भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 714

७०४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण भलीभाँति पूजा की और उसे अपनी पत्नीको समर्पित करके वे चुपचाप खड़े हो गये। तदनन्तर वह कन्या हर्षपूर्वक विनती करके और माता- पिताकी आज्ञा ले तपस्या करनेके लिये यमुना- तटपर स्थित रमणीय पुण्यवनको चली गयी। वह वृन्दाका तपोवन था; इसीलिये उसे 'वृन्दावन' कहते हैं। वहाँ तपस्या करके उसने वरोंमें श्रेष्ठ मुझको वररूपसे वरण किया। तब ब्रह्माने उसे वरदान दिया कि 'कुछ कालके पश्चात् तू कृष्णको प्राप्त करेगी'। फिर ब्रह्माजीने उसकी परीक्षाके लिये धर्मको एक परम सुन्दर तरुण ब्राह्मणके रूपमें उसके पास भेजा। वहाँ जाकर धर्मने कहा- मनोहरे ! तुम किसकी कन्या हो ? तुम्हारा क्या नाम है? यहाँ एकान्तमें तुम क्या कर रही हो? यह मुझे बतलाओ। सुन्दरि ! तुम क्या चाहती हो और किसलिये यह तपस्या कर रही हो? तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारे मनमें जो अभिलाषा हो, वह वरदान माँगो। वृन्दा बोली - विप्रवर! मैं केदारराजकी कन्या हूँ, मेरा नाम वृन्दा है। मैं इस वृन्दावनमें वास करती हुई एकान्तमें तपस्या कर रही हूँ और श्रीहरिको अपना पति बनानेकी चिन्तामें हूँ। अतः ब्राह्मण ! यदि तुम्हारेमें ऐसा वरदान देनेकी शक्ति हो तो मेरा अभीष्ट वर मुझे प्रदान करो; अन्यथा यदि तुम असमर्थ हो तो अपने रास्ते जाओ। तुम्हें यह सब पूछनेसे क्या लाभ ? धर्मने कहा- वृन्दे ! जो इच्छारहित, तर्कणा करनेके अयोग्य, ऐश्वर्यशाली, निर्गुण, निराकार और भक्तानुग्रहमूर्ति हैं; उन परमात्माको पति बनानेके लिये लक्ष्मी और सरस्वतीके अतिरिक्त दूसरी कौन स्त्री समर्थ हो सकती है? वैकुण्ठशायी चतुर्भुज भगवान्‌की ये ही दो भार्याएँ हैं। गोलोकमें भी जो द्विभुज, वंशी बजानेवाले, किशोर गोप- वेषधारी, परिपूर्णतम श्रीकृष्ण हैं; उनकी पत्नी स्वयं परात्परा महालक्ष्मी राधा हैं। वे परमब्रह्म- स्वरूपिणी राधा उन श्यामसुन्दरकी, जो परम आत्मबलसे सम्पन्न, ऐश्वर्यशाली, शमपरायण और परम सौन्दर्यशाली हैं, जिनका सुन्दर शरीर करोड़ों कामदेवोंके सौन्दर्यकी निन्दा करनेवाला, अमूल्य रत्नाभरणोंसे विभूषित, सत्यस्वरूप और अविनाशी है तथा जो रमणीय पीताम्बर धारण करनेवाले और सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके दाता हैं; सदा सेवा करती रहती हैं। वे श्रीकृष्ण द्विभुज और चतुर्भुज-रूपसे दो रूपोंमें विभक्त हैं। वे स्वयं चतुर्भुज-रूपसे वैकुण्ठमें और द्विभुज-रूपसे गोलोकमें वास करते हैं। पचीस हजार युग बीतनेके बाद इन्द्रका पतन होता है, ऐसे चौदह इन्द्रोंका शासनकाल लोकोंके विधाता ब्रह्माका एक दिन होता है, उतनी ही बड़ी उनकी रात्रि होती है। ऐसे तीस दिनका एक मास और बारह मासका एक वर्ष होता है। ऐसे सौ वर्षतक ब्रह्माकी आयु समझनी चाहिये। उन ब्रह्माकी आयुसमाप्ति, जिनका एक निमेष होता है, सनक आदि महर्षि जिनकी जीवनपर्यन्त सेवा करते रहते हैं, परंतु करोड़ों-करोड़ों कल्पोंमें भी जो विभु साध्य नहीं होते। सहस्रमुखधारी शेषनाग अरबों-खरबों कल्पोंतक जिनकी भक्तिपूर्वक रात-दिन सेवा तथा नाम- जप करते रहते हैं; परंतु वे परात्पर, दुराराध्य, हितकारी भगवान् साध्य नहीं होते। जो ब्रह्मा वेदोंके उत्पादक, विधाता, फलदाता और सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके दाता हैं; वे प्रत्येक जन्ममें उन ब्रह्मस्वरूप अविनाशी सनातनदेवका सदा अपने चारों मुखोंद्वारा स्तवन करते रहते हैं; परंतु वेदोंद्वारा अनिर्वचनीय, कालके काल तथा अन्तकके अन्तक उन भगवान्‌को सिद्ध नहीं कर पाते। वृन्दे! जो अपनी कलासे रुद्ररूप धारण करके जगत्‌का संहार करते हैं, पाँचों मुखोंसे उनकी स्तुति करते हैं, जिनसे बढ़कर भगवान्‌को दूसरा कोई प्रिय नहीं है; उनके द्वारा जब भगवान्