ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७०० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण जन्मतक गन्धक होता है। फिर गलितकुष्ठवाला तथा वह कुलटा रौरवकी यातना भोगकर सात शूद्र होता है। तत्पश्चात् अवशिष्ट रोगसे युक्त जन्मोंतक क्रमशः विधवा, वन्ध्या, अस्पृश्या, दुर्बल ब्राह्मण होता है, वहाँ वह छः पल सोना जातिहीना और नकटी होती है। लाल पदार्थकी दान करनेसे निःसंदेह मुक्त हो जाता है। धान्यकी चोरी करनेवाला रक्तदोषसे युक्त होता है। आचारहीन चोरी करनेवाला सात जन्मोंतक दुःखी और मनुष्य यवन, हिंसक, लँगड़ा, दीक्षाहीन वङ्खर, कृपण होता है। वह सौ वर्षोंतक विष्ठाके कुण्डमें कुदृष्टि डालनेवाला काना, अहंकारी कर्णहीन, यातना भोगकर उस भयसे मुक्त होता है। स्वर्णका वेदकी निन्दा करनेवाला बहरा, बात काटनेवाला अपहरण करनेवाला मानव कोढ़ी और पतित गूँगा, हिंसक केशहीन, मिथ्यावादी दाढ़ीरहित, होता है तथा स्वर्ण-दान ग्रहण करनेवाला विष्ठाके दुष्ट वचन बोलनेवाला दन्तहीन, सत्यको छिपानेवाला कुण्डमें जाता है। वहाँ सौ वर्षोंतक रात-दिन जिह्वाहीन, दुष्ट अंगुलिरहित तथा ग्रन्थकी चोरी विष्ठा खानेके बाद व्याध होता है, फिर रक्तविकारयुक्त करनेवाला मूर्ख एवं रोगी होता है। घोड़ेका दान शूद्र होता है। उस जन्ममें पापका उपभोग करके लेनेवाला तथा घोड़ा चुरानेवाला लालामूत्र नामक वह पुनः अवशिष्ट रोगयुक्त ब्राह्मण होता है और नरकमें जाता है। वहाँ सौ वर्षोंतक रहकर फिर स्वर्ण-दान करनेसे मुक्त हो जाता है। घोड़ेकी योनिमें उत्पन्न होता है। हाथीका दान अगम्या स्त्रीके साथ गमन करनेवाला पापी लेनेवाला तथा हाथी-चोर एक हजार वर्षोंतक असंख्य वर्षोंतक पूर्वोक्त रौरव तथा महाभयंकर विष्ठाके कुण्डमें रहकर फिर हाथी होता है। कुम्भीपाकमें जाता है। इसके बाद हजार वर्षोंतक तत्पश्चात् शूद्रके घर जन्म लेता है। छागका वह कुलटा स्त्रियोंकी योनिका कीड़ा और लाख प्रतिग्रही और चोर मनुष्य सौ वर्षोंतक पूयकुण्डमें वर्षोंतक विष्ठाका कीट होता है। उससे पशुयोनिमें वास करके फिर चाण्डाल होता है। तत्पश्चात् और पशुयोनिसे क्षुद्र जन्तुओंमें जन्म लेता है। एक वर्षतक छागकी योनिमें पैदा होता है। वहाँ तत्पश्चात् म्लेच्छ और फिर नीच शूद्र होता है। शत्रुके शस्त्रद्वारा काटे जानेसे मुक्त होकर ब्राह्मण इसके बाद वह व्याधिग्रस्त ब्राह्मण होता है और होता है। जो दान की हुई वस्तुका अपहरण पुनः ब्राह्मण होकर क्रमशः तीर्थोंमें भ्रमण करनेसे करता है तथा वाग्दान करके पुनः उस बातको शुद्ध हो जाता है; परंतु पापके कारण उसका वंश पलट देता है; वह म्लेच्छयोनिमें जन्म लेता है नहीं चलता। फिर एक लाख ब्राह्मणोंको भोजन और वहाँ कष्ट भोगकर नरकमें जाता है। कराकर वह पवित्र हो जाता है और पुत्र प्राप्त कर ब्रजेश ! जो (दूसरेको न देकर) अकेले ही लेता है। क्रोधी मनुष्य सात जन्मोंतक गदहा होता मिठाइयाँ गप कर जाता है, वह निश्चय ही है और जो मानव झगड़ालू होता है, उसे सात कालसूत्र नरकमें जाता है। वहाँ सौ वर्षोंतक जन्मोंतक कौआ होना पड़ता है। लोहेकी चोरी यातना भोगकर फिर हजार वर्षोंकी आयुवाला करनेवाला संतानहीन, मषी चुरानेवाला कोकिल, प्रेत होता है। इसके बाद वह एक जन्मतक अञ्जनका चोर शुक और मिठाई चुरानेवाला मक्खी, एक जन्ममें चींटी, एक जन्ममें भ्रमर, कीड़ा होता है। तात! ब्राह्मण और गुरुसे द्वेष एक जन्ममें मधुमक्खी, एक जन्ममें बर्रै, एक करनेवाला सिरका कीट-जूँ होता है। पुंश्चली जन्ममें डाँस, एक जन्ममें मच्छर, एक जन्ममें स्त्रीका भोग करके पुरुष रौरव नरकमें जाता है दुर्गन्धयुक्त कीट और एक जन्ममें खटमल होनेके और फिर सौ वर्षोंतक निरर्थक कीट होता है बाद दुर्बुद्धि एवं रोगग्रस्त शूद्र होता है। फिर