भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 70

६० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

हो तो उसे वह सम्पूर्ण वर प्राप्त हो जाता है। अन्यथा अवश्य ही उसे मोक्षकी प्राप्ति होती है। शान्तस्वरूप जगत्पालक श्रीविष्णुकी सेवा करके सचमुच ही मनुष्य समस्त तप, सम्पूर्ण धर्म तथा परम उत्तम यश एवं कीर्तिको प्राप्त कर लेता है। जो मूढ़ सर्वेश्वर विष्णुका सेवन करके उसके बदलेमें कोई वर लेना चाहता है, उसे विधाताने ठग लिया और विष्णुकी मायाने मोहमें डाल दिया। नारायणकी माया सब कुछ करनेमें समर्थ, सबकी कारणभूता और परमेश्वरी है। वह जिसपर कृपा करती है, उसे विष्णु-मन्त्र देती है।

जो धर्मात्मा मनुष्य धर्मका भजन करता है, वह निश्चय ही सम्पूर्ण धर्मका फल पाता है और इहलोकमें सुख भोगकर परलोकमें विष्णुके परमपदको प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य जिस देवताकी भक्तिभावसे आराधना करता है, वह पहले उसीको पाता है, फिर समयानुसार उस देवताके साथ ही वह उत्तम विष्णुधाममें चला जाता है।

भगवान् श्रीकृष्ण प्रकृतिसे परे तथा तीनों गुणोंसे अतीत—निर्गुण हैं। ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदिके सेव्य, उनके आदिकारण, परात्पर अविनाशी परब्रह्म एवं सनातन भगवान् हैं। साकार, निराकार, ज्योतिःस्वरूप, स्वेच्छामय, सर्वव्यापी, सर्वाधार, सर्वेश्वर, परमानन्दमय, ईश्वर, निर्लिप्त तथा साक्षिरूप हैं। वे भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही दिव्य विग्रह धारण करते हैं। जो उनकी आराधना करता है, वह सचमुच ही जीवन्मुक्त है। वह बुद्धिमान् पुरुष कोई वर नहीं ग्रहण करता। सालोक्य आदि चारों प्रकारकी मुक्तियोंको भी वह तुच्छ समझने लगता है। ब्रह्मत्व, अमरत्व और मोक्ष भी उसके लिये तुच्छ-सा हो जाता है। ऐश्वर्यको वह मिट्टीके ढेलेके समान नश्वर मानता है। इन्द्रत्व, मनुत्व और चिरजीवित्वको भी पानीके बुलबुलेके समान क्षणभङ्गुर समझकर अत्यन्त तुच्छ गिनने लगता है। सोते-जागते हर समय श्रीकृष्णकी सेवा ही चाहता है। उनकी दासताके सिवा दूसरा कोई पद नहीं मानता। श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंमें निरन्तर एवं अविचल भक्ति पाकर वह पूर्णकाम हो जाता है। श्रीकृष्णका भक्त उन परिपूर्णतम ब्रह्मका सेवन करके सदा सुस्थिर रहता है। वह अपने कुलकी करोड़ों, नानाके कुलकी सैकड़ों तथा श्वशुरके कुलकी सैकड़ों पूर्व पीढ़ियोंका लीलापूर्वक उद्धार करके दास, दासी, माता और पत्नीका तथा पुत्रके बादकी भी सैकड़ों पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है और स्वयं निश्चय ही गोलोकमें जाता है। मनुष्य तभीतक कामासक्त होकर गर्भमें निवास करता है, तभीतक यमयातना भोगता है और गृहस्थ पुरुष तभीतक भोगोंकी इच्छा रखता है, जबतक कि श्रीकृष्णका सेवन नहीं करता। यमराज उस भक्तके कर्मसम्बन्धी लेखको तत्काल भयके मारे दूर कर देता है। ब्रह्माजी पहलेसे ही उसके स्वागतके लिये मधुपर्क आदि तैयार करके रखते हैं और सोचते हैं कि अहो! वह मेरे लोकको लाँघकर इसी मार्गसे यात्रा करेगा। कोटिशत कल्पोंमें भी उसका वहाँसे निष्कासन नहीं होगा। जैसे सर्प गरुड़को देखते ही भाग जाते हैं, उसी तरह करोड़ों जन्मोंके किये हुए पाप भी श्रीकृष्ण-भक्तसे भयभीत हो उसे छोड़कर पलायन कर जाते हैं। श्रीकृष्ण-भक्त मानव-शरीरको छोड़नेके बाद निर्भय हो गोलोकमें जाता है। वहाँ जानेपर दिव्य शरीर धारण करके सदा श्रीकृष्णकी सेवा करता है। श्रीकृष्ण जबतक गोलोकमें निवास करते हैं, तबतक भक्त पुरुष निरन्तर वहाँ उनकी सेवामें रहता है। श्रीकृष्णका दास ब्रह्माकी नश्वर आयुको एक निमेषभरका मानता है।

(अध्याय १४)

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