भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 709, कुल 810 में से

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पृष्ठ 709

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६९९ एक लाख ब्राह्मणोंको भोजन करानेसे शुद्ध होकर वह विद्वान् एवं तपःपरायण विप्र होता है। उस जन्ममें वह भी कुछ बचे-खुचे पापोंको भोगता है तथा सोना दान करनेसे शुद्ध हो जाता है। भ्रूणहत्या करनेवाला महापापी शुनीमुख नामक नरकमें जाता है। वहाँ वह सौ वर्षोंतक सूक्ष्म शस्त्रद्वारा पीड़ित किया जाता है। फिर उसे निश्चय ही सौ वर्षोंतक घोड़ेकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है। इसके बाद वह पापी अपने कर्मके फलस्वरूप दादके रोगसे युक्त वैश्य होता है और पचास वर्षोंतक वह कष्ट भोगकर पुनः स्वर्णदानसे शुद्ध होता है। इसके बाद अपने कुलमें उत्पन्न होनेपर भी वह नीरोग होता है और फिर पवित्र ब्राह्मण होकर जन्म लेता है। युद्धके बिना क्षत्रियको मारनेवाला ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय तप्तशूल नरकमें जाता है। वहाँ उसे एक हजार वर्षतक तपाये हुए लोहेसे काढ़ेकी भाँति पकाया जाता है और वह आर्तनाद करता है। तदनन्तर वह सौ वर्षोंतक मदमत्त गजराज होता है। इसके बाद सौ वर्षोंतक रक्तदोषयुक्त शूद्र होता है। वहाँ वह हाथी दान करनेसे रोगमुक्त होकर फिर ब्राह्मणके घरमें जन्म लेता है। वैश्य और शूद्रकी हत्या करनेवाला वैश्य तथा वैश्यकी हिंसा करनेवाला शूद्र-ये निश्चय ही समान पापके भागी होते हैं। इन्हें सौ वर्षोंतक कृमिकुण्ड नामक नरकमें वास करना पड़ता है। वहाँ कीड़ोंके काटनेसे वह महान् दुःखी होता है। इसके बाद वह कृमिरोगसे युक्त होकर सौ वर्षोंतक किरात होता है। व्रजेश्वर ! तदनन्तर वह पचास वर्षोंतक मन्दाग्नियुक्त, दुर्बल, कृशोदर, गरीब ब्राह्मण होता है। फिर तीर्थमें घोड़ेका दान करनेसे उसकी मुक्ति हो जाती है। तात! चारों वर्णोंमें किसी भी वर्णका मनुष्य जो पीपलका वृक्ष काटता है, वह ब्रह्महत्याके चौथाई पापका भागी होता है और उसे निश्चय ही असिपत्र नामक नरकमें जाना पड़ता है। झूठी गवाही देनेवाले, कृतघ्न, अतिकृतघ्न, विश्वासघाती, मित्रघाती और ब्राह्मणोंका धन हरण करनेवाला- ये महापापी कहलाते हैं। इन्हें हजारों वर्षोंतक कुम्भीपाकमें रहना पड़ता है। वहाँ वे रात-दिन खौलते हुए तेलसे संतप्त किये जाते हैं, उन्हें व्याधियाँ घेरे रहती हैं और सर्पाकार जन्तु काटता रहता है। तदनन्तर वह पापी हजार करोड़ जन्मोंतक गीध, सौ जन्मोंतक सूअर और सौ जन्मोंतक हिंसक पशु होनेके बाद रोगग्रस्त शूद्र होता है। उस जन्ममें वह मन्दाग्नि तथा ज्वरसे पीड़ित रहता है तथा सौ पल सोना दान करके अवश्य ही शुद्ध हो जाता है। चारों वर्णोंमें जो मनुष्य वस्त्र चुरानेवाला, गव्य (दूध-दही-घी)- की चोरी करनेवाला, चाँदी और मुक्ताका अपहरण करनेवाला तथा शूद्रके धनको लूट लेनेवाला होता है; वह सौ वर्षोंतक मूत्रकुण्डका भोग करके पुनः हजार वर्षोंतक बगुलेकी योनिमें उत्पन्न होता है- यह ध्रुव है। व्रजराज ! तदनन्तर वह सौ वर्षोंतक शूद्रजातिमें जन्म लेता है। वहाँ वह पापी कुष्ठरोगसे युक्त होता है और उसके घावसे मवाद निकलती रहती है। तत्पश्चात् थोड़ा-बहुत कोढ़से युक्त होकर ब्राह्मण होता है और छः पल सोना दान करनेसे पवित्र होकर रोगमुक्त हो जाता है। जो खजाना लूटनेवाला, फल चुरानेवाला तथा खेल- ही-खेलमें धनका अपहरण करनेवाला है, वह भूतलपर यक्ष होता है। फिर सौ वर्षोंतक नीलकण्ठ पक्षी होता है। तत्पश्चात् भारतभूमिपर काले रंगवाला शूद्र होता है। फिर जन्म- जन्मान्तरके बाद अधिक अङ्गोंवाला ब्राह्मण होता है। वहाँ ब्राह्मणोंको भोजन करानेसे पुनः ब्राह्मण होकर मुक्त हो जाता है। पके हुए पदार्थोंकी चोरी करनेवाला निश्चय ही पशुयोनिमें उत्पन्न होता है। वहाँ वह सात जन्मोंतक जिसका अण्डकोश गन्धयुक्त होता है तथा जिसे कस्तूरी नामसे पुकारा जाता है; वह कस्तूरी-मृग होकर पुनः एक

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