भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 706

६९६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण नियतरूपसे सात लाख दिव्य वर्षोंतक उस कमलके अंदर जप करते रहे। इसके बाद मुझसे वर पाकर उन सृष्टिकर्ताने सृष्टिकी रचना की। मेरी मायाके बलसे ब्रह्माने प्रत्येक ब्रह्माण्डमें ब्रह्मा, विष्णु, शिव, दिक्पाल, द्वादश आदित्य, एकादश रुद्र, नौ ग्रह, आठ वसु, तीन करोड़ देवता, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर, भूत-प्रेत आदि राक्षस एवं चराचर जगत्की रचना की। उन्होंने प्रत्येक विश्वमें क्रमशः सात स्वर्ग, सात सागरोंसे संयुक्त स्वर्णभूमिवाली सप्तद्वीपवती पृथ्वी, अन्धकारमय स्थान, सात पाताल तथा इनसे युक्त ब्रह्माण्डका निर्माण किया। प्रत्येक विश्वमें चन्द्रमा, सूर्य, पुण्यक्षेत्र भारत और इन गङ्गा आदि तीर्थोंकी सृष्टि की। ब्रजेश्वर ! महाविष्णुके शरीरमें जितने रोमकूप हैं, क्रमशः उतने ही असंख्य विश्व हैं। उन विश्वोंके ऊर्ध्वभागमें वैकुण्ठ है, जो निराश्रय है तथा मेरी इच्छासे जिसका निर्माण हुआ है। वेद भी उसका वर्णन करके पार नहीं पा सकते। निश्चय ही कुयोगियों तथा भक्तिहीनोंके लिये उसका दर्शन दुर्लभ है। इससे ऊपर गोलोक है। वह परम विचित्र आश्रयस्थान वायुके आधारपर टिका हुआ है। मेरी इच्छासे उस अत्यन्त रमणीय अविनाशी लोकका निर्माण हुआ है। वह शतशृङ्ग पर्वत, पुण्यमय वृन्दावन, रमणीय रासमण्डल तथा विरजा नदीसे युक्त है। विरजा अमूल्य रत्नसमूहों, हीरा, माणिक्य तथा कौस्तुभ आदि असंख्य मणियोंसे युक्त होनेके कारण बड़ी मनोहर है। उस गोलोकमें प्रत्येक महल अमूल्य रत्नोंके बने हुए हैं। उसमें ऐसा मनोहर परकोटा है, जिसे विश्वकर्माने भी नहीं देखा है। वे महल गोपियों, गोपगणों तथा कामधेनुओंसे परिवेष्टित हैं। वहाँ रास-मण्डल असंख्यों कल्पवृक्षों, पारिजातके तरुओं, सरोवरों तथा पुष्पोद्यानोंसे समावृत है। वह गोपों, मन्दिरों, रत्नप्रदीपों, पुष्प-शय्याओं, कस्तूरी- कुङ्कुमयुक्त सुगन्धित चन्दनके गन्धों, क्रीडोपयुक्त भोगपदार्थों, सुवासित जल और पान-बीड़ाओं, रमणीय सुगन्धियुक्त धूपों, पुष्पमालाओं और रत्नजटित दर्पणोंसे भरा-पूरा है। अमूल्य रत्नाभरणों तथा अग्नि-शुद्ध वस्त्रोंसे अलंकृत राधाकी दासियाँ सदा उसकी रक्षा करती रहती हैं। नवयौवनसम्पन्न तथा अनुपम सौन्दर्यशाली गजेन्द्रोंकी सेना क्रमशः उसे घेरे हुए है। ब्रजराज ! वह रमणीय तथा चन्द्रमण्डलके समान गोल है। उस विस्तृत मण्डलकी रचना बहुमूल्य रत्नोंद्वारा हुई है। वह कस्तूरी-कुङ्कुमयुक्त सुन्दर एवं सुगन्धित चन्दनसे समर्चित है। वह फल-पल्लवयुक्त मङ्गल-कलशों, दही और खीलों, पत्तों, कोमल दूर्वाङ्कुरों, फलों, असंख्य केलेके मनोहर खम्भों तथा रेशमी सूत्रमें बँधे हुए कोमल चन्दन-पल्लवोंकी वन्दनवारोंसे आच्छादित है और चन्दनयुक्त पुष्पमालाओं एवं आभूषणोंसे विभूषित है। वहाँ बहुमूल्य रत्नोंका बना हुआ शतशृङ्ग पर्वत मनको खींचे लेता है। वह अत्यन्त सुन्दर है। वेद भी उसका वर्णन नहीं कर सकते। वह हीरेके हारसे युक्त होनेके कारण रमणीय है तथा मनोहर परकोटेकी तरह उस गोलोकको चारों ओरसे घेरे हुए है। वहाँ चन्दनके वृक्षोंसे युक्त रमणीय वृन्दावन है, जो कल्पवृक्षों, सुन्दर मन्दार-पुष्पों, कामधेनुओं, शोभाशाली मनोहर पुष्पवाटिकाओं, रमणीय क्रीड़ा-सरोवरों और परम सुन्दर क्रीड़ाभवनोंसे सुशोभित है। उसके एकान्तमें रास-क्रीड़ाके योग्य अत्यन्त सुन्दर स्थान है, जो चारों ओरसे गोलाकार है। रक्षकरूपमें नियुक्त हुई असंख्यों सुन्दरी गोपिकाएँ उसकी रक्षा करती हैं। वहाँ कोकिल कूकते रहते हैं तथा भौंरोंका गुंजार होता रहता है। उसीके एकान्त स्थलमें एक रमणीय अक्षयवट है, जिसकी लंबाई-चौड़ाई विशाल है। सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाला वह अक्षयवट गोपियोंके लिये कल्पवृक्ष है। वहाँ राधाकी दासियाँ