भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 74

६४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण सम्बन्धमें मेरा निवेदन यों है- जिसका निवारण करना कठिन है, वह अमङ्गलकारी रोग जिस उपायसे शरीरमें न फैले, उसका आप वर्णन करनेकी कृपा करें। मैंने जो-जो बात पूछी है या नहीं पूछी है तथा जो ज्ञात है अथवा नहीं ज्ञात है, वह सब कल्याणकी बात आप मुझे बताइये; क्योंकि आप दीनोंपर दया करनेवाले गुरु हैं। मालावतीका वचन सुनकर ब्राह्मणरूपधारी भगवान् विष्णुने वहाँ 'वैद्यकसंहिता' का वर्णन आरम्भ किया। ब्राह्मण बोले-जो सम्पूर्ण तत्त्वोंके ज्ञाता, समस्त कारणोंके भी कारण तथा वेद-वेदाङ्गोंके बीजके भी बीज हैं, उन परमेश्वर श्रीकृष्णकी मैं वन्दना करता हूँ। समस्त मङ्गलोंके भी मङ्गलकारी बीजस्वरूप उन सनातन परमेश्वरने मङ्गलके आधारभूत चार वेदोंको प्रकट किया। उनके नाम हैं-ऋक्, यजु, साम और अथर्व। उन वेदोंको देखकर और उनके अर्थका विचार करके प्रजापतिने आयुर्वेदका संकलन किया। इस प्रकार पञ्चम वेदका निर्माण करके भगवान्ने उसे सूर्यदेवके हाथमें दे दिया। उससे सूर्यदेवने एक स्वतन्त्र संहिता बनायी। फिर उन्होंने अपने शिष्योंको वह अपनी 'आयुर्वेदसंहिता' दी और पढ़ायी। तत्पश्चात् उन शिष्योंने भी अनेक संहिताओंका निर्माण किया। पतिव्रते ! उन विद्वानोंके नाम और उनके रचे हुए तन्त्रोंके नाम, जो रोगनाशके बीजरूप हैं, मुझसे सुनो। धन्वन्तरि, दिवोदास, काशिराज, दोनों अश्विनीकुमार, नकुल, सहदेव, सूर्यपुत्र यम, च्यवन, जनक, बुध, जाबाल, जाजलि, पैल, करथ और अगस्त्य - ये सोलह विद्वान् वेद-वेदाङ्गोंके ज्ञाता तथा रोगोंके नाशक (वैद्य) हैं। पतिव्रते ! सबसे पहले भगवान् धन्वन्तरिने 'चिकित्सा-तत्त्वविज्ञान' नामक एक मनोहर तन्त्रका निर्माण किया। फिर दिवोदासने 'चिकित्सा-दर्पण' नामक ग्रन्थ बनाया। काशिराजने 'दिव्य चिकित्सा-कौमुदी' का प्रणयन किया। दोनों अश्विनीकुमारोंने 'चिकित्सा-सारतन्त्र' की रचना की, जो भ्रमका निवारण करनेवाला है। नकुलने 'वैद्यकसर्वस्व' नामक तन्त्र बनाया। सहदेवने 'व्याधिसिन्धुविमर्दन' नामक ग्रन्थ तैयार किया। यमराजने 'ज्ञानार्णव' नामक महातन्त्रकी रचना की। भगवान् च्यवन मुनिने 'जीवदान' नामक ग्रन्थ बनाया। योगी जनकने 'वैद्यसंदेहभञ्जन' नामक ग्रन्थ लिखा। चन्द्रकुमार बुधने 'सर्वसार,' जाबालने 'तन्त्रसार' और जाजलि मुनिने 'वेदाङ्ग- सार' नामक तन्त्रकी रचना की। पैलने 'निदान- तन्त्र', करथने उत्तम 'सर्वधर-तन्त्र' तथा अगस्त्यजीने 'द्वैधनिर्णय' तन्त्रका निर्माण किया। ये सोलह तन्त्र चिकित्सा-शास्त्रके बीज हैं, रोग-नाशके कारण हैं तथा शरीरमें बलका आधान करनेवाले हैं। आयुर्वेदके समुद्रको ज्ञानरूपी मथानीसे मथकर विद्वानोंने उससे नवनीत-स्वरूप ये तन्त्र-ग्रन्थ प्रकट किये हैं। सुन्दरि ! इन सबको क्रमशः देखकर तुम दिव्य भास्कर-संहिताका तथा सर्वबीजस्वरूप आयुर्वेदका पूर्णतया ज्ञान प्राप्त कर लोगी। आयुर्वेदके अनुसार रोगोंका परिज्ञान करके वेदनाको रोक देना - इतना ही वैद्यका वैद्यत्व है। वैद्य आयुका स्वामी नहीं है- वह उसे घटा अथवा बढ़ा नहीं सकता। चिकित्सक आयुर्वेदका ज्ञाता, चिकित्साकी क्रियाको यथार्थरूपसे जाननेवाला धर्मनिष्ठ और दयालु होता है; इसलिये उसे 'वैद्य' कहा गया है। दारुण ज्वर समस्त रोगोंका जनक है। उसे रोकना कठिन होता है। वह शिवका भक्त और योगी है। उसका स्वभाव निष्ठुर होता है और आकृति विकृत (विकराल)। उसके तीन पैर, तीन सिर, छः हाथ और नौ नेत्र हैं। वह भयंकर ज्वर काल, अन्तक और यमके समान विनाशकारी होता है। भस्म ही उसका अस्त्र है तथा रुद्र उसके देवता हैं। मन्दाग्नि उसका जनक है।

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