ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मखण्ड ६३ मालावतीने कहा— हे काल ! आप कर्मोंके साक्षी हैं, कर्मस्वरूप हैं तथा नारायणके सनातन अंश हैं। भगवन् ! आप परमेश्वरको नमस्कार है। प्रभो ! मैं जीवित हूँ। फिर मेरे प्रियतमको आप क्यों हर ले जाते हैं? कृपानिधे ! आप सर्वज्ञ हैं। अतः सबके दुःखको भी जानते हैं। कालपुरुष बोले— पतिव्रते ! मैं अथवा यमराज किस गिनतीमें हैं। मृत्युकन्या और व्याधियोंकी क्या बिसात है। हम सब लोग सदा ईश्वरकी आज्ञाका पालन करनेके लिये भ्रमण करते हैं। जिन्होंने प्रकृतिकी सृष्टि की है; ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवताओंको प्रकट किया है; मुनीन्द्र, मनु और मानव आदि समस्त जन्तु जिनसे उत्पन्न हुए हैं, योगिजन जिनके चरणारविन्दका चिन्तन करते हैं, बुद्धिमान् मनुष्य जिन परमात्माके पवित्र नामोंका सदा जप करते हैं, जिनके भयसे हवा चलती है और सूर्य तपता है, जिनकी आज्ञासे ब्रह्मा सृष्टि और विष्णु पालन करते हैं, जिनके आदेशसे शंकर सम्पूर्ण जगत्का संहार करते हैं, कर्मोंके साक्षी धर्म जिनकी आज्ञाके परिपालक हैं, राशिचक्र और समस्त ग्रह जिनका शासन शिरोधार्य करके आकाशमें चक्कर लगाते हैं, दिशाओंके स्वामी दिक्पाल जिनकी आज्ञाका पालन करते हैं। सती मालावति ! जिनकी आज्ञासे वृक्ष समयपर फूल और फल धारण करते और देते हैं, जिनके आदेशसे पृथ्वी जलका तथा समस्त चराचर प्राणियोंका आधार बनी हुई है, क्षमाशील वसुधा जिनके भयसे कभी-कभी सहसा कम्पित हो उठती है, जिनकी मायासे माया भी सदा मोहित रहती है, सबको जन्म देनेवाली प्रकृति जिनके भयसे भीत रहती है, वस्तुओंकी सत्ताको बतानेवाले वेद भी जिनका अन्त नहीं जानते, समस्त पुराण जिनकी ही स्तुतिका पाठ करते हैं, जिन तेजोमय सर्वव्यापी भगवान्की सोलहवीं कलास्वरूप ब्रह्मा, विष्णु और महाविराट् पुरुष उन्हींके नामका जप करते हैं, वे ही सबके ईश्वर, काल-के-काल, मृत्यु- की-मृत्यु तथा परात्पर परमात्मा हैं। उन्हीं श्रीकृष्णका तुम चिन्तन करो। वे कृपानिधान श्रीकृष्ण तुम्हें सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तु तथा पति भी प्रदान करेंगे। ये सब देवता जिनकी आज्ञाके अधीन हैं, वे सर्वेश्वर श्रीकृष्ण ही सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके दाता हैं। शौनक ! ऐसा कहकर कालपुरुष चुप हो गये। तत्पश्चात् ब्राह्मणने पुनः वार्ता आरम्भ की। (अध्याय १५) मालावतीके पूछनेपर ब्राह्मणद्वारा वैद्यकसंहिताका वर्णन, आयुर्वेदकी आचार्यपरम्परा, उसके सोलह प्रमुख विद्वानों तथा उनके द्वारा रचित तन्त्रोंका नाम-निर्देश, ज्वर आदि चौंसठ रोग, उनके हेतुभूत वात, पित्त, कफकी उत्पत्तिके कारण और उनके निवारणके उपायोंका विवेचन ब्राह्मण बोले— शुभे ! तुमने काल, यम, मृत्युकन्या तथा व्याधिगणोंका साक्षात्कार कर लिया। अब तुम्हारे मनमें क्या संदेह है? उसे पूछो। ब्राह्मणकी बात सुनकर सती मालावतीको बड़ा हर्ष हुआ। उसके मनमें जो प्रश्न था उसे उसने उन जगदीश्वरके समक्ष प्रस्तुत किया। मालावतीने कहा— ब्रह्मन् ! आपने जो यह कहा कि रोग प्राणियोंके प्राणोंका अपहरण करता है, रोगके जो नाना प्रकारके कारण हैं, उन सबका वेद (आयुर्वेद)-में निरूपण किया गया है, उसके