भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 707

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६९७ क्रीड़ा करती रहती हैं। विरजाके तटप्रान्तके जलका स्पर्श करके बहती हुई शीतल, मन्द, सुगन्ध वायु उसे पवित्र करती रहती है। उस अक्षयवटके नीचे वृन्दावनमें विनोद करनेवाली मेरे प्राणोंकी अधिदेवता वह राधा असंख्यों दासीगणोंके साथ क्रीड़ा करती है। वही राधा इस समय वृषभानुकी कन्या होकर प्रकट हुई है। ब्रजेश ! ब्रह्मादि देवता, सिद्धेन्द्र, मुनीन्द्र और सिद्धगण गुण, बल, बुद्धि, ज्ञानयोग और विद्याद्वारा उसकी पूजा करते हैं। तात ! यह मेरी प्रिया मेरे ही समान है; अतः सब तरहसे वन्दनीया है। नन्दजी ! इस प्रकार मैंने यथोचित एवं परिमित रूपसे ब्रह्माण्डोंका वर्णन कर दिया। अब पुनः आपकी और क्या सुननेकी इच्छा है ? (अध्याय ८४) चारों वर्णोंके भक्ष्याभक्ष्यका निरूपण तथा कर्मविपाकका वर्णन नन्दजीने कहा - महाभाग ! अब चारों वर्णोंके भक्ष्याभक्ष्यका तथा समस्त प्राणियोंके कर्मविपाकका वर्णन कीजिये । श्रीभगवान् बोले- तात ! मैं चारों वर्णोंके वेदोक्त भक्ष्याभक्ष्यका यथोचितरूपसे वर्णन करता हूँ, उसे सावधान होकर श्रवण करो। मनुका कथन है कि लोहेके बर्तनमें जलपान, उसमें रखा हुआ गौका दूध-दही-घी, पकाया हुआ अन्न भ्रष्ट्रादिक (भुना हुआ पदार्थ), मधु, गुड़, नारियलका जल, फल, मूल आदि सभी पदार्थ अभक्ष्य हो जाते हैं। जला हुआ अन्न तथा गरमाया हुआ बदरीफल या खट्टी काँजीको भी अभक्ष्य कहा गया है। काँसेके बर्तनमें नारियलका जल और ताम्रपात्रमें स्थित मधु तथा घृतके अतिरिक्त सभी गव्य पदार्थ (दूध-दही आदि) मदिरा-तुल्य हो जाते हैं। ताम्रपात्रमें दूध पीना, जूठा रखना, घीका भोजन करना और नमकसहित दूध खाना तुरंत ही अभक्ष्यके समान पापकारक हो जाता है। मधु मिला हुआ घी, तेल और गुड़ अभक्ष्य है तथा शास्त्रके मतानुसार गुड़मिश्रित अदरक भी अभक्ष्य है। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि पीनेसे अवशिष्ट जल, माघमासमें मूली और शय्यापर बैठकर जप आदिका सदा परित्याग कर दे। उत्तम बुद्धिसम्पन्न पुरुषको दिनमें दो बार तथा दोनों संध्याओंमें और रात्रिके पिछले पहरमें भोजन नहीं करना चाहिये। पीनेका जल, खीर, चूर्ण, घी, नमक, स्वस्तिकके आकारकी मिठाई, गुड़, दूध, मट्ठा तथा मधु - ये एक हाथसे दूसरे हाथपर ग्रहण करनेसे तत्काल ही अभक्ष्य हो जाते हैं। श्रुतिकी सम्मतिसे चाँदीके पात्रमें रखा हुआ कपूर अभक्ष्य हो जाता है। यदि परोसनेवाला व्यक्ति भोजन करनेवालेको छू दे तो वह अन्न अभक्ष्य हो जाता है - यह सभीको सम्मत है। ब्राह्मणोंको भैंसका दूध, दही, घी, स्वस्तिक और माखन नहीं खाना चाहिये। रविवारको अदरक सभीके लिये अभक्ष्य है। ब्राह्मणोंके लिये बासी अन्न, जल और दूध निषिद्ध है। असंस्कृत नमक और तेल अभक्ष्य है; परंतु अग्निद्वारा संस्कृत पवित्र व्यञ्जन सभीके खाने योग्य है। एक हाथसे धारण किया हुआ, गँदला, कृमियुक्त और अपवित्र जल अपेय होता है - यह सर्वसम्मत है। श्रीहरिको निवेदित किये बिना कोई भी पदार्थ ब्राह्मणों, यतियों, ब्रह्मचारियों, विशेष करके वैष्णवोंको नहीं खाना चाहिये। तात ! जिस-किसी वस्तुमें अथवा मधु, दूध, दही, घी और गुड़में यदि चींटियाँ पड़ गयी हों तो उसे कभी नहीं खाना चाहिये। ऐसा श्रुतिमें सुना गया है। पका हुआ शुद्ध फल, जिसे पक्षीने काट दिया हो अथवा उसमें कीड़े पड़ गये हों तथा कौवेद्वारा उच्छिष्ट किया हुआ पदार्थ सभीके लिये अभक्ष्य होता है। घी अथवा तेलमें पकाया हुआ

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