ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ७०३ दस हजार वर्षोंतक म्लेच्छयोनिमें जन्म लेना पड़ता है। जो पुरुष कामभावसे स्त्रियोंकी कटि, स्तन और मुखकी ओर निहारता है, वह दूसरे जन्ममें दृष्टिहीन और नपुंसक होता है। जो ब्राह्मण ज्ञानहीन होते हुए आभिचारिक कर्म करनेवाला तथा हिंसक होता है; वह इस प्रकार दस हजार वर्षोंतक अन्धतामिस्र नरकमें वास करता है। तत्पश्चात् कर्मके भोगके अनुसार वह ब्राह्मण शूद्र होता है। जो शास्त्रज्ञ ज्योतिषी लोभवश झूठ बोलता है; वह सात जन्मोंतक वानरोंका सरदार होता है- यह ध्रुव है। तत्पश्चात् वह धर्महीन पापी अनेक जन्मोंकी तपस्याके फलस्वरूप भारतवर्षमें उत्तम बुद्धिसम्पन्न परम धर्मात्मा ब्राह्मण होता है। अपने धर्ममें तत्पर रहनेवाला ब्राह्मण अग्निसे भी बढ़कर पवित्र और अत्यन्त तेजस्वी होता है, उससे देवगण सदा डरते रहते हैं। जैसे नदियोंमें गङ्गा, तीर्थोंमें पुष्कर, पुरियोंमें काशी, ज्ञानियोंमें शंकर, शास्त्रोंमें वेद, वृक्षोंमें पीपल, तपस्याओंमें मेरी पूजा तथा व्रतोंमें उपवास सर्वश्रेष्ठ है; उसी तरह समस्त जातियोंमें ब्राह्मण श्रेष्ठ होता है। समस्त पुण्य, तीर्थ और व्रत ब्राह्मणके चरणोंमें निवास करते हैं। ब्राह्मणकी चरणरज शुद्ध तथा पाप और रोगका विनाश करनेवाली होती है। उनका शुभाशीर्वाद सारे कल्याणोंका कारण होता है। तात! इस प्रकार मैंने अपनी जानकारी तथा शास्त्रज्ञानके अनुसार आपसे कर्मविपाकका वर्णन कर दिया। अब जो अवशिष्ट है, उसे श्रवण करो। इस कर्मविपाकको सुनकर उस वाचकको सोना, चाँदी, वस्त्र और पान देना चाहिये। मनुष्यको चाहिये कि मेरी प्रसन्नताके लिये उस ब्राह्मणको तुरंत सौ स्वर्णमुद्राएँ, बहुत-सी गायें, चाँदी, वस्त्र और ताम्बूल दक्षिणारूपमें समर्पित करे। (अध्याय ८५) केदार-कन्याके वृत्तान्तका वर्णन नन्दजीने पूछा - प्रभो! आपने स्त्रियोंके प्रसङ्गसे केदार-कन्याका प्रस्ताव करके कर्मविपाकका वर्णन किया। अब विस्तारपूर्वक केदार-कन्याका चरित्र बतलाइये। वह केदार-कन्या कौन थी? भूपाल केदार कौन थे? किसके वंशमें उनका जन्म हुआ था? यह विवरणसहित मुझे बतलानेकी कृपा कीजिये। श्रीभगवान्ने कहा- नन्दजी ! सृष्टिके आदिमें ब्रह्माके पुत्र स्वायम्भुव मनु हुए। उनकी स्त्रीका नाम शतरूपा था, जो स्त्रियोंमें धन्या और माननीया थी। उन दोनोंके प्रियव्रत और उत्तानपाद नामके दो पुत्र हुए। उत्तानपादके पुत्र महायशस्वी ध्रुव हुए। ध्रुवके पुत्र नन्दसावर्णि और नन्दसावर्णिके पुत्र केदार हुए। स्वयं श्रीमान् केदार विष्णु-भक्त तथा सातों द्वीपोंके अधिपति थे। उनकी रक्षाके लिये वे प्रतिदिन राजदरबारमें सुन्दर रूप- रंगवाली, सीधी, नौजवान गायें, जिनके सींगोंमें सोना मढ़ा गया था, ब्राह्मणोंको दान करते थे। प्रातःकालसे लेकर सायंकालतक ब्राह्मणोंको भोजन कराते थे; दुःखियों और भिक्षुकोंको यथोचित धन देते थे और स्वयं राजा विष्णु-भक्तिपरायण हो इन्द्रियोंको काबूमें करके फल-मूलका आहार करते हुए सब कुछ मुझे समर्पित करके रात- दिन मेरा जप करते थे। तदनन्तर लक्ष्मी अपनी कलासे कामिनियोंमें श्रेष्ठ कमलनयनी कन्याके रूपमें उनके यज्ञकुण्डसे प्रकट हुईं। उनके शरीरपर अग्निमें तपाकर शुद्ध किया हुआ वस्त्र था और वे रत्नोंके आभूषणोंसे विभूषित थीं। उन्होंने राजासे यों कहा- 'महाराज! मैं आपकी कन्या हूँ।' तब राजाने भक्तिपूर्वक उसकी