल देनेवाले हैं; परंतु वह फल तत्काल नहीं, देरसे मिलता है। ठीक वैसे ही, जैसे किसान बोये हुए अनाजका फल तुरंत नहीं, देरसे पाता है। पतिव्रते! गृहस्थ पुरुष हलवाहेके द्वारा अपने खेतमें जो अनाज बोता है, उसका समयानुसार अङ्कुर प्रकट होता है। फिर समय आनेपर वह वृक्ष होता और फलता भी है। तत्पश्चात् अन्य समयमें वह पकता है और अन्य समयमें गृहस्थ पुरुष उसके फलको पाता है। इसी प्रकार सबके विषयमें समझ लेना चाहिये। प्रत्येक कर्मका फल देरसे ही मिलता है। संसारमें गृहस्थ पुरुष जो बीज बोता है, वही भगवान् विष्णुकी मायासे समयानुसार अङ्कुर और वृक्ष होता है और यथासमय गृहस्थ पुरुषको उसके फलकी उपलब्धि होती है। पुण्यात्मा पुरुष पुण्यभूमिमें चिरकालतक जो तप करता है, उसका फल देनेवाले सचमुच देवता ही हैं; इसमें संशय नहीं है। ब्राह्मणोंके मुखमें तथा ऊसर भूमिसे रहित उत्तम खेतमें मनुष्य भक्तिभावसे जो आहुति डालता है, उसका फल उसे निश्चय ही प्राप्त होता है। बल, सौन्दर्य, ऐश्वर्य, धन, पुत्र, स्त्री और उत्तम पति—कोई भी पदार्थ तपस्याके बिना नहीं मिलता। अतः तपके बिना क्या हो सकता है? जो भक्तिभावसे प्रकृति (दुर्गादेवी)-का सेवन करता है, वह प्रत्येक जन्ममें विनयशील सद्गुणवती तथा सुन्दरी प्राणवल्लभा पत्नीको प्राप्त करता है। प्रकृतिके ही वरसे भक्त पुरुष लीलापूर्वक अविचल लक्ष्मी, पुत्र-पौत्र, भूमि, धन और संततिको पाता है। भगवान् शिव कल्याणस्वरूप, कल्याणदाता और कल्याणप्राप्तिके कारण हैं। वे ज्ञानानन्दस्वरूप, महात्मा, परमेश्वर एवं मृत्युञ्जय हैं। जो भक्तिभावसे उन महेश्वरका सेवन करता है, वह पुरुष प्रत्येक जन्ममें सुन्दरी पत्नी पाता है और उनकी आराधना करनेवाली स्त्री प्रत्येक जन्ममें उत्तम पति पाती है। भगवान् हरके वरसे मनुष्यको विद्या, ज्ञान, उत्तम कविता, पुत्र-पौत्र, उत्कृष्ट लक्ष्मी, धन, बल और पराक्रमकी प्राप्ति होती है। जो मानव ब्रह्माजीका भजन करता है, वह भी संतान और लक्ष्मीको पाता है। ब्रह्माजीके वरदानसे मनुष्यको विद्या, ऐश्वर्य और आनन्दकी प्राप्ति होती है। जो मनुष्य भक्तिभावसे दीनानाथ, दिनेश्वर सूर्यकी आराधना करता है, वह निश्चय ही यहाँ विद्या, आरोग्य, आनन्द, धन और पुत्र पाता है। जो सबसे प्रथम पूजने योग्य, सर्वेश्वर, सनातन, देवाधिदेव गणेशजीकी भक्तिभावसे पूजा करता है, उसके जन्म-जन्ममें समस्त विघ्नोंका नाश होता है। वह सोते-जागते हर समय परम आनन्दका अनुभव करता है। गणेशजीके वरदानसे उसको ऐश्वर्य, पुत्र, पौत्र, धन, प्रजा, ज्ञान, विद्या और उत्तम कवित्वकी प्राप्ति होती है। जो देवताओंके स्वामी लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुका भजन करता है, वह यदि वर पानेका इच्छुक