ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
यहाँ बुलानेमें समर्थ हैं, अतः काल, यम तथा मृत्युकन्याको मेरे पास ले आइये।
मालावतीकी यह बात सुनकर वेदवेत्ताओंमें उत्तम ब्राह्मणने उस सभामें उन सबको बुलाकर प्रत्यक्ष खड़ा कर दिया। सती मालावतीने सबसे पहले मृत्युकन्याको देखा। उसका रूप-रंग काला था, वह देखनेमें भयंकर थी। उसने लाल रंगके कपड़े पहन रखे थे। वह मन्द-मन्द मुसकरा रही थी। उसके छः भुजाएँ थीं। वह शान्त, दयालु और महासती थी तथा अपने स्वामी कालके वाम-भागमें चौंसठ पुत्रोंके साथ खड़ी थी। तत्पश्चात् सती मालावतीने नारायणके अंशभूत कालको भी सामने खड़ा देखा। उसका रूप बड़ा ही उग्र, विकट तथा ग्रीष्म-ऋतुके सूर्यकी भाँति प्रचण्ड तेजसे युक्त था। उसके छः मुख, सोलह भुजाएँ और चौबीस नेत्र थे। पैरोंकी संख्या भी छः ही थी। शरीरका रंग काला था। उसने भी लाल वस्त्र पहन रखे थे। वह देवताओंका भी देवता है। उसकी विकराल आकृति है। वह सर्वसंहाररूपी, कालका अधिदेवता, सर्वेश्वर एवं सनातन भगवान् है। उसके मुखपर मन्द मुस्कान-जनित प्रसन्नता दृष्टिगोचर होती थी, उसने हाथमें अक्षमाला धारण कर रखी थी और वह अपने स्वामी तथा आत्मा परम ब्रह्म श्रीकृष्णका नाम जप रहा था।
इसके बाद सतीने अपने सामने अत्यन्त दुर्जय व्याधिसमूहोंको देखा, जो अवस्थामें अत्यन्त बड़े-बूढ़े होनेपर भी अपनी माताके निकट दूध पीते बच्चोंके समान दिखायी देते थे। तदनन्तर उसने यमको सामने देखा, जो धर्माधर्मके विचारको जाननेवाले परम धर्मस्वरूप तथा पापियोंके भी शासक हैं। उनके पैर स्थूल थे। शरीरकी कान्ति श्याम थी। धर्मनिष्ठ सूर्यनन्दन यम परब्रह्मस्वरूप सनातन भगवान् श्रीकृष्णका मन्त्र जप रहे थे। उन सबको देख महासाध्वी मालावतीके मुख और नेत्र प्रसन्नतासे खिल उठे। उसने निःशंक होकर पहले यमसे पूछा।
मालावती बोली—धर्मशास्त्रविशारद! धर्मनिष्ठ धर्मराज! प्रभो! आप समयका उल्लङ्घन करके मेरे प्राणनाथको कैसे लिये जाते हैं?
यमराजने कहा—पतिव्रते! समय पूरा हुए बिना तथा ईश्वरकी आज्ञा मिले बिना इस भूतलपर किसीकी मृत्यु नहीं होती। जो मरा नहीं है, ऐसे पुरुषको मैं नहीं ले जाता। मैं, काल, मृत्युकन्या तथा अत्यन्त दुर्जय व्याधिसमूह—ये आयु पूर्ण होनेपर, जिसके मरणका समय आ पहुँचता है, उसीको ईश्वरकी आज्ञासे ले जाते हैं। मृत्युकन्या विचारशील है। यह आयु निःशेष होनेपर जिसको प्राप्त होती है, उसीको मैं ले जाता हूँ। तुम उसीसे पूछो। वह किस कारणसे जीवको प्राप्त होती है?
मालावती बोली—मृत्युकन्ये! स्वामीके वियोगसे होनेवाली वेदनाको जानती हो। अतः प्यारी सखी! बताओ, मेरे जीते-जी तुम मेरे प्राणवल्लभको क्यों हर ले जाती हो?
मृत्युकन्या बोली—पूर्वकालमें विश्वस्रष्टा ब्रह्माजीने इस कर्मके लिये मेरी ही सृष्टि की। पतिव्रते! मैं बड़ी भारी तपस्या करके भी इस कार्यको त्यागनेमें असमर्थ हूँ। सुन्दरि! इस संसारमें यदि कोई सतियोंमें सबसे श्रेष्ठ और तेजस्विनी सती हो तथा वह मुझे ही अपने तेजसे भस्म कर डालनेमें समर्थ हो जाय, तब तो यहाँ सारी ही आपत्तियोंकी शान्ति हो जायगी। फिर मेरे पुत्रों और स्वामीकी जो दशा होनी होगी सो हो जायगी। कालसे प्रेरित होकर ही मैं और मेरे पुत्र व्याधिगण किसी प्राणीका स्पर्श करते हैं। अतः इसमें मेरा तथा मेरे पुत्रोंका कोई दोष नहीं है। अब तुम मेरा निश्चित विचार सुनो। भद्रे! धर्मसभामें बैठनेवाले जो धर्मज्ञ महात्मा काल हैं, उनसे इस विषयमें पूछो। फिर जो उचित हो वह अवश्य करना।